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भगत कबीर जी के भजन (12)

तूने रात गँवायी सोय के, दिवस गँवाया खाय के।
हीरा जनम अमोल था, कौड़ी बदले जाय॥

नैया पड़ी मंझधार्
नैया पड़ी मंझधार गुरु बिन कैसे लागे पार्॥

बहुरि नहिं आवना या देस॥

जो जो ग बहुरि नहि आ  पठवत नाहिं सॅंस॥ १॥

बीत गये दिन भजन बिना रे।
भजन बिना रे  भजन बिना रे॥

भजो रे भैया राम गोविंद हरी।
राम गोविंद हरी भजो रे भैया राम गोविंद हरी॥

मन लाग्यो मेरो यार
मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में॥

राम बिनु तन को ताप न जाई।
जल में अगन रही अधिकाई॥
राम बिनु तन को ताप न जाई॥

रे दिल गाफिल गफलत मत कर
एक दिना जम आवेगा॥

🙏 ♻ प्रयास करें कि जब हम आये थे उसकी तुलना में पृथ्वी को एक बेहतर स्थान के रूप में छोड़ कर जाएं। सागर में हर एक बूँद मायने रखती है। ♻ 🙏