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गोरखमते में योगियों से चर्चा – साखी श्री गुरु नानक देव जी

गोरखमते में योगियों से चर्चा

श्री गुरु नानक देव जी योगियों के प्रसिद्ध स्थान गोरखमते पहुंचे| वहां उन्होंने उनके डेरे से कुछ दूर बैठकर कीर्तन आरम्भ कर दिया|

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सभी योगी इकट्ठे हो गए व पूछने लगे की आप कौन है और कहां से आए है आपका मत क्या है? यहाँ किस तरह आए है? गुरु जी ने उत्तर दिया – हम निरंकारी है और निरंकार के देश से आए है| योगियों ने गुरु जी को योग मत धारण करने को कहा कि आप को भी सच्चा मार्ग प्राप्त हो जाएगा|

गुरु जी ने उत्तर दिया, “सच्चा मार्ग किसी वेश में सीमित नहीं है| जो व्यक्ति अपने आप को संसार की बुराइयों से बचाकर कर रखता है उसको ही सच्चा मार्ग प्राप्त होता है|” सिद्धों ने आपको चिह्न, खिंथा, मुंदरा, झोली व डंडा धारण करने को कहा व साथ-साथ रंगदार वस्त्र उतारकर राख मलने को भी कह दिया| गुरु जी ने कहा इन चिह्नों को धारण करने से ईश्वर से नहीं जुड़ सकते, आप जी ने यहां शब्द का उच्चारण भी किया|

हे योगी जनों! खिंथा और डंडा धारण करके शरीर पर राख मलना, सिंडी बजानी और सिर मुंडवाने से योग नहीं होता| योग की युक्ति यह है कि माया में रहते हुए ऐसे शव के समान अडोल, अनेच्छित व निर्विकार हो जाओ| सिंडी को फूंक मारने के बिना ही जब अनहद नाद की ध्वनि उठे तो अलख निरंजन पद को ग्रहण करते है|

गुरु जी का यह वचन सुनकर सिद्ध स्वेच्छा से आदेश करते-करते पहाड़ों की ओर चल दिए|

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