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भगत भगवान की वार्ता – साखी श्री गुरु हरिराय जी

एक भगवान गिर सन्यासी साधु ने गुरु की बहुत महिमा सुनी कि आप ईश्वर अवतार हैं| मन में यह धारणा लेकर गुरु दर्शन के लिए आ गए कि अगर गुरु सच्चा है तो यह मुझे चतुर्भुज रूप में दर्शन देंगे| मैं तब ही इन्हें सच्चा ईश्वर का अवतार मानूंगा| 

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मन में यह भाव लिए जब भगवान गिर गुरु के दरबार में पहुँचे तो उनकी हैरानी की सीमा ना रही| वह अपनी सुध-बुध खो बैठे| वह पत्थर की मूर्ति बनकर कुछ समय वही खड़े रहे| उन्होंने देखा कि संगत बैठी है कीर्तन भी चल रहा है| एक चतुर्भुज स्याम मूर्ति चक्कर सिंघासन के ऊपर सुशोभित है| यह सब देखकर अपनी चेतना को कायम करते हुआ उसने गुरु के चरणों में डन्डवत होकर माथा टेका जब उठकर देखा गुरु जी अपने गुरु स्वरुप में दर्शन दे रहे हैं| भगत भगवान यह कौतक देखकर बहुत प्रभावित हुए और कहने लगे कि महाराज! मुझे अपना सिख बनाकर उपदेश दो|

गुरु जी ने उसकी श्रद्धा भक्ति देखकर चरणामृत दिया और सतिनाम का उपदेश दिया और वचन किया – “भक्त भगवान दर सहि परवान” यह उपदेश और वरदान लेकर भगत भगवान ने सिखी का खूब प्रचार किया|

 

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