सुनु मृदु गूढ़ रुचिर बर रचना। कृपासिंधु बोले मृदु बचना॥
जो कछु रुचि तुम्हेर मन माहीं। मैं सो दीन्ह सब संसय नाहीं॥
एक बार जननीं अन्हवाए। करि सिंगार पलनाँ पौढ़ाए॥
निज कुल इष्टदेव भगवाना। पूजा हेतु कीन्ह अस्नाना॥
भूप सहस दस एकहि बारा। लगे उठावन टरइ न टारा॥
डगइ न संभु सरासन कैसें। कामी बचन सती मनु जैसें॥
गरजहिं गज घंटा धुनि घोरा। रथ रव बाजि हिंस चहु ओरा॥
निदरि घनहि घुर्म्मरहिं निसाना। निज पराइ कछु सुनिअ न काना॥
देव पितर पूजे बिधि नीकी। पूजीं सकल बासना जी की॥
सबहिं बंदि मागहिं बरदाना। भाइन्ह सहित राम कल्याना॥
शबरीका जन्म भीलकुलमें हुआ था| वह भीलराजकी एकमात्र कन्या थी| उसका विवाह एक पशुस्वभावके क्रूर व्यक्तिसे निश्चय हुआ| अपने विवाहके अवसरपर अनेक निरीह पशुओंको बलिके लिये लाया गया देखकर शबरीका हृदय दयासे भर गया|
भगवती श्रीसीताजी की महिमा अपार है| वेद, शास्त्र, पुराण, इतिहास तथा धर्मशास्त्रोंमें इनकी अनन्त महिमाका वर्णन है| ये भगवान् श्रीरामकी प्राणप्रिया आद्याशक्ति हैं|
असंख्य सद्गुणरूपी रत्नोंके महान निधि भगवान् श्रीराम धर्मपरायण भारतीयोंके परमाराध्य हैं| श्रीराम ही धर्मके रक्षक, चराचर विश्वकी सृष्टि करनेवाले, पालन करनेवाले तथा संहार करनेवाले परब्रह्मके पूर्णावतार हैं|
जब कंसने देवकी-वसुदेवके छ: पुत्रोंको मार डाला, तब देवकीके गर्भमें भगवान् बलराम पधारे| योगमायाने उन्हें आकर्षित करके नन्दबाबाके यहाँ निवास कर रही श्रीरोहिणीजीके गर्भमें पहुँचा दिया| इसीलिये उनका एक नाम संकर्षण पड़ा| बलवानोंमें श्रेष्ठ होनेके कारण उन्हें बलभद्र भी कहा जाता है|
भगवान् वेदव्यास एक अलौकिक शक्तिसम्पन्न महापुरुष थे| इनके पिताका नाम महर्षि पराशर और माताका नाम सत्यवती था| इनका जन्म एक द्वीपके अन्दर हुआ था और वर्ण श्याम था, अत: इनका एक नाम कृष्णद्वैपायन भी है|
भाद्रपद कृष्णपक्ष-अष्टमीकी अर्धरात्रिमें परम भागवत वसुदेव और माता देवकीके माध्यमसे कंसके कारागारमें चन्द्रोदयके साथ ही भगवान् श्रीकृष्णका प्राकट्य हुआ था|
महाभारत धर्म, अर्थ, काम और मोक्षको प्रदान करनेवाला कल्पवृक्ष है| यह विविध कथारूपी रत्नोंका तथा अज्ञानके अन्धकारको विनष्ट करनेवाला सूर्य है| इस ग्रन्थके मुख्य विषय तथा इस महायुद्धके महानायक भगवान् श्रीकृष्ण हैं|
प्राचीन कलमें तुग्ङभद्रा नदीके तटपर स्थित एक ग्राममें आत्मदेव नामक एक विद्वान् और धनवान् ब्राह्मण रहता था| उसकी स्त्रीका नाम धुन्धुली था|
मथुरामें एक सुखिया नामकी मालिन थी| वह व्रजमें नित्य फल बेचनेके लिये आया करती थी| भगवान् श्रीकृष्णकी मनोहर मूर्ति उनके मन-मन्दिरमें सदा बसी रहती थी और वह भावोंके पुष्प चढ़ाकर अहर्निश उनकी पूजा करती थी|
वृन्दावनके संनिकट कुछ याज्ञिक ब्राह्मण यज्ञ कर रहे थे| भगवान् श्रीकृष्णने अपने सखाओंको उनके पाससे भोजनके लिये कुछ अन्न माँगनेके लिये भेजा| याज्ञिकोंने उन्हें अन्न देना अस्वीकार कर दिया|
महर्षि वसिष्ठ की उत्पत्तिका वर्णन पुराणोंमें विभित्र रूपोंमें प्राप्त होता है| कहीं ये ब्रह्माके मानस पुत्र, कहीं मित्रावरुणके पुत्र और कहीं अग्निपुत्र कहे गये हैं| इनकी पत्नीका नाम अरुन्धती देवी था|
महर्षि विश्वामित्र महाराज गाधिके पुत्र थे| कुश्वंशमें पैदा होनेके कारण इन्हें कौशिक भी कहते हैं| ये बड़े ही प्रजापालक तथा धर्मात्मा राजा थे| एक बार ये सेनाको साथ लेकर जंगलमें शिकार खेलनेके लिये गये| वहाँपर वे महर्षि वसिष्ठके आश्रमपर पहुँचे|महर्षि वसिष्ठने इनसे इनकी तथा राज्यकी कुशल-श्रेम पूछी और सेनासहित आतिथ्य-सत्कार स्वीकार करनेकी प्रार्थना की|
महाभारतके अद्वितीय योद्धा महाबली भीमकी बल और पौरुषमें तुलना करनेवाला उस समय कोई नहीं था| इनका जन्म वायुदेवके अंशसे हुआ था| इनके जन्मके समय यह आकाशवाणी हुई थी कि यह कुमार बलवानोंमें सर्वश्रेष्ठ होगा|
अयोध्यानरेश महाराज दशरथ स्वायम्भुव मनुके अवतार थे| पूर्वकालमें कठोर तपस्यासे इन्होंने भगवान् श्रीरामको पुत्ररूपमें प्राप्त करनेका वरदान पाया था|
अभिमन्युकी पत्नी उत्तरा गर्भवती थी| उसके उदरमें पाण्डवोंका एकमात्र वंशधर पल रहा था| अश्वत्थामाने उस गर्भस्थ बालकका विनाश करनेके लिये ब्रह्मास्त्रका प्रयोग किया|
सूर्यवंशमें महाराज मान्धाता नामके एक परम प्रतापी राजा हुए थे| महराज मुचुकुन्द उन्हींके पुत्र थे| ये सम्पूर्ण पृथ्वीके एकच्छ्त्र सम्राट् थे| बल और पराक्रममें इनकी बराबरी करनेवाला उस समय संसारमें कोई नहीं था| देवता भी इनकी सहायता प्राप्त करनेके लिये लालायित रहा करते थे|
हमारे यहाँ शास्त्रोंमें अहल्या, मन्दोदरी, तारा, कुन्ती और द्रौपदी – ये पाँचों देवियाँ नित्य कन्याएँ कही गयी हैं| इनका नित्य स्मरण करनेसे मनुष्य पापमुक्त हो जाता है| महारानी कुन्ती वसुदेवजीकी बहन और भगवान् श्रीकृष्णकी बुआ थीं|
महारानी द्रौपदीकी उत्पत्ति यज्ञकुण्डसे हुई थी| ये महराज द्रुपदकी अयोनिजा कन्या थीं| इनका शरीर कृष्णवर्णके कमलके जैसा कोमल और सुन्दर था, अत: इन्हें ‘कृष्णा’ भी कहा जाता था| इनका रूप और लावण्य अनुपम एवं अद्वितीय था|
अर्जुन एवं सुभद्राका पुत्र अभिमन्यु महाभारत महाकाव्यका अद्भुत पात्र है| भगवान् श्रीकृष्णका यह भानजा अर्जुनके समान ही श्रेष्ठ धनुर्धर था| यह वीर्यमें युधिष्ठिरके समान, आचारमें श्रीकृष्णके समान, भयंकर कर्म करनेवालोंमें भीमके समान, विद्या-पराक्रममें अर्जुनके समान तथा विनयमें नकुल और सहदेवके समान था| अभिमन्युका विवाह महाराज विराटकी पुत्री उत्तराके साथ हुआ था|
कैकेयीजी महाराज केकयनरेशकी पुत्री तथा महाराज दशरथकी तीसरी पटरानी थीं| ये अनुपम सुन्दरी, बुद्धिमति, साध्वी और श्रेष्ठ वीराग्ङना थीं| महाराज दशरथ इनसे सर्वाधिक प्रेम करते थे|
महारानी कौसल्याका चरित्र अत्यन्त उदार है| ये महाराज दशरथकी सबसे बड़ी रानी थीं| पूर्व जन्ममें महराज मनुके साथ इन्होंने उनकी पत्नीरूपमें कठोर तपस्या करके श्रीरामको पुत्ररूपमें प्राप्त करनेका वरदान प्राप्त किया था| इस जन्ममें इनको कौसल्यारूपमें भगवान् श्रीरामकी जननी होनेका सौभाग्य मिला था|
महाराज उग्रसेनके एक भाई थे, उनका नाम देवक था| देवकीजी उन्हींकी कन्या थीं| ये कंससे छोटी थीं, अत: वह इनसे अत्यधिक स्नेह करता था| देवकजीने इनका विवाह वसुदेवजीके साथ अत्यन्त धूम-धामसे सम्पन्न किया|
माता यशोदाके सौभाग्यकी तुलना किसीसे भी नहीं हो सकती; क्योंकि भगवान् श्रीकृष्णने स्वयं उनका पुत्र बनकर उनके पवित्र स्तनोंका पान किया तथा उन्हें वात्सल्यसुखका अनुपम सौभाग्य प्रदान किया|
महारानी सुमित्रा त्यागकी साक्षात् प्रतिमा थीं| ये महाराज दशरथकी दूसरी पटरानी थीं| महाराज दशरथने जब पुष्टि यज्ञके द्वारा खीर प्राप्त किया, तब उन्होंने खीरका भाग महारानी सुमित्राको स्वयं न देकर महारानी कौसल्या और महारानी कैकेयीके द्वारा दिलवाया|
युवराज अंगद वालीके पुत्र थे| वाली इनसे सर्वाधिक प्रेम करता था| ये परम बुद्धिमान, अपने पिताके समान बलशाली तथा भगवान् श्रीरामके परम भक्त थे| अपने छोटे भाई सुग्रीवकी पत्नी और सर्वस्व हरण करनेके अपराधमें भगवान् श्रीरामके हाथों वालीकी मृत्यु हुई|
श्रीहनुमानजी आजम नैष्ठिक ब्रह्मचारी, व्याकरणके महान् पण्डित, ज्ञानिशिरोमणि, परम बुद्धिमान् तथा भगवान् श्रीरामके अनन्य भक्त हैं| ये ग्यारहवें रुद्र कहे जाते हैं|
श्लोक
रामं कामारिसेव्यं भवभयहरणं कालमत्तेभसिंहं
योगीन्द्रं ज्ञानगम्यं गुणनिधिमजितं निर्गुणं निर्विकारम्।
देखि पवनसुत कटक बिहाला। क्रोधवंत जनु धायउ काला॥
महासैल एक तुरत उपारा। अति रिस मेघनाद पर डारा॥
छंद– जब कीन्ह तेहिं पाषंड। भए प्रगट जंतु प्रचंड॥
बेताल भूत पिसाच। कर धरें धनु नाराच॥१॥
इन्द्रके अंशसे उत्पन्न महावीर अर्जुन वीरता, स्फूर्ति, तेज एवं शस्त्र-संचालनमें अप्रतिम थे| पृथ्वीका भार हरण करने तथा अत्याचारियोंको दण्ड देनेके लिये साक्षात् भगवान् नर-नारायणने ही श्रीकृष्ण और अर्जुनके रूपमें अवतार लिया था| यद्यपि समस्त पाण्डव श्रीकृष्णके भक्त थे, किंतु अर्जुन तो भगवान् श्यामसुन्दरके अभिन्न सखा तथा उनके प्राण ही थे|
व्रजभूमि प्रेमका दिव्य धाम है| वहाँ निवास करनेवाले सभी लोग अपने पूर्वजन्ममें अनेक प्रकारके जप-तप, भजन-ध्यान करके परमात्माके समीप रहनेका अधिकार प्राप्त कर चुके थे|
उद्धवजी वृष्णवंशियोंमें एक प्रधान पुरुष थे| ये साक्षात् बृहस्पतिजीके शिष्य और परम बुद्धिमान् थे| मथुरा आनेपर भगवान् श्रीकृष्णने इन्हें अपनी मन्त्री और अन्तरङ्ग सखा बना लिया|
भगवान् श्रीकृष्ण जब अवन्तीमें महर्षि सान्दीपनिके यहाँ शिक्षा प्राप्त करनेके लिये गये, तब सुदामाजी भी वहीं पढ़ते थे| वहाँ भगवान् श्रीकृष्णसे सुदामाजीकी गहरी मित्रता हो गयी|
श्रीभरतजीका चरित्र समुद्रकी भाँति अगाध है, बुद्धिकी सीमासे परे है| लोक-आदर्शका ऐसा अद्भुत सम्मिश्रण अन्यत्र मिलना कठिन है| भ्रातृप्रेमकी तो ये सजीव मूर्ति थे|
महात्मा भीष्म आदर्श पितृभक्त, आदर्श सत्यप्रतिज्ञ, शास्त्रोंके महान् ज्ञाता तथा परम भगवद्भक्त थे| इनके पिता भारतवर्षके चक्रवर्ती सम्राट् महाराज शान्तनु तथा माता भगवती गङ्ग थीं|
महर्षि विश्रवाको असुर कन्या कैकसीके संयोगसे तीन पुत्र हुए – रावण, कुम्भकर्ण और विभीषण| विभीषण विश्रवाके सबसे छोटे पुत्र थे|बचपनसे ही इनकी धर्माचरणमें रुचि थी| ये भगवान् के परम भक्त थे|
वाली और सुग्रीव दोनों सगे भाई थे| दोनों भाइयोंमें बड़ा प्रेम था| वाली बड़ा था, इसलिये वही वानरोंका राजा था| एक बार एक राक्षस रात्रिमें किष्किन्धामें आकर वालीको युद्धके लिये चुनौती देते हुए घोर गर्जना करने लगा|
श्रीलक्ष्मणजी शेषावतार थे| किसी भी अवस्थामें भगवान् श्रीरामका वियोग इन्हें सहा नहीं था| इसलिये ये सदैव छायाकी भाँति श्रीरामका ही अनुगमन करते थे| श्रीरामके चरणोंकी सेवा ही इनके जीवनका मुख्य व्रत था|
परम भागवत वसुदेवजी यदुवंशके परम प्रतापी वीर शूरसेनके पुत्र थे| इनका विवाह देवककी सात कन्याओंसे हुआ था| रोहिणी भी इन्हींकी पत्नी थीं| देवकीजी देवककी सबसे छोटी कन्या थीं|
श्रीशत्रुघ्नजी का चरित्र अत्यन्त विलक्षण है| ये मौन सेवाव्रती हैं| बचपनसे श्रीभरतजीका अनुगमन तथा सेवा ही इनका मुख व्रत था| ये मितभाषी, सदाचारी, सत्यवादी, विषय-विरागी तथा भगवान् श्रीरामके दासानुदास हैं| जिस प्रकार श्रीलक्ष्मणजी हाथमें धनुष श्रीरामकी रक्षा करते हुए उनके पीछे चलते थे, उसी प्रकार श्रीशत्रुघ्नजी भी श्रीभरतजीके साथ रहते थे|
सञ्जयका जन्म सूत जातिमें हुआ था| ये बड़े ही बुद्धिमान, नीतिज्ञ, स्वामिभक्त तथा धर्मज्ञ थे| इसीलिये धृतराष्ट्र इनपर अत्यन्त विश्वास करते थे| ये धृतराष्ट्रके मन्त्री भी थे और उनको सदैव हितकर सलाह दिया करते थे|
जब महाराज विराटने यह सुना कि उनके पुत्र उत्तरने समस्त कौरव-पक्षके योद्धाओंको पराजित करके अपनी गायोंको लौटा लिया है, तब वे आनन्दातिरेकमें अपने पुत्रकी प्रशंसा करने लगे|
सम्पूर्ण श्रीमद्भगवद्गीता – अध्याय 1 शलोक 1 से 47 in Sanskrit, Hindi & English.
सम्पूर्ण श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 10 यथारूप हिन्दी, इंग्लिश व संस्कृत मे पीडीएफ के साथ
सम्पूर्ण श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 11 शलोक 1 से 55
सम्पूर्ण श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 12 शलोक 1 से 20
सम्पूर्ण श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 13 शलोक 1 से 34
सम्पूर्ण श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 15 शलोक 1 से 20
सम्पूर्ण श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 16 शलोक 1 से 24
सम्पूर्ण श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 17 शलोक 1 से 28
सम्पूर्ण श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 18 शलोक 1 से 78
श्री कृष्णार्जुन वार्ताला (सम्पूर्ण श्रीमद्भगवद्गीता – अध्याय 2 शलोक 1 से 72)
कर्तव्य व कर्म का महत्व (सम्पूर्ण श्रीमद्भगवद्गीता – अध्याय 3 शलोक 1 से 36)
सम्पूर्ण श्रीमद्भगवद्गीता – अध्याय 4 शलोक 1 से 42
सम्पूर्ण श्रीमद्भगवद्गीता – अध्याय 5 शलोक 1 से 29
सम्पूर्ण श्रीमद्भगवद्गीता – अध्याय 6 शलोक 1 से 47
सम्पूर्ण श्रीमद्भगवद्गीता – अध्याय 7 शलोक 1 से 30
सम्पूर्ण श्रीमद्भगवद्गीता – अध्याय 8 शलोक 1 से 28
सम्पूर्ण श्रीमद्भगवद्गीता – अध्याय 9 शलोक 1 से 25
सम्पूर्ण श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 14 शलोक 1 से 27
शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं
ब्रह्माशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम् ।
[su_box title="सुन्दरकाण्ड - दोहा 51" box_color="#ed3b5b" radius="8"] सकल चरित तिन्ह देखे धरें कपट कपि देह। प्रभु गुन हृदयँ सराहहिं सरनागत पर नेह॥51॥ व्याख्या: कपटसे वानरका शरीर धारणकर उन्होंने सब लीलाएँ देखीं| वे अपने हृदयमें प्रभुके गुणोंकी और शरणागतपर उनके स्नेहकी सराहना करने लगे||51|| प्रगट बखानहिं राम सुभाऊ। अति सप्रेम गा बिसरि दुराऊ॥ रिपु के दूत कपिन्ह तब जाने। सकल बाँधि कपीस पहिं आने॥1॥ व्याख्या: फिर वे प्रकटरूपमें भी अत्यन्त प्रेमके साथ श्रीरामजीके स्वभावकी बड़ाई करने लगे, उन्हें दुराव (कपट वेष) भूल गया! तब वानरोंने जाना