Homeधार्मिक ग्रंथ (Page 45)

धार्मिक ग्रंथ

1 [ज] शरुतस तवत्तॊ मया विप्र पूर्वेषां संभवॊ महान
उदाराश चापि वंशे ऽसमिन राजानॊ मे परिश्रुताः

1 [लॊमष] धनंजयेन चाप्य उक्तं यत तच छृणु युधिष्ठिर
युधिष्ठिरं भरातरं मे यॊजयेर धर्म्यया शरिया

1 वनस्पतीन भक्ष्यफलान न छिन्द्युर विषये तव
बराह्मणानां मूलफलं धर्म्यम आहुर मनीषिणः

1 [व] तं भुक्तवन्तम आश्वस्तं निशायां विदुरॊ ऽबरवीत
नेदं सम्यग वयवसितं केशवागमनं तव

1 [स] सवसैन्यं निहतं दृष्ट्वा राजा दुर्यॊधनः सवयम
अभ्यधावत संक्रुद्धॊ भीमसेनम अरिंदमम

1 [स] आत्मापराधात संभूतं वयसनं भरतर्षभ
पराप्य पराकृतवद वीर न तवं शॊचितुम अर्हसि

1 [व] स परविश्य यथान्यायं पाण्डवानां निवेशनम
पितामहीम अभ्यवदत साम्ना परमवल्गुना

1 [य] कीदृशेभ्यः परदातव्यं भवेच छराद्धं पितामह
दविजेभ्यः कुरुशार्दूल तन मे वयाख्यातुम अर्हसि

1 [व] इक्ष्वाकुवंशप्रभवॊ राजासीत पृथिवीपतिः
महाभिष इति खयातः सत्यवाक सत्यविक्रमः

1 [व] ततः परयान्तं कौन्तेयं बराह्मणा वनवासिनः
अभिगम्य तदा राजन्न इदं वचनम अब्रुवन

1 यान अङ्गिराः कषत्रधर्मान उतथ्यॊ बरह्म वित तमः
मान्धात्रे यौवनाश्वाय परीतिमान अभ्यभाषत

1 [भ] यथा बरूयान महाप्राज्ञॊ यथा बरूयाद विचक्षणः
यथा वाच्यस तवद्विधेन सुहृदा मद्विधः सुहृत

1 [स] तस्मिन महति संक्रन्दे राजा दुर्यॊधनस तदा
गाङ्गेयम उपसंगम्य विनयेनाभिवाद्य च

1 [स] शृणुष्वैक मना राजन यन मां तवं परिपृच्छसि
दराव्यमाणे बले तस्मिन हार्दिक्येन महात्मना

1 [व] शमयित्वा पशून अन्यान विधिवद दविजसत्तमाः
तुरगं तं यथाशास्त्रम आलभन्त दविजातयः

1 [य] केन संकल्पितं शराद्धं कस्मिन काले किम आत्मकम
भृग्वङ्गिरसके काले मुनिना कतरेण वा

1 [व] ततः परतीपॊ राजा स सर्वभूतहिते रतः
निषसाद समा बह्वीर गङ्गातीरगतॊ जपन

1 [य] न वै निर्गुणम आत्मानं मन्ये देवर्षिसत्तम
तथास्मि दुःखसंतप्तॊ यथा नान्यॊ महीपतिः

1 कालवर्षी च पर्जन्यॊ धर्मचारी च पार्थिवः
संपद यदैषा भवति सा बिभर्ति सुखं परजाः

1 [व] तथा कथयतॊर एव तयॊर बुद्धिमतॊस तदा
शिवा नक्षत्रसंपन्ना सा वयतीयाय शर्वरी

1 [स] पुत्रं तु निहतं शरुत्वा इरावन्तं धनंजयः
दुःखेन महताविष्टॊ निःश्वसन पन्नगॊ यथा

1 [स] ते किरन्तः शरव्रातान सर्वे यत्ताः परहारिणः
तवरमाणा महाराज युयुधानम अयॊधयन

1 [ज] पितामहस्य मे यज्ञे धर्मपुत्रस्य धीमतः
यद आश्चर्यम अभूत किं चित तद भवान वक्तुम अर्हति

1 [भ] तथाविधौ परवृत्ते तु सर्व एव महर्षयः
पितृयज्ञान अकुर्वन्त विधिदृष्टेन कर्मणा

1 [षम्तनु] आपवॊ नाम कॊ नव एष वसूनां किं च दुष्कृतम
यस्याभिशापात ते सर्वे मानुषीं तनुम आगताः

1 [व] ते तथा सहिता वीरा वसन्तस तत्र तत्र ह
करमेण पृथिवीपाल नैमिषारण्यम आगताः

1 कथं धर्मे सथातुम इच्छन राजा वर्तेत धार्मिकः
पृच्छामि तवा कुरुश्रेष्ठ तन मे बरूहि पिता मह

1 [व] तेष्व आसीनेषु सर्वेषु तूष्णींभूतेषु राजसु
वाक्यम अभ्याददे कृष्णः सुदंष्ट्रॊ दुन्दुभिस्वनः

1 [स] ततॊ दुर्यॊधनॊ राजा शकुनिश चापि सौबलः
दुःशासनश च पुत्रस ते सूतपुत्रश च दुर्जयः

1 [स] काल्यमानेषु सैन्येषु शैनेयेन ततस ततः
भारद्वाजः शरव्रातैर महद्भिः समवाकिरत

1 [नकुल] हन्त वॊ वर्तयिष्यामि दानस्य परमं फलम
नयायलब्धस्य सूक्ष्मस्य विप्रदत्तस्य यद दविजाः

1 [य] दविजातयॊ वरतॊपेता हविस ते यदि भुञ्जते
अन्नं बराह्मण कामाय कथम एतत पितामह

1 [व] स एवं शंतनुर धीमान देवराजर्षिसत्कृतः
धर्मात्मा सर्वलॊकेषु सत्यवाग इति विश्रुतः

1 [व] ततः संप्रस्थितॊ राजा कौन्तेयॊ भूरिदक्षिणः
अगस्त्याश्रमम आसाद्य दुर्जयायाम उवास ह

1 यत्राधर्मं परणयते दुर बले बलवत तरः
तां वृत्तिम उपजीवन्ति ये भवन्ति तद अन्वयाः

1 [व] तस्मिन्न अभिहिते वाक्ये केशवेन महात्मना
सतिमिता हृष्टरॊमाण आसन सर्वे सभासदः

1 [स] वाक्शल्यैस तव पुत्रेण सॊ ऽतिविद्धः पितामहः
दुःखेन महताविष्टॊ नॊवाचाप्रियम अण्व अपि

1 [स] दरॊणं स जित्वा पुरुषप्रवीरस; तथैव हार्दिक्य मुखांस तवदीयान
परहस्य सूतं वचनं बभाषे; शिनिप्रवीरः कुरुपुंगवाग्र्य

1 [ज] यज्ञे सक्ता नृपतयस तपः सक्ता महर्षयः
शान्ति वयवसिता विप्राः शमॊ दम इति परभॊ

1 [य] बराह्मणेभ्यः परयच्छन्ति दानानि विविधानि च
दातृप्रतिग्रहीत्रॊर वा कॊ विशेषः पितामह

1 [व] ततॊ विवाहे निर्वृत्ते स राजा शंतनुर नृपः
तां कन्यां रूपसंपन्नां सवगृहे संन्यवेशयत

1 [ल] यदा तव अमन्यतागस्त्यॊ गार्हस्थ्ये तां कषमाम इति
तदाभिगम्य परॊवाच वैदर्भं पृथिवीपतिम

1 अयुद्धेनैव विजयं वर्धयेद वसुधाधिपः
जघन्यम आहुर विजयं यॊ युद्धेन नराधिप

1 [व] जामदग्न्यवचः शरुत्वा कण्वॊ ऽपि भगवान ऋषिः
दुर्यॊधनम इदं वाक्यम अब्रवीत कुरुसंसदि

1 [स] परभातायां तु शर्वर्यां परातर उत्थाय वै नृपः
राज्ञः समाज्ञापयत सेनां यॊजयतेति ह
अद्य भीष्मॊ रणे करुद्धॊ निहनिष्यति सॊमकान

1 [स] ततः स सात्यकिर धीमान महात्मा वृष्णिपुंगवः
सुदर्शनं निहत्याजौ यन्तारम इदम अब्रवीत

1 [ज] धर्मागतेन तयागेन भगवन सर्वम अस्ति चेत
एतन मे सर्वम आचक्ष्व कुशलॊ हय असि भाषितुम

1 [भ] अथात्रि परमुखा राजन वने तस्मिन महर्षयः
वयचरन भक्षयन्तॊ वै मूलानि च फलानि च

1 [व] हते चित्राङ्गदे भीष्मॊ बाले भरातरि चानघ
पालयाम आस तद राज्यं सत्यवत्या मते सथितः

1 [लॊमष] ततॊ जगाम कौरव्य सॊ ऽगस्त्यॊ भिक्षितुं वसु
शरुतर्वाणं महीपालं यं वेदाभ्यधिकं नृपैः

1 अथ यॊ विजिगीषेत कषत्रियः कषत्रियं युधि
कस तस्य धर्म्यॊ विजय एतत पृष्टॊ बरवीहि मे

1 [कण्व] मातलिस तु वरजन मार्गे नारदेन महर्षिणा
वरुणं गच्छता दरष्टुं समागच्छद यदृच्छया

1 [स] अभिमन्यू रथॊदारः पिशंगैस तुरगॊत्तमैः
अभिदुद्राव तेजस्वी दुर्यॊधन बलं महत
विकिरञ शरवर्षाणि वारिधारा इवाम्बुदः

1 [स] जित्वा यवनकाम्बॊजान युयुधानस ततॊ ऽरजुनम
जगाम तव सैन्यस्य मध्येन रथिनां वरः

1 [ज] कॊ ऽसौ नकुल रूपेण शिरसा काञ्चनेन वै
पराह मानुषवद वाचम एतत पृष्टॊ वदस्व मे

1 [भ] अत्रैवॊदाहरन्तीमम इतिहासं पुरातनम
यद्वृत्तं तीर्थयात्रायां शपथं परति तच छृणु

1 [व] ततः सत्यवती दीना कृपणा पुत्रगृद्धिनी
पुत्रस्य कृत्वा कार्याणि सनुषाभ्यां सह भारत

1 [ल] इल्वलस तान विदित्वा तु महर्षिसहितान नृपान
उपस्थितान सहामात्यॊ विषयान्ते ऽभयपूजयत

1 नाधर्मेण महीं जेतुं लिप्सेत जगतीपतिः
अधर्मविजयं लब्ध्वा कॊ ऽनुमन्येत भूमिपः

1 [नारद] एतत तु नागलॊकस्य नाभिस्थाने सथितं पुरम
पातालम इति विख्यातं दैत्यदानव सेवितम

1 [धृ] संप्रमृद्य महत सैन्यं यान्तं शैनेयम अर्जुनम
निर्ह्रीका मम ते पुत्राः किम अकुर्वत संजय

1 [य] यद इदं शराद्धधर्मेषु दीयते भरतर्षभ
छत्रं चॊपानहौ चैव केनैतत संप्रवर्तितम
कथं चैतत समुत्पन्नं किमर्थं च परदीयते

1 [भस] जामदग्न्येन रामेण पितुर वधम अमृष्यता
करुद्धेन च महाभागे हैहयाधिपतिर हतः
शतानि दश बाहूनां निकृत्तान्य अर्जुनस्य वै

1 [य] भूय एवाहम इच्छामि महर्षेस तस्य धीमतः
कर्मणां विस्तरं शरॊतुम अगस्त्यस्य दविजॊत्तम

1 कषत्रधर्मान न पापीयान धर्मॊ ऽसति भरतर्षभ
अभियाने च युद्धे च राजा हन्ति महाजनम

1 [न] हिरण्यपुरम इत्य एतत खयातं पुरवरं महत
दैत्यानां दानवानां च माया शतविचारिणाम

1 [स] दुःशासन रथं दृष्ट्वा समीपे पर्यवस्थितम
भारद्वाजस ततॊ वाक्यं दुःशासनम अथाब्रवीत

1 [य] एवं तदा परयाचन्तं भास्करं मुनिसत्तमः
जमदग्निर महातेजाः किं कार्यं परत्यपद्यत

1 [लॊमष] ततः सवज्री बलिभिर दैवतैर अभिरक्षितः
आससाद ततॊ वृत्रं सथितम आवृत्य रॊदसी

1 के लॊका युध्यमानानां शूराणाम अनिवर्तिनाम
भवन्ति निधनं पराप्य तन मे बरूहि पिता मह

1 [न] अयं लॊकः सुपर्णानां पक्षिणां पन्नगाशिनाम
विक्रमे गमने भारे नैषाम अस्ति परिश्रमः

1 [स] ततॊ दुःशासनॊ राजञ शैनेयं समुपाद्रवत
किरञ शरसहस्राणि पर्जन्य इव वृष्टिमान

1 [य] आरामाणां तडागानां यत फलं कुरुनन्दन
तद अहं शरॊतुम इच्छामि तवत्तॊ ऽदय भरतर्षभ

1 [भस] पुनर भरत वंशस्य हेतुं संतानवृद्धये
वक्ष्यामि नियतं मातस तन मे निगदतः शृणु

श्लोक– यस्याङ्के च विभाति भूधरसुता देवापगा मस्तके

भाले बालविधुर्गले च गरलं यस्योरसि व्यालराट्।

उतरु न देइ दुसह रिस रूखी। मृगिन्ह चितव जनु बाघिनि भूखी॥

ब्याधि असाधि जानि तिन्ह त्यागी। चलीं कहत मतिमंद अभागी॥

कृपासिंधु बोले मुसुकाई। सोइ करु जेंहि तव नाव न जाई॥

वेगि आनु जल पाय पखारू। होत बिलंबु उतारहि पारू॥

केवट कीन्हि बहुत सेवकाई। सो जामिनि सिंगरौर गवाँई॥

होत प्रात बट छीरु मगावा। जटा मुकुट निज सीस बनावा॥

राम सुना दुखु कान न काऊ। जीवनतरु जिमि जोगवइ राऊ॥

पलक नयन फनि मनि जेहि भाँती। जोगवहिं जननि सकल दिन राती॥

तुम्ह प्रिय पाहुने बन पगु धारे। सेवा जोगु न भाग हमारे॥

देब काह हम तुम्हहि गोसाँई। ईधनु पात किरात मिताई॥

प्रभु पद पदुम पराग दोहाई। सत्य सुकृत सुख सीवँ सुहाई॥

सो करि कहउँ हिए अपने की। रुचि जागत सोवत सपने की॥

श्लोक – मूलं धर्मतरोर्विवेकजलधेः पूर्णेन्दुमानन्ददं

वैराग्याम्बुजभास्करं ह्यघघनध्वान्तापहं तापहम्।

श्लोक

केकीकण्ठाभनीलं सुरवरविलसद्विप्रपादाब्जचिह्नं

शोभाढ्यं पीतवस्त्रं सरसिजनयनं सर्वदा सुप्रसन्नम्।

मामवलोकय पंकज लोचन। कृपा बिलोकनि सोच बिमोचन॥

नील तामरस स्याम काम अरि। हृदय कंज मकरंद मधुप हरि॥

छंद- बहु दाम सँवारहिं धाम जती। बिषया हरि लीन्हि न रहि बिरती॥

तपसी धनवंत दरिद्र गृही। कलि कौतुक तात न जात कही॥

उद्धव बचपन से ही सारथी के रूप में श्रीकृष्ण जी की सेवा में रहे, किन्तु उन्होंने श्री कृष्ण जी से कभी न तो कोई इच्छा जताई और न ही कोई वरदान माँगा।

श्लोक – कुन्देन्दीवरसुन्दरावतिबलौ विज्ञानधामावुभौ

शोभाढ्यौ वरधन्विनौ श्रुतिनुतौ गोविप्रवृन्दप्रियौ।

द्रोणाचार्य भरद्वाज मुनिके पुत्र थे| ये संसारके श्रेष्ठ धनुर्धर थे| महाराज द्रुपद इनके बचपनके मित्र थे| भरद्वाज मुनिके आश्रममें द्रुपद भी द्रोणके साथ ही विद्याध्ययन करते थे|

महाराज उशीनर त्याग और शरणागतवत्सलताके अनुपम आदर्श थे| उनके राज्यमें प्रजा अत्यन्त सुखी तथा धन-धान्यसे सम्पन्न थी| सभी लोग धर्माचरणमें रत थे|

कोमार्यावस्थामें कुन्तीको महर्षि दुर्वासाकी सेवाके फलस्वरूप देवताओंके आवाहनका विलक्षण मन्त्र प्राप्त हुआ| मन्त्रशक्तिके परीक्षणके लिये कुन्तीने भगवान् सूर्यका आवाहन किया और कौमार्यावस्थामें ही कुन्तीके द्वारा एक दिव्य बालककी उत्पत्ति हुई|

कलिके अंशावतार दुर्योधन धृतराष्ट्रके ज्येष्ठ पुत्र थे| ये राज्यलोभी, महत्त्वाकाङ्क्षी तथा अपने शुभचिन्तकोंको भी शत्रुकी दृष्टिसे देखनेवाले और बचपनसे पाण्डवोंके कट्टर शत्रु थे|

महाराज युधिष्ठिर धैर्य, क्षमा, सत्यवादिता आदि दिव्य गुणोंके केन्द्र थे| धर्मके अंशसे उत्पन्न होनेके कारण ये धर्मके गूढ़ तत्त्वोंके व्यावहारिक व्याख्याता तथा भगवान् श्रीकृष्णके अनन्य भक्त थे|

महाभारत धृतराष्ट्र जन्मान्ध थे| वे भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य तथा विदुरकी सलाहसे राज्यका संचालन करते थे| उन्हें कर्तव्याकर्तव्यका ज्ञान था, किंतु पुत्रमोहके कारण बहुधा उनका विवेक अन्धा हो जाता था और वे बाध्य होकर दुर्योधनके अन्यायपूर्ण आचरणका समर्थन करने लगते थे|

पूर्वकालमें वसुश्रेष्ठ द्रोण और उनकी पत्नी धरादेवीने भगवान् की प्रसन्नताके लिये कठोर आराधना की| ब्रह्माजीसे उन्हें भगवान् को पुत्ररूपमें प्राप्त करनेका वर मिला था| ब्रह्माजीके उसी वरदानसे द्रोण और धराका नन्द और यशोदाके रूपमें जन्म हुआ| दोनों पति-पत्नी हुए और भगवान् श्रीकृष्ण-बलरामने पुत्र बनकर उन्हें वात्सल्यसुखका सौभाग्य दिया| 

संसारकी पतिव्रता देवियोंमें गान्धारीका विशेष स्थान है| ये गन्धर्वराज सुबलकी पुत्री और शकुनिकी बहन थीं| इन्होंने कौमार्यावस्थामें भगवान् शंकरकी आराधना करके उनसे सौ पुत्रोंका वरदान प्राप्त किया था|

परम भाग्यवती गोपियोंके सौभाग्यका वर्णन करना मन, वाणी और बुद्धिकी सीमासे परे हैं| जिस प्रकार भगवान् का लीला-शरीर और उनकी लीलाएँ प्राकृत नहीं हैं, उसी प्रकार गोपीप्रेम भी प्रकृतिकी सीमासे परे है|

भगवान् की प्रेम-लीलाकी सहयोगिनी कुछ गोपिकाएँ तो नित्यसिद्धा हैं| बहुत-सी गोपिकाएँ अपनी महान् साधनाके फलस्वरूप भगवान् की वाञ्छित सेवा करनेके लिये गोपीरूपमें अवतीर्ण हुई थीं| उनकी लालसा इतनी अनन्य थी, उनकी लगन इतनी सच्ची थी कि प्रेमरसमय भगवान् ने उन्हें सुख पहुँचानेके लिये माखनचोरी, चीरहरण और रासलीलाकी दिव्य लीलाएँ कीं| इन गोपियोंमें कुछ पूर्वजन्मकी देवकन्याएँ थीं, कुछ श्रुतियाँ थीं और कुछ तपस्वी ऋषि थे| 

प्रद्युम्नजी कामदेवके अवतार माने जाते हैं| ये भगवान् श्रीकृष्णकी प्रमुख पत्नी रुक्मिणीजीके पुत्र थे| इनका जीवन-चरित्र अत्यन्त विचित्र है|

श्लोक-

वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि।

मङ्गलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥१॥

बिष्नु जो सुर हित नरतनु धारी। सोउ सर्बग्य जथा त्रिपुरारी॥

खोजइ सो कि अग्य इव नारी। ग्यानधाम श्रीपति असुरारी॥

जसि बिबाह कै बिधि श्रुति गाई। महामुनिन्ह सो सब करवाई॥

गहि गिरीस कुस कन्या पानी। भवहि समरपीं जानि भवानी॥