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दयालु गुरु श्री अर्जन देव जी – साखी श्री गुरु अर्जन देव जी

श्री गुरु अर्जन देव जी के दरबार में दो डूम सत्ता और बलवंड कीर्तन करते थे| एक दिन डूमो ने गुरु जी से आर्थिक सहायता माँगी कि उनकी उनकी बहन का विवाह है| गुरु जी कहने लगे सुबह कीर्तन की जो भेंट आएगी वह सारी रख लेना| ईश्वर की कृपा से उस दिन बहुत कम भेंट आई|

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जिसको लेने से डूमों ने इंकार कर दिया| वे गुस्से में भर गए व गुरु दरबार पर कीर्तन करना ही छोड़ दिया| गुरु जी ने सिखों को उनके पास भेजा कि गुरु दरबार पर आकर फिर से कीर्तन करना शुरू करें|

पर उन दोनों ने आने से इंकार कर दिया| गुरु जी कहने लगे कि लगता है कि उन्हें अहंकार हो गया है| अब हमारा कोई भी गुरु सिक्ख इनको मुहँ ना लगाये| जो इनकी सिफारिश करेगा उसका मुँह का करके गधों पर बिठाकर पेश किया जायेगा|

कुछ समय बाद जब वे भूख से दुखी हो गए|वे सिखों से कहने लगे कि हमें माफ कार दें| परन्तु किसे ने कोई बात ना मानी|,वे तंग होकर लाहौर भाई लधा जी के पास आए| उन्होंने सारी बात गुरु जी को बताई कि आप ही हम पर दया करके गुरु जी से क्षमा दिला दें|

उनकी बात सुनकर लधा जी को तरस आ गया|  उन पर तरस खाकर व गुरु जी क आज्ञा का पालन करे हुए अपना मुँह काला कर लिया|गधे पर चढ़ कर उनके साथ गुरु जी के पास आए| गुरु जी के पास आकर उन्होंने प्रार्थना कि महाराज! इनको क्षमा कर दो| ये बहुत दुखी है| आप से क्षमा मांगते है|

उनकी बात सुनकर गुरु जी कहने लगे कि जिस मुख से इन्होंने गुरु घर कि निन्दा कि है,उसी मुख से गुरु घर कि स्तुति करेंगे| तभी इन्हे क्षमा किया जाएगा|ऐसी बात सुनकर सत्ते व बलवंड ने गुरु जी के सामने खड़े होकर राग रामकली में एक वार के द्वारा पाँचो गुरु साहिबान कि शलाघा गयी| यह सुनकर गुरु जी प्रसन्न हो गए| उन्हें कीर्तन करने कि भी आज्ञा गुरु जी द्वारा दे दी गई|

श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के पन्ना ८६६  पर यह “रामकली की वार राइ बलवंड तथा सत्ते डूमि आखी||” के नाम से दर्ज है| 

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