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16. मौसलपर्व ()

1 [वै] षट तरिंशे तव अथ संप्राप्ते वर्षे कौरवनन्दन
ददर्श विपरीतानि निमित्तानि युधिष्ठिरः

1 [ज] कथं विनष्टा भगवन्न अन्धका वृष्णिभिः सह
पश्यतॊ वासुदेवस्य भॊजाश चैव महारथाः

1 [वै] एवं परयतमानानां वृष्णीनाम अन्धकैः सह
कालॊ गृहाणि सार्वेणां परिचक्राम नित्यशः

1 [वै] काली सत्री पाण्डुरैर दन्तैः परविश्य हसती निशि
सत्रियः सवप्नेषु मुष्णन्ती दवारकां परिधावति

1 [वै] ततॊ ययुर दारुकः केशवश च; बभ्रुश च रामस्य पदं पतन्तः
अथापश्यन रामम अनन्तवीर्यं; वृक्षे सथितं चिन्तयानं विविक्ते

1 [वै] दारुकॊ ऽपि कुरून गत्वा दृष्ट्वा पार्थान महारथान
आचष्ट मौसाले वृष्णीन अन्यॊन्येनॊपसंहृतान

1 [वै] तं शयानं महात्मानं वीरम आनक दुन्दुभिम
पुत्रशॊकाभिसंतप्तं ददर्श कुरुपुंगवः

1 [वै] एवम उक्तः स बीभत्सुर मातुलेन परंतपः
दुर्मना दीनमनसं वसुदेवम उवाच ह

1 [वै] परविशन्न अर्जुनॊ राजन्न आश्रमं सत्यवादिनः
ददर्शासीनम एकान्ते मुनिं सत्यवती सुतम

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