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02. अयोध्याकाण्ड (7)

श्लोक– यस्याङ्के च विभाति भूधरसुता देवापगा मस्तके

भाले बालविधुर्गले च गरलं यस्योरसि व्यालराट्।

उतरु न देइ दुसह रिस रूखी। मृगिन्ह चितव जनु बाघिनि भूखी॥

ब्याधि असाधि जानि तिन्ह त्यागी। चलीं कहत मतिमंद अभागी॥

कृपासिंधु बोले मुसुकाई। सोइ करु जेंहि तव नाव न जाई॥

वेगि आनु जल पाय पखारू। होत बिलंबु उतारहि पारू॥

केवट कीन्हि बहुत सेवकाई। सो जामिनि सिंगरौर गवाँई॥

होत प्रात बट छीरु मगावा। जटा मुकुट निज सीस बनावा॥

राम सुना दुखु कान न काऊ। जीवनतरु जिमि जोगवइ राऊ॥

पलक नयन फनि मनि जेहि भाँती। जोगवहिं जननि सकल दिन राती॥

तुम्ह प्रिय पाहुने बन पगु धारे। सेवा जोगु न भाग हमारे॥

देब काह हम तुम्हहि गोसाँई। ईधनु पात किरात मिताई॥

प्रभु पद पदुम पराग दोहाई। सत्य सुकृत सुख सीवँ सुहाई॥

सो करि कहउँ हिए अपने की। रुचि जागत सोवत सपने की॥

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