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Home06. लंकाकाण्ड

06. लंकाकाण्ड (3)

श्लोक

रामं कामारिसेव्यं भवभयहरणं कालमत्तेभसिंहं

योगीन्द्रं ज्ञानगम्यं गुणनिधिमजितं निर्गुणं निर्विकारम्।

देखि पवनसुत कटक बिहाला। क्रोधवंत जनु धायउ काला॥

महासैल एक तुरत उपारा। अति रिस मेघनाद पर डारा॥

छंद– जब कीन्ह तेहिं पाषंड। भए प्रगट जंतु प्रचंड॥

बेताल भूत पिसाच। कर धरें धनु नाराच॥१॥

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