श्री गुरु नानक देव जी - जीवन परिचय

जोर जबरदस्ती और हाक्मोके अत्याचारों से दुखी सृष्टि की पुकार सुनकर अकाल पुरख ने गुरु नानक जी के रूप में जलते हुए संसार  की रक्षा करने के लिए माता तृप्ताजी की कोख से महिता कालू चंद बेदी खत्री के घर राये भोये की तलवंडी (ननकाना साहिब) में 1469 ई० को सवा पहर के तड़के अवतार धारण किया|

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श्री गुरु नानक देव जी - ज्योति ज्योत समाना

गुरु गद्दी की सारी बातचीत भाई बुड्डा जी आदि निकटवर्ती सिखो को समझाकर गुरु नानक देव जी (Shri Guru Nanak Dev Ji) ने बैकुंठ जाने की तैयारी कर ली| ऐसा सुनकर दूर दूर से सिख आपके अन्तिम दर्शन करने ले लिए आ गए| गुरु जी अपनी धर्मशाला में बैठे थे और कीर्तन हो रहा था|

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श्री गुरु अंगद देव जी - जीवन परिचय

श्री गुरु अंगद देव जी (Shri Guru Angad Dev Ji) फेरु मल जी तरेहण क्षत्रि के घर माता दया कौर जी की पवित्र कोख से मत्ते की सराए परगना मुक्तसर में वैशाख सुदी इकादशी सोमवार संवत १५६१ को अवतरित हुए| आपके बचपन का नाम लहिणा जी था| गुरु नानक देव जी को अपने सेवा भाव से प्रसन्न करके आप गुरु अंगद देव जी के नाम से पहचाने जाने लगे|

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श्री गुरु अंगद देव जी - गुरु गद्दी मिलना

सिखों को श्री लहिणा जी की योग्यता दिखाने के लिए तथा दोनों साहिबजादो, भाई बुड्डा जी आदि और सिख प्रेमियों की परीक्षा के लिए आप ने कई कौतक रचे, जिनमे से कुछ का वर्णन इस प्रकार है:-

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श्री गुरु अंगद देव जी - ज्योति - ज्योत समाना

गुरु अंगद देव जी (Shri Guru Angad Dev Ji) ने वचन किया - सिख संगत जी! अब हम अपना शरीर त्यागकर बैकुंठ को जा रहे हैं| हमारे पश्चात आप सब ने वाहेगुरु का जाप और कीर्तन करना है| रोना और शोक नहीं करना, लंगर जारी रखना| हमारे शरीर का संस्कार उस स्थान पर करना जहाँ जुलाहे के खूंटे से टकरा कर श्री अमरदास जी गिर पड़े थे|

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श्री गुरु अमर दास जी - जीवन परिचय

श्री गुरु अमरदास जी (Shri Guru Amardas Ji) तेज भाज भल्ले क्षत्री के घर माता सुलखणी जी के उदर से वैशाख सुदी १४ संवत १५३६ को गाँव बासरके परगना झबाल में में पैदा हुए| 

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श्री गुरु अमर दास जी - गुरु गद्दी मिलना

श्री गुरु अंगद देव जी (Shri Guru Angad Dev Ji) के पास आकर जब कुछ दिन बीत गए तो आप ने भाई बुड्डा जी से आज्ञा लेकर और सिक्खों की तरह गुरुघर की सेवा में लग गए| आप सुबह उठकर गुरु जी के लिए जल की गागरे लाकर स्नान कराते| फिर कपड़े धोकर एकांत में बैठकर गुरु जी का ध्यान करते|

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श्री गुरु अमर दास जी ज्योति - ज्योत समाना

अपने अंतिम समय को नजदीक अनुभव करके श्री गुरु अमरदास जी (Shri Guru Amardas Ji) ने गुरुगद्दी का तिलक श्री रामदास जी (Shri Guru Ramdas Ji) को देकर सब संगत को आप जी ने उनके चरणी लगाया| इसके पश्चात् परिवार व सिखों को हुक्म मानने का उपदेश दिया जो बाबा सुन्दर जी, बाबा नन्द के पोत्र ने इसका वर्णन करके श्री गुरु अर्जुन देव जी को सुनाया-

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श्री गुरु रामदास जी - जीवन परिचय

श्री गुरु रामदास जी (Shri Guru Ramdas Ji) का जन्म श्री हरिदास मल जी सोढी व माता दया कौर जी की पवित्र कोख से कार्तिक वदी 2 संवत 1561 को बाज़ार चूना मंडी लाहौर में हुआ| इनके बचपन का नाम जेठा जी था| बालपन में ही इनकी माता दया कौर जी का देहांत हो गया| जब आप सात वर्ष के हुए तो आप के पिता श्री हरिदास जी भी परलोक सिधार गए|

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श्री गुरु राम दास जी - गुरु गद्दी मिलना

गुरु अमरदास जी (Shri Guru Amardas Ji) की दो बेटियां बीबी दानी व बीबी भानी जी थी| बीबी दानी जी का विवाह श्री रामा जी से और बीबी भानी जी का विवाह श्री जेठा जी (श्री गुरु रामदास जी) के साथ हुआ| दोनों ही संगत के साथ मिलकर खूब सेवा करते| गुरु जी दोनों पर ही खुश थे| इस कारण दोनों में से एक को गुरुगद्दी के योग्य निर्णित करने के लिए आपने उनकी परीक्षा ली| 

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श्री गुरु राम दास जी ज्योति - ज्योत समाना

गुरु रामदास जी (Shri Guru Ramdas Ji) परिवार और सिख सेवको को यथा स्थान धैर्य व वाहिगुरु के हुकम में रहने की आज्ञा देकर भादव सुदी तीज संवत 1639 को आप शरीर त्यागकर परम ज्योति में विलीन हो गए| 

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श्री गुरु अर्जन देव जी जीवन-परिचय

रामदासि गुरु जगत तारन कउ गुरु जोति सु अर्जन माहि धरी||
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श्री गुरु अर्जन देव जी गुरु गद्दी मिलना

आप अपने ननिहाल घर में ही पोषित और जवान हुए| इतिहास में लिखा है एक दिन आप अपने नाना श्री गुरु अमर दास जी (Shri Guru Amar Das ji) के पास खेल रहे थे तो गुरु नाना जी के पलंघ को आप पकड़कर खड़े हो गए| बीबी भानी जी आपको ऐसा देखकर पीछे हटाने लगी|

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गुरु अर्जन देव जी की शहीदी

जहाँगीर ने गुरु जी को सन्देश भेजा| बादशाह का सन्देश पड़कर गुरु जी ने अपना अन्तिम समय नजदीक समझकर अपने दस-ग्यारह सपुत्र श्री हरिगोबिंद जी को गुरुत्व दे दिया| उन्होंने भाई बुड्डा जी, भाई गुरदास जी आदि बुद्धिमान सिखों को घर बाहर का काम सौंप दिया| इस प्रकार सारी संगत को धैर्य देकर गुरु जी अपने साथ पांच सिखों-

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गुरु अर्जन देव जी का ज्योति - ज्योत समाना

जब दिन निकला तो चंदू फिर अपनी बात मनाने के लिए गुरु जी के पास पहुँचा| परन्तु गुरु जी ने फिर बात ना मानी| उसने गुरु जी से कहा कि आज आपको मृत गाए के कच्चे चमड़े में सिलवा दिया जाएगा| उसकी बात जैसे ही गुरु जी ने सुनी तो गुरु जी कहने लगे कि पहले हम रावी नदी में स्नान करना चाहते है, फिर जो आपकी इच्छा हो कर लेना|

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श्री गुरु हरिगोबिन्द जी - जीवन परिचय

पंज पिआले पंज पीर छठम पीर बैठा गुर भारी|| 
अर्जन काइआ पलटिकै मूरति हरि गोबिंद सवारी||
(वार १|| ४८ भाई गुरदास जी)
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श्री गुरु हरिगोबिन्द जी - गुरुदाद्दी मिलना

जहाँगीर ने श्री गुरु अर्जन देव जी (Shri Guru Arjun Dev Ji) को सन्देश भेजा| बादशाह का सन्देश पड़कर गुरु जी ने अपना अन्तिम समय नजदीक समझकर अपने दस-ग्यारह सपुत्र श्री हरिगोबिंद जी (Shri Guru Hargobind Ji) को गुरुत्व दे दिया| उन्होंने भाई बुड्डा जी, भाई गुरदास जी आदि बुद्धिमान सिखों को घर बाहर का काम सौंप दिया| इस प्रकार सारी संगत को धैर्य देकर गुरु जी अपने साथ पांच सिखों-

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श्री गुरु हरिगोबिन्द जी - ज्योति ज्योत समाना

बाबक रबाबी और मलिक जाती के परलोक सिधार जाने के कुछ समय बाद गुरु हरि गोबिंद जी (Shri Guru Hargobind Ji) ने अपने शरीर त्यागने का समय नजदीक अनुभव करके श्री हरि राये जी को गुरुगद्दी का विचार कर लिया| इस मकसद से आपने दूर - नजदीक सभी सिखों को करतारपुर पहुँचने के लिए पत्र लिखे|

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श्री गुरु हरिराय जी - जीवन परिचय

गुरु मंगल 
दोहरा-कथा गुरु हरि राय की सुनो श्रोता सावधान||
पावन पुन उपावनी गण पापन की हान||
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श्री गुरु हरिराय जी गुरु गद्दी मिलना

गुरु हरिगोबिंद जी (Shri Guru Hargobind Ji) ने अपना अंतिम समय नजदीक पाकर श्री हरि राय जी (Shri Guru Harrai Ji) को गद्दी देने का विचार किया| वे श्री हरि राय जी से कखने लगे कि तुम गुरु घर कि रीति के अनुसार पिछली रात जागकर शौच स्नान करके आत्मज्ञान को धारण करके भक्ति मार्ग को ग्रहण करना|

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