🙏 सतनाम वाहे गुरु, गुरु पर्व की असीमित शुभकामनाएं... आप सभी पर वाहे गुरु की मेहर हो! 23 Nov 2018 🙏
Homeशिक्षाप्रद कथाएँ

शिक्षाप्रद कथाएँ (1546)

प्रजापति महर्षि कश्यप की कई पत्नियां थीं| उनमें से एक नाम दनु था| दनु की संतान दानव कहलाई| उसी दनु के बड़े पुत्र का नाम दंभ था|

प्राचीन काल में रत्नभद्र नाम से प्रसिद्ध एक धर्मात्मा यक्ष गंधमादन पर्वत पर रहता था| उनके पूर्णभद्र नामक एक पुत्र उत्पन्न हुआ|

एक बार इंद्र सहित देवताओं ने भगवान शिव की परीक्षा करनी चाही| वह देवों के गुरु वृहस्पति के साथ कैलाश पर्वत पर पहुंचे|

एक श्रेष्ठ पुत्र की प्राप्ति हेतु भगवान शिव से आज्ञा लेकर पार्वती ने एक वर्ष तक चलने वाले पुण्यक व्रत का समापन किया|

पूर्वकाल में नर्मदा नदी के तट पर नर्मपुर नामक एक नगर था| वहां विश्वानर नामक एक मुनि रहते थे| वे परम शिव भक्त व जितेंद्रिय थे|

विवाह संपन्न होने के बाद शिव अपनी नवविवाहिता पत्नी पार्वती को साथ लेकर कैलाश पर्वत लौट आए| वहां नंदी ने पहले से ही तैयार कर रखी थी|

विवाह संपन्न होने के बाद शिव अपनी नवविवाहिता पत्नी पार्वती को साथ लेकर कैलाश पर्वत लौट आए| वहां नंदी ने पहले से ही तैयार कर रखी थी|

कर्ण को युद्ध में मार गिराने के लिए अर्जुन पाश्पतास्त्र प्राप्त करना चाहता था|

एक समय पृथ्वी पर लगातार बारह वर्षों तक भयंकर अकाल पड़ा| अकाल के समय न कहीं नभ पर बादल दिखाई दिए और न ही धरा पर कहीं हरियाली|

पूर्वकाल में शिलाद नामक एक धर्मात्मा मुनि ने अपने पितरों के आदेश से मृत्युहीन एवं अयोनिज पुत्र की कामना से भगवान शिव की कठोर तपस्या की|

एक बार भगवती पार्वती के साथ भगवान शिव पृथ्वी पर भ्रमण कर रहे थे| भ्रमण करते हुए वे एक वन-क्षेत्र से गुजरे|

एक बार भगवान शिव कैलाश पर्वत पर वेदों का रहस्य पार्वती को समझाने लगे| पार्वती बड़े ध्यान से सुन रही थीं, किंतु बीच-बीच में वे ऊंघने भी लगती थीं|

दैत्यराज बलि के सौ पुत्र थे| जिनमें वाणासुर सबसे बड़ा था|

ऋषि उपमन्यु बड़े प्रेम-व्रती थे| दिन-रात अपने प्रेम के प्रसून शिवजी के चरणों पर चढ़ाया करते थे| न खाने की सुधि, न विश्राम की चिंता|

प्राचीन काल में कांपिल्य नगर में यज्ञदत नामक एक परम तपस्वी एवं सदाचारी ब्राह्मण रहते थे| वे संपूर्ण वेद-वेदांगों के ज्ञाता और सर्वदा श्रोत-स्मार्त्त कर्मों में प्रवृत्त रहते थे|

त्रेता युग की बात है| कैलाश पर्वत पर पार्वती भगवान शिव के साथ प्रात: भ्रमण कर रही थीं| शिव बड़े प्रसन्नचित थे|

एक बार भगवन शिव भगवती पार्वती के साथ कैलास के शिखर पर विहार कर रहे थे| उस समय पार्वती का सौंदर्य खिल रहा था|

ब्रह्मा जी के पौत्र क्षुप एवं महर्षि-च्यवन के पुत्र दधीचि आपस में घनिष्ठ मित्र थे| एक बार दोनों में एक विवाद उठ खड़ा हुआ|

प्राचीनकाल में नंदी नामक वैश्य अपनी नगरी के एक धनी-मानी और प्रतिष्ठित पुरुष थे| वे बड़े सदाचारी और वर्णाश्रमोचित धर्म को दृढ़ता से पालन करते थे|

प्राचीन समय में अर्बुद नामक पर्वत के पास आहुक नाम का एक भील रहता था| उसकी पत्नी का नाम आहुका था|

विश्रवा मुनि का पुत्र रावण महान शूरवीर तथा विद्वान था| अपने पिता से उसने वेदों और शास्त्रों का अध्ययन किया हुआ था|

एक बार पृथ्वी पर जल-वृष्टि न होने के कारण चारों ओर अकाल फैला हुआ था| सरिता, ताल-तलैया और सरोवर सूख गए थे|

महाराज सगर के साठ हजार पुत्र कपिल मुनि की क्रोधाग्नि से भस्म हो गए थे|

शिव की पहली पत्नी थीं सती| यह विवाह उन्होंने सती के पिता दक्ष की इच्छा के विरुद्ध किया था|

दक्ष प्रजापति की कई पुत्रियां थीं| सभी पुत्रियां गुणवती थीं, पर दक्ष के मन में संतोष नहीं था|

किसी गांव में एक निर्धन ब्राह्मण अपनी पत्नी और पुत्र के साथ रहता था| ब्राह्मण को गांव से जो भिक्षा मिलती, उसी से वह अपने परिवार का भरण-पोषण करता था|

इक्ष्वाकु कुल में बहुत पहले एक पुण्यात्मा राजा राज्य करता था| उसका नाम मित्रसह था| वह बहुत धीर-वीर और श्रेष्ठ धनुर्धारी था|

एक समय की बात है कि देवर्षि नारद ने विषय-वासनाओं पर विजय प्राप्त करने के लिए परब्रह्म की कठोर साधना की|

एक बार भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए मृकंडु मुनि ने कठोर तपस्या की| उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिए|

वैदिक काल में त्रिपुर नाम का एक असुर राजा था| उसने नागों, यक्षों, गंधर्वों तथा किन्नरों को जीतकर अपना राज्य दूर-दूर तक फैला लिया|

पार्वती जब भी अपने पति शिव के साथ दूसरे देवताओं के निवास स्थान पर जातीं और वहां उनके सजे-धजे सुंदर भवनों को देखतीं तो उन्हें बड़ी हीनता का बोध होता|

दैत्यराज शकुनि के पुत्र का नाम वृकासुर था| वृकासुर बहुत ही महत्वकांक्षी युवक था और उसकी हर समय यही इच्छा रहती थी कि वह संसार का अधिपति बन जाए|

प्राचीनकाल से ही काशी शिव-क्रीड़ा का केंद्र रहा है| एक बार भगवान शिव पार्वती सहित काशी पधारे| वे कुछ दिन काशी में रुके, तत्पश्चात मंदराचल पर चले गए|

तुलसी का मन राम में इतना रम गया था कि वे अपना सारा दुख-दर्द भूल चुके थे| अब उन्हें पत्नी द्वारा किए गए अपमान के प्रति भी कोई शिकायत नहीं थी|

राज्याभिषेक के पश्चात श्रीराम ने कौसल राज्य की जनता को एक भारी दावत दी|

हनुमान जी जब लंका दहन करके लौट रहे थे, तब उन्हें समुद्रोलंघन, सीतान्वेषण, रावण मद-मर्दन एवं लंका दहन आदि कार्यों का कुछ गर्व हो गया|

द्वापर युग में अर्जुन भगवान शिव की तपस्या करके उन्हें प्रसन्न करते और उनसे पाशुपत नामक अमोघ अस्त्र लिए हिमालय में पहुंचे तो जंगल में उनकी भेंट एक वानर से हो गई|

प्रातःकाल का समय था, हनुमान जी श्रीराम के ध्यान में डूबे थे| तन-मन का होश न था| समुद्र की लहरों का शोर तक उन्हें सुनाई नहीं दे रहा था|

रावण के दस सिर और बीस हाथ कटने पर भी पुनः जुड़ जाते थे| यह एक चमत्कार था| कई बार उसने राम के साथ युद्ध किया, पर हर बार वह लंका सुरक्षित लौट जाता था|

एक बार अर्जुन भगवान शंकर की तपस्या करने हिमालय के जंगलों में चले गए और शिव की घोर तपस्या में मग्न हो गए|

लक्ष्मण के शेल द्वारा घायल होने के पश्चात सभी देवताओं को बुलाया गया| शिव, ब्रह्मा, यम, कुबेर, वायुदेव आदि सभी वहां पहुंच गए|

एक बार भगवान श्रीकृष्ण ने सोचा कि अपने कहलाने वाले भक्तों एवं सेवकों में जो अभिमान और दुर्गुण प्रवेश कर दिए गए हैं उन्हें अवश्य दूर करना चाहिए|

भगवान श्रीराम जब समुद्र पार सेतु बांध रहे थे, तब विघ्न-निवारणार्थ पहले उन्होंने गणेश जी की स्थापना कर नवग्रहों की नौ प्रतिमाएं नल के हाथों स्थापित करवाई|

हनुमान जी बड़े आश्चर्य में थे| अब तक श्रीराम ने उनकी किसी भी बात पर कभी ‘ना’ नहीं की थी| किंतु उस दिन न जाने क्यों वह बार-बार हनुमान जी के प्रस्ताव को ठुकरा रहे थे|

समुद्र पार जाने के लिए पुल के निर्माण का काम प्रगति पर था| राम की सेना उत्साह से फूली नहीं समा रही थी| भालू-वानर भाग-भागकर काम कर रहे थे|

लंका युद्ध की समाप्ति के पश्चात श्रीराम सभी वानरों तथा राक्षसों के साथ अयोध्या की ओर पुष्पक विमान द्वारा चले|

एक दिन की बात है कि भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न तीनों भाई माता जानकी के पास पहुंचे| माता जानकी ने पूछा – “आज तीनों भाई एक साथ कैसे पधारे?”

जगजननी जानकी और जगत्त्राता प्रभु श्रीराम को अयोध्या के सिंहासन पर आसीन देखकर सर्वत्र हर्ष व्याप्त हो गया|

एक बार हनुमान जी ने अपने प्रभु श्रीराम से अपनी माता अजना के दर्शनार्थ जाने की आगया मांगी| प्रभु ने उन्हें सहर्ष आज्ञा प्रदान कर दी|

श्रीरामश्वमेध का अश्व भ्रमण करता हुआ महर्षि वाल्मीकि के पुनीत आश्रम के समीप पहुंचा| प्रातःकाल का समय था|

श्रीराम के अश्वमेध का अश्व भ्रमण करता हुआ प्रख्यात कुंडलपुर के समीप पहुंचा| वहां के अत्यंत धर्मात्मा नरेश का नाम सुरथ था|

भगवान श्रीराम के अश्वमेध का अश्व घूमता हुआ हेमकूट पर्वत के एक विशाल उद्यान में पहुंचा ही था कि वहां अकस्मात उसका सारा शरीर अकड़ गया|

भगवान श्रीराम के अश्वमेध यज्ञ के अश्व के साथ शत्रुघ्न की सेना चक्रांका नगरी के समीप पहुंची| उस नगरी के नरेश धर्मात्मा सुबाहु थे|

हनुमान अगस्त्य जी की प्रेरणा से भगवान श्रीराम ने अश्वमेध यज्ञ करने का संकल्प किया|

लंकाधीश रावण क्रोध से दांत किटकिटा रहा था| उसके सारे प्रमुख बलशाली योद्धा युद्ध में मारे जा चुके थे|

श्रीराम और रावण युद्ध चरमसीमा पर पहुंच चुका था| एक-एक करके रावण के अनेक सेनापति, पुत्र मेघनाथ, भाई कुंभकर्ण समेत कई राक्षस मारे जा चुके थे|

राम और रावण की सेनाओं में भयंकर युद्ध चल रहा था| रावण का पुत्र मेघनाथ लक्ष्मणके सम्मुख युद्ध में रत था|

भगवान श्रीराम ने अपने प्रतिज्ञा पूरी की| उन्होंने बालि का वध करके सुग्रीव को भयमुक्त करके किष्किंधा का राज्य सौंप दिया|

सूर्यदेव से शिक्षा प्राप्त करके हनुमान जी वापस कांचनगिरी पर पहुंचे| माता अंजना, पिता केसरी उन्हें सम्मुख पाकर बहुत हर्षित हुए|

माता अंजना अपने पुत्र की मानसिक स्थिति देखकर कभी कभी उदास हो जातीं और वानरराज केसरी तो प्रायः चिंतित ही रहा करते|

बालक हनुमान बड़े ही चंचल और नटखट थे| एक तो प्रलयंकर शंकर के अवतार, दूसरे कपि-शावक, उस पर देवताओं द्वारा प्रदत्त अमोघ वरदान|

बालक पर सर्वाधिक प्रभाव पड़ता है माता के जीवन एवं उसकी शिक्षा का| आदर्श माताएं पुत्र को श्रेष्ठ एवं आदर्श बना देती हैं|

माता अंजना अपने प्राणप्रिय पुत्र हनुमान का लालन-पालन बड़े ही मनोयोगपूर्वक करतीं| कपिराज केसरी भी उन्हें अत्यधिक प्यार करते|

हजारों वर्ष पहले कांचगिरि (सुमेरु पर्वत) पर वानरराज केसरी निवास करते थे| उनकी पत्नी का नाम अंजना था, जो वानरराज कुंजर की पुत्री थीं| पति-पत्नी दोनों बहुत सुखी थे|

मित्रो! पहली यात्रा में मुझ पर जो विपत्तियां पड़ी थीं, उनके कारण मैंने निश्चय कर लिया था कि अब व्यापार यात्रा न करूंगा और अपने नगर में सुख से रहूंगा|

खलीफा हारूं रशीद के शासन काल में एक गरीब मजदूर रहता था, जिसका नाम हिन्दबाद था|

“जहांपनाह! मेरी मां मुझे लेकर अपने घर में आई ताकि उसे अकेलापन न खले, फिर उसने मेरा विवाह इसी नगर के बड़े आदमी के बेटे के साथ कर दिया|

युवक बोला, “मेरे पिता इस नगर के बादशाह थे| उनका राज्य बड़ा विस्तृत था| किंतु बादशाह और उसके सभी अधीनस्थ लोग अग्निपूजक थे|

जुबैदा ने खलीफा के सामने सिर झुकाकर निवेदन किया, “हे आलमपनाह! मेरी कहानी बड़ी ही विचित्र है, आपने अभी तक इस प्रकार की कोई कहानी नहीं सुनी होगी|

मेरा नाम अजब है और मैं महाऐश्वर्यशाली बादशाह किसब का बेटा हूं| पिता के स्वर्गवास के बाद मैं सिंहासनारूढ़ हुआ और उसी नगर में रहने लगा, जिसे मेरे पिता ने अपने राजधानी बनाया था|

किसी नगर में एक भला आदमी रहता था| उसका पड़ोसी उसके प्रति ईर्ष्या और द्वेष रखता था|

मैं एक बड़े राजा का पुत्र हूं| बचपन से ही मेरी विद्यार्जन में गहरी रुचि थी| मेरे पिता ने दूर-दूर से प्रख्यात शिक्षक बुलाकर मेरी शिक्षा के लिए रखे|

मैं एक बड़े बादशाह का बेटा हूं| मेरा चाचा भी एक समीपवर्ती राज्य का स्वामी था| मेरे चाचा का एक बेटा मेरी उम्र का था और उसकी दूसरी संतान एक पुत्री थी|

खलीफा फारुन-अल-रशीद के शासन में बगदाद में एक मजदूर रहता था| वह बड़ा हंसमुख और बातूनी था|

फिर वह युवक बादशाह को अपनी आपबीती सुनाने लगा, “मेरे पिता का नाम महमूद शाह था| वे काले द्वीपों के बादशाह थे| वे काले द्वीप चार विख्यात पर्वत हैं|

मछुवारा यह कहानी सुनाकर दैत्य से कहने लगा, “यदि गरीक बादशाह हकीम दूबां की हत्या न करता, तो भगवान उसे ऐसा दंड न देता|

मंत्री गरीक बादशाह को यह किस्सा सुनाकर कहने लगा, “जहांपनाह! आप मेरी बात को इतने हल्के तौर पर न लें और मेरा विश्वास करें|”

प्राचीन काल में एक राजा था| उसके राजकुमार को मृगया का बड़ा शौक था| राजा उसे बहुत चाहता था| वह राजकुमार की किसी भी इच्छा को अस्वीकार नहीं करता था|

किसी गांव में एक बड़ा ही शरीफ आदमी रहता था| उसकी पत्नी बेहद सुंदर थी और वह आदमी उससे बहुत प्रेम करता था|

फारस देश में रुमा नामक एक नगर था| उस नगर के बादशाह का नाम गरीक था|

किसी समय धार्मिक प्रवृत्ति का एक वृद्ध मुसलमान मछुआरा नियमित रूप से प्रतिदिन सवेरे उठकर नदी के किनारे जाता और चार बार नदी में जाल फेंकता था|

“हे दैत्यराज! ये दोनों काले कुत्ते मेरे सगे भाई हैं| हमारे पिता ने मरते समय हम तीनों भाइयों को तीन हजार अशर्फियां दी थीं| हम लोग उस पैसे से व्यापार चलाने लगे|

“हे दैत्यराज! जिस हिरणी को आप मेरे साथ देख रहे हैं, यह वास्तव में मेरी पत्नी है| जब यह बारह वर्ष की थी, तभी इसके साथ मेरा निकाह हुआ था|

एक व्यापारी था| वह बहुत ही ईमानदार था| व्यापार के सिलसिले में वह अकसर दूसरे शहरों में जाता रहता था| एक बार व्यापार के सिलसिले में वह कहीं जा रहा था|

यह कहानी सुनाकर मंत्री ने शहरजाद से कहा, “अगर तुमने जिद्द न छोड़ी तो मैं तुम्हें ऐसा ही दंड दूंगा, जैसा उस व्यापारी ने अपनी स्त्री को दिया था|”

एक बड़ा व्यापारी था, गांव में जिसके पास बहुत से मकान, पालतू पशु और कारखाने थे|

बहुत समय पहले फारस में एक बादशाह था| वह बहुत ही न्यायप्रिय एवं प्रजापालक था| इसी कारण उसकी प्रजा उसे बहुत चाहती थी|

एक बाबू जी थे| अंग्रेजी पढ़े-लिखे, कोट-बूट-हैट-पतलून पहनने वाले| वे सदा अंग्रेजी ही बोलते थे|

एक किसान ने एक बिल्ली पाल रखी थी| सफेद कोमल बालों वाली बिल्ली किसान की खाटपर ही रात को उसके पैर के पास सो जाती थी|

एक बड़ा भारी जंगल था, पहाड़ था और उसमें पानी के शीतल निर्मल झरने थे| जंगल में बहुत-से पशु रहते थे|

एक लड़का बड़ा दुष्ट था| वह चाहे जिसे गाली देकर भाग खड़ा होता| एक दिन एक साधु बाबा एक बरगद के नीचे बैठे थे| लड़का आया और गाली देकर भागा|

एक बार एक देवता पर ब्रह्माजी प्रसन्न हो गये| उस देवता को महर्षि दुर्वासा ने शाप दे दिया था कि ‘तू अब देवता नहीं रहेगा|’ देवता ने कहा – ‘न सही देवता|

दक्षिण अमेरिका की बात है| उन दिनों वहाँ सोने की खान निकली थी| दूर-दूर के व्यापारी और बहुत-से मजदूर वहाँ पहुँचे|

एक पुराना मन्दिर था| दरारें पड़ी थीं| खूब जोर से वर्षा हुई और हवा चली| मन्दिर बहुत-सा भाग लड़खड़ा कर गिर पड़ा| उस दिन एक साधु वर्षा में उस मन्दिर में आकर ठहरे थे|

एक ग्राम में एक लड़का रहता था| उसके पिता ने उसे पढ़ने काशी भेज दिया| उसने पढ़ने में परिश्रम किया| ब्राह्मण का लड़का था, बुद्धि तेज थी|

विलायत में अकाल पड़ गया| लोग भूखे मरने लगे| एक छोटे नगर में एक धनी दयालु पुरुष थे| उन्होंने सब छोटे लड़कों को प्रतिदिन एक रोटी देने की घोषणा कर दी|

एक सच्ची घटना है| नाम मैं नहीं बताऊँगा| बहुत-से लड़के पाठशाला से निकले| पढ़ाई के बीच में दोपहर की छुट्टी हो गयी थी|

एक डॉक्टर साहब हैं| खूब बड़े नगर में रहते हैं| उनके यहाँ रोगियों की बड़ी भीड़ रहती है| घर बुलाने पर उनको फीस के बहुत रुपये देने पड़ते हैं|

🙏 सतनाम वाहे गुरु, गुरु पर्व की असीमित शुभकामनाएं... आप सभी पर वाहे गुरु की मेहर हो! 23 Nov 2018 🙏