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नन्दबाबा – श्रीमद्भगवद्गीता

नन्दबाबा

पूर्वकालमें वसुश्रेष्ठ द्रोण और उनकी पत्नी धरादेवीने भगवान् की प्रसन्नताके लिये कठोर आराधना की| ब्रह्माजीसे उन्हें भगवान् को पुत्ररूपमें प्राप्त करनेका वर मिला था| ब्रह्माजीके उसी वरदानसे द्रोण और धराका नन्द और यशोदाके रूपमें जन्म हुआ| दोनों पति-पत्नी हुए और भगवान् श्रीकृष्ण-बलरामने पुत्र बनकर उन्हें वात्सल्यसुखका सौभाग्य दिया| 

मथुरामें देवमीढ़ नामक एक कृष्णवंशीय परम प्रतापी राजा थे| इनकी एक पत्नी क्षत्रियकन्या तथा दूसरी वैश्यपुत्री थी| क्षत्रियकन्यासे शूरसेन तथा वैश्यकन्यासे पर्जन्यजीका जन्म हुआ| शूरसेनजीके पुत्र वसुदेवजी हुए| पर्जन्यजी अपनी माताके कारण गोप-जातिके माने गये| यमुनाजी-के उस पार महावनमें इन्होंने अपना निवास बनाया और ये मथुरा-मण्डलकी गो-सम्पत्तिके प्रमुख अधिकारी हुए| व्रजेश्वर नन्दजी इन्हीं पर्जन्यजीके पुत्र थे| ये वसुदेवजीके भाई थे और घनिष्ठ मित्र भी| जब मथुरामें कंसका अत्याचार बढ़ने लगा तब वसुदेवजीने अपनी पत्नीको नन्दके यहाँ भेज दिया| गोकुलमें ही रोहिणीजीकी गोदमें बलरामजी पधारे| भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रको भी वसुदेवजी चुपचाप नन्दगृहमें रख आये थे| इस प्रकार बलराम और श्रीकृष्ण दोनोंका लालन-पालन नन्दबाबाके यहाँ हुआ| नन्दबाबको श्रीकृष्ण-बलराम दोनोंका पिता होनेका सौभाग्य प्राप्त हुआ| दोनों बालक उन्हें प्राणोंके समान प्रिय थे| वे बार-बार यशोदा मैयासे कहते रहते थे कि श्रीकृष्णस्मृति ही मेरे जीवनका मुख्य व्रत है| नन्दबाबाकी प्रत्येक क्रिया कन्हैयाकी प्रसन्नताके लिये ही होती थी|

जब गोकुलमें नाना प्रकारके उपद्रव होने लगे तब नन्दबाबा सभी ग्वाल-बालोंके साथ बरसानेके संनिकट नन्दगाँव चले आये| एक बार नन्दबाबाने एकादशीका व्रत किया| रात्रि-जागरणके बाद कुछ रात शेष थी, तभी प्रात:काल समझकर वे यमुनाजीमें स्नान करनेके लिये चले गये| उसी समय वरुणका एक दूत उन्हें पकड़कर वरुणलोक ले गया| सभी लोग नन्दबाबाको न देखकर विलाप करने लगे| भगवान् श्रीकृष्ण यमुनाजीमें कूदकर वरुणलोक गये| वरुणजीने वहाँ भगवान् श्रीकृष्णकी सविधि पूजा-अर्चना की| श्रीकृष्ण जब नन्दबाबाको लेकर लौटे, तब गोप-गोपियोंमें खुशीकी लहर दौड़ गयी|

जब भगवान् श्रीकृष्ण कंसके आमन्त्रणपर अक्रूरके साथ मथुरा गये, तब नन्दबाबा भी उनके साथ गये| कंसकी मृत्यु तथा उग्रसेनके राज्याभिषेकके बाद नन्दबाबा गोकुल लौट आये और श्रीकृष्ण-बलराम मथुरामें ही रह गये| जब उद्धवजी भगवान् श्रीकृष्णका संदेश लेकर व्रजमें आये, तब उनसे नन्दबाबाने व्याकुलताभरे स्वरमें पूछा – ‘उद्धवजी! क्या कभी श्रीकृष्ण हम सबको देखने व्रजमें आयेंगे? क्या हम उनके दर्शनका सौभाग्य पुन: प्राप्त करेंगे? आज भी हम उनकी दावाग्नि-पान, कालिय-दमन, गोवर्धन-धारण आदि विभिन्न लीलाओंका स्मरण करके आत्मविस्मृत हो जाते हैं| अनेक संकटोंसे उन्होंने हमें छुटकारा दिलाया| हम तो उन्हें धर्मकी स्थापना, साधुओंका परित्राण तथा देवताओंके हितके लिये अवतरित होनेवाले साक्षात् पुरुषोत्तम मानते हैं|’ कुरुक्षेत्रमें श्यामसुन्दरसे नन्दबाबाका अन्तिम मिलन हुआ| आज भी श्रीकृष्ण नन्दबाबाके लिये बालक ही थे| उन्होंने श्रीकृष्णको गोदमें बैठाकर उनका मुख चूमा| उस चुम्बनमें कितनी विरह-वेदना, कितनी अनन्त स्मृतियाँ थीं – उसे कौन कह सकता| भगवान् श्रीकृष्णके स्वधाम पधारनेपर समस्त ग्वाल-बालोंके साथ नन्दबाबा भी सनातन धामको चले गये, जहाँ नित्य श्रीकृष्ण- लीलाका दिव्य आनन्द है|

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