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सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता – अध्याय 8 शलोक 1 से 28

सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता – अध्याय 8 शलोक 1 से 28

सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 8 शलोक 1

अर्जुन उवाच (Arjun Said):

किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम।
अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते॥1॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 8 शलोक 1 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hi हे पुरुषोत्तम, ब्रह्म क्या है, अध्यात्म क्या है, और कर्म क्या होता है। अधिभूत किसे कहते हैं और अधिदैव किसे कहा जाता है।

En Enlighten me, O Supreme Being, on the nature of Brahm, adhyatm, action, adhibhoot and adhidaiv.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 8 शलोक 2

अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन।
प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः॥2॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 8 शलोक 2 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hi हे मधुसूदन, इस देह में जो अधियज्ञ है वह कौन है। और सदा नियमित चित्त वाले कैसे मृत्युकाल के समय उसे जान जाते हैं।

En Who is adhiyagya, O Madhusudan, and how is he enshrined in the body : and how does the man with a restrained mind know you at the end?
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 8 शलोक 3

श्रीभगवानुवाच (THE LORD SAID):

अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते।
भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः॥3॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 8 शलोक 3 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hi जिसका क्षर नहीं होता वह ब्रह्म है। जीवों के परम स्वभाव को ही अध्यात्म कहा जाता है। जीवों की जिससे उत्पत्ति होती है उसे कर्म कहा जाता है।

En The one who is imperishable is the Supreme Spirit (Brahm); abiding in a body he is adhyatm; and the cessation of properties in beings which produce something or the other is action.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 8 शलोक 4

अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम्।
अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर॥4॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 8 शलोक 4 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hi इस देह के क्षर भाव को अधिभूत कहा जाता है, और पुरूष अर्थात आत्मा को अधिदैव कहा जाता है। इस देह में मैं अधियज्ञ हूँ – देह धारण करने वालों में सबसे श्रेष्ठ।

En Adhibhoot is all that is subject to birth and death; the Supreme Spirit is adhidaiv, and O the unparalleled among men (Arjun), I (Vasudev) am the adhiyagya in the body.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 8 शलोक 5

अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्।
यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः॥5॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 8 शलोक 5 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hi अन्तकाल में मुझी को याद करते हुऐ जो देह से मुक्ति पाता है, वह मेरे ही भाव को प्राप्त होता है, इस में कोई संशय नहीं।

En The man who departs from the body remembering me doubtlessly attains to me.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 8 शलोक 6

यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्।
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः॥6॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 8 शलोक 6 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hi प्राणी जो भी स्मरन करते हुऐ अपनी देह त्यागता है, वह उसी को प्राप्त करता है हे कौन्तेय, सदा उन्हीं भावों में रहने के कारण।

En A man attains, O son of Kunti, to the slate with the thought of which he departs from the body because of his constant preoccupation with that state.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 8 शलोक 7

तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्॥7॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 8 शलोक 7 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hi इसलिये, हर समय मुझे ही याद करते हुऐ तुम युद्ध करो। अपने मन और बुद्धि को मुझे ही अर्पित करने से, तुम मुझ में ही रहोगे, इस में कोई संशय नहीं।

En So you will doubtless realize me if, with your mind and intellect dedicated to me, you always wage war.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 8 शलोक 8, 9

श्रीभगवानुवाच (THE LORD SAID):

अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना।
परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन्॥8॥

कविं पुराणमनुशासितारमणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः।
सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूपमादित्यवर्णं तमसः परस्तात्॥9॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 8 शलोक 8, 9 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hi हे पार्थ, अभ्यास द्वारा चित्त को योग युक्त कर और अन्य किसी भी विषय का चिन्तन न करते हुऐ, उन पुरातन कवि, सब के अनुशासक, सूक्ष्म से भी सूक्ष्म, सबके धाता, अचिन्त्य रूप, सूर्य के प्रकार प्रकाशमयी, अंधकार से परे उन ईश्वर का ही चिन्तन करते हुऐ, उस दिव्य परम-पुरुष को ही प्राप्त करोगे।

En Possessed of the yog of meditation and a restrained mind, O Parth, the man who is always absorbed in my thought attains to the sublime radiance of God. The man who remembers God who is omniscient, without beginning and end, dwelling in the Soul that rules all beings the most subtle of the subtle, unmanifest, provider to all, beyond thought, imbued with the light of consciousness, and quite beyond ignorance…
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 8 शलोक 10

प्रयाणकाले मनसाचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव।
भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक् स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम्॥10॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 8 शलोक 10 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hi इस देह को त्यागते समय, मन को योग बल से अचल कर और और भक्ति भाव से युक्त हो, भ्रुवों के मध्य में अपने प्राणों को टिका कर जो प्राण त्यागता है वह उस दिव्य परम पुरुष को प्राप्त करता है।

En With unwavering concentration, with his life-breath firmly centered between his brows by the strength of his yog, such a man attains to the effulgent Supreme Being.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 8 शलोक 11

यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः।
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये॥11॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 8 शलोक 11 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hi जिसे वेद को जानने वाले अक्षर कहते हैं, और जिसमें साधक राग मुक्त हो जाने पर प्रवेश करते हैं, जिसकी प्राप्ती की इच्छा से ब्रह्मचारी ब्रह्मचर्या का पालन करते हैं, तुम्हें मैं उस पद के बारे में बताता हूँ।

En I shall tell you briefly of the ultimate state which knowers of the Ved call the imperishable, and which is realized by men who aspire for it, act without desire, and practise continence.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 8 शलोक 12, 13

सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च।
मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम्॥12॥

ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्।
यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम्॥13॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 8 शलोक 12, 13 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hi अपने सभी द्वारों (अर्थात इन्द्रियों) को संयमशील कर, मन और हृदय को निरोद्ध कर (विषयों से निकाल कर), प्राणों को अपने मश्तिष्क में स्थित कर, इस प्रकार योग को धारण करते हुऐ। ॐ से अक्षर ब्रह्म को संबोधित करते हुऐ, और मेरा अनुस्मरन करते हुऐ, जो अपनी देह को त्यजता है, वह परम गति को प्राप्त करता है।

En Shutting the doors of all the sense, that is restraining them from desire for their objects, confining his intellect within the Self, fixing his life-breath within his mind, and absorbed in yog,…He who departs from the body intoning OM, which is God in word, and remembering me, attains to salvation.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 8 शलोक 14

अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः॥14॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 8 शलोक 14 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hi अनन्य चित्त से जो मुझे सदा याद करता है, उस नित्य युक्त योगी के लिये मुझे प्राप्त करना आसान है हे पार्थ।

En The yogi who is firmly devoted to me, and who constantly remembers me and is absorbed in me, realizes me with ease.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 8 शलोक 15

मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम्।
नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः॥15॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 8 शलोक 15 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hi मुझे प्राप्त कर लेने पर महात्माओं को फिर से, दुख का घर और मृत्युरूप, अगला जन्म नहीं लेना पड़ता, क्योंकि वे परम सिद्धि को प्राप्त कर चुके हैं।

En Accomplished sages who have attained to the ultimate state are no longer subject to transient rebirth which is like a house of sorrows.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 8 शलोक 16

आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन।
मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते॥16॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 8 शलोक 16 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hi ब्रह्म से नीचे जितने भी लोक हैं उनमें से किसी को भी प्राप्त करने पर जीव को वापिस लौटना पड़ता है (मृत्यु होती है), लेकिन मुझे प्राप्त कर लेने पर, हे कौन्तेय, फिर दोबारा जन्म नहीं होता।

En All the worlds from Brahmlok downwards are, O Arjun, of a recurrent character, but, O son of Kunti, the soul which realizes me is not born again.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 8 शलोक 17

सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद्ब्रह्मणो विदुः।
रात्रिं युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जनाः॥17॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 8 शलोक 17 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hi जो जानते हैं की सहस्र (हज़ार) युग बीत जाने पर ब्रह्म का दिन होता है और सहस्र युगों के अन्त पर ही रात्री होती है, वे लोग दिन और रात को जानते हैं।

En Yogi who know the reality of one day of Brahma which is of the duration of a thousand ages (yug) and of one night which is also equal to a thousand ages know the essence of time.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 8 शलोक 18

अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे।
रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके॥18॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 8 शलोक 18 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hi दिन के आगम पर अव्यक्त से सभी उत्तपन्न होकर व्यक्त (दिखते हैं) होते हैं, और रात्रि के आने पर प्रलय को प्राप्त हो, जिसे अव्यक्त कहा जाता है, उसी में समा जाते हैं।

En All manifest beings are born from the subtle body of Brahma at the outset of his day and are also dissolved in the same unmanifest body at the fall of his night.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 8 शलोक 19

भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते।
रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे॥19॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 8 शलोक 19 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hi हे पार्थ, इस प्रकार यह समस्त जीव दिन आने पर बार बार उत्पन्न होते हैं, और रात होने पर बार बार वशहीन ही प्रलय को प्राप्त होते हैं।

En The beings who thus wake up into consciousness are compelled by nature to relapse into unconsciousness with the coming of night and they are then, O Parth, reborn with the advent of day.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 8 शलोक 20

परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः।
यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति॥20॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 8 शलोक 20 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hi इन व्यक्त और अव्यक्त जीवों से परे एक और अव्यक्त सनातन पुरुष है, जो सभी जीवों का अन्त होने पर भी नष्ट नहीं होता।

En But beyond the unmanifest Brahma there is the eternal, unmanifest God who is not destroyed even after the destruction of all beings.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 8 शलोक 21

अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम्।
यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥21॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 8 शलोक 21 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hi जिसे अव्यक्त और अक्षर कहा जाता है, और जिसे परम गति बताया जाता है, जिसे प्राप्त करने पर कोई फिर से नहीं लौटता वही मेरा परम स्थान है।

En The unmanifest and imperishable God who is said to be salvation and after realizing whom one does not come back to the world, is my ultimate abode.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 8 शलोक 22

पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया।
यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम्॥22॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 8 शलोक 22 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hi हे पार्थ, उस परम पुरुष को, जिसमें यह सभी जीव स्थित हैं और जीसमें यह सब कुछ ही बसा हुआ है, तुम अनन्य भक्ति से पा सकते हो।

En And, O Parth that God in whom all beings exist and who permeates the whole world is realized by steady devotion.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 8 शलोक 23

श्रीभगवानुवाच (THE LORD SAID):

यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः।
प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ॥23॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 8 शलोक 23 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hi हे भरतर्षभ, अब मैं तुम्हें वह समय बताता हूँ जिसमें शरीर त्यागते हुऐ योगी लौट कर नहीं आते और जिसमें वे लौट कर आते हैं।

En And, O the best of Bharat, I shall now enlighten you on the ways by which, after giving up their bodies, yogi arrive at the state of birth-lessness as well as of rebirth.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 8 शलोक 24

अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम्।
तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः॥24॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 8 शलोक 24 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hi रौशनी में, अग्नि की ज्योति के समीप, दिन के समय, या सुर्य के उत्तर में होने वाले छः महीने (गरमी), उस में जाने वाले ब्रह्म को जानने वाले, ब्रह्म को प्राप्त करते हैं।

En They who depart from the body in the presence of bright flames, daylight, the sun, the waxing moon of the bright half of a month, and the dazzlingly clear sky of the time when the sun moves northwards, attain to God.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 8 शलोक 25

धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम्।
तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते॥25॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 8 शलोक 25 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hi धूऐं, रात्रि, अंधकार और सूर्य के दक्षिण में होने वाले छः महीने (सर्दी), उस में योगी चन्द्र की ज्योति को प्राप्त कर पुनः लौटते हैं।

En Dying during prevalence of the darkness of a gloomy night, the dark half of a lunar month, and the six months of the downward course of the sun, the yogi who desires fruits of his action attains to the dim light of the moon and is reborn after enjoying his rewards in heaven.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 8 शलोक 26

शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते।
एकया यात्यनावृत्तिमन्ययावर्तते पुनः॥26॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 8 शलोक 26 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hi इस जगत में सफेद और काला – ये दो शाश्वत पथ माने जाते हैं। एक पर चलने वाले फिर लौट कर नहीं आते और दूसरे पर चलने वाले फिर लौट कर आते हैं।

En The way of brightness (that leads to God) and the way of darkness that takes one to the afterworld (the world of Manes to which departed ancestors have gone) are the two eternal ways in the world. One who takes the first achieves birthlessness, whereas the treader on the second is subject to repeated birth and death.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 8 शलोक 27

नैते सृती पार्थ जानन्योगी मुह्यति कश्चन।
तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन॥27॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 8 शलोक 27 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hi हे पार्थ, ऍसा एक भी योगी नहीं है जो इसे जान जाने के बाद फिर कभी मोहित हुआ हो। इसलिये, हे अर्जुन, तुम हर समय योग-युक्त बनो।

En You should always rest upon yog, O Parth, for the yogi who knows the reality of the two ways is never deceived.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 8 शलोक 28

वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव दानेषु यत् पुण्यफलं प्रदिष्टम्।
अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम्॥28॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 8 शलोक 28 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hi इस सब को जान कर, योगी, वेदों, यज्ञों, तप औऱ दान से जो भी पुण्य फल प्राप्त होते हैं उन सब से ऊपर उठकर, पुरातन परम स्थान प्राप्त कर लेता है।

En Knowing this secret, the yogi transcends the rewards of Vedic study, sacrificial rites, penance, and charity and so achieves salvation.
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