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01. बालकाण्ड (8)

श्लोक-

वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि।

मङ्गलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥१॥

बिष्नु जो सुर हित नरतनु धारी। सोउ सर्बग्य जथा त्रिपुरारी॥

खोजइ सो कि अग्य इव नारी। ग्यानधाम श्रीपति असुरारी॥

जसि बिबाह कै बिधि श्रुति गाई। महामुनिन्ह सो सब करवाई॥

गहि गिरीस कुस कन्या पानी। भवहि समरपीं जानि भवानी॥

सुनु मृदु गूढ़ रुचिर बर रचना। कृपासिंधु बोले मृदु बचना॥

जो कछु रुचि तुम्हेर मन माहीं। मैं सो दीन्ह सब संसय नाहीं॥

एक बार जननीं अन्हवाए। करि सिंगार पलनाँ पौढ़ाए॥

निज कुल इष्टदेव भगवाना। पूजा हेतु कीन्ह अस्नाना॥

भूप सहस दस एकहि बारा। लगे उठावन टरइ न टारा॥

डगइ न संभु सरासन कैसें। कामी बचन सती मनु जैसें॥

गरजहिं गज घंटा धुनि घोरा। रथ रव बाजि हिंस चहु ओरा॥

निदरि घनहि घुर्म्मरहिं निसाना। निज पराइ कछु सुनिअ न काना॥

देव पितर पूजे बिधि नीकी। पूजीं सकल बासना जी की॥

सबहिं बंदि मागहिं बरदाना। भाइन्ह सहित राम कल्याना॥

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