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सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 14 शलोक 1 से 27

सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 14 शलोक 1 से 27

सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 14 शलोक 1

श्री भगवान बोले (THE LORD SAID):

परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम्।
यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः॥1॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 14 शलोक 1 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiहे अर्जुन, मैं फिर से तुम्हें वह बताता हूँ जो सभी ज्ञानों में से उत्तम ज्ञान है। इसे जान कर सभी मुनी परम सिद्धि को प्राप्त हुये हैं।

EnI shall tell you again that supreme knowledge which is the noblest of all knowledge and, having possessed which sages have escaped from worldly bondage to achieve the ultimate perfection.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 14 शलोक 2

इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः।
सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च॥2॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 14 शलोक 2 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiइस ज्ञान का आश्रय ले जो मेरी स्थित को प्राप्त कर चुके हैं, वे सर्ग के समय फिर जन्म नहीं लेते, और न ही प्रलय में व्यथित होते हैं।

EnThey who have achieved my state by seeking shelter in this knowledge are neither born at the beginning of creation nor alarmed in the event of doom.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 14 शलोक 3

मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम्।
संभवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत॥3॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 14 शलोक 3 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiहे भारत, यह महद् ब्रह्म (मूल प्रकृति) योनि है, और मैं उसमें गर्भ देता हूँ। इस से ही सभी जीवों का जन्म होता है हे भारत।

EnLike the great Creator, O Bharat, is my eight-propertied primal nature, the womb of which I fertilize with the seed of consciousness by which all beings are shaped.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 14 शलोक 4

सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः संभवन्ति याः।
तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता॥4॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 14 शलोक 4 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiहे कौन्तेय, सभी योनियों में जो भी जीव पैदा होते हैं, उनकी महद् ब्रह्म तो योनि है (कोख है), और मैं बीज देने वाला पिता हूँ।

EnThe eightfold nature, O son of Kunti, is the mother that bears all the beings of different births and I am the father that casts the seed.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 14 शलोक 5

श्री भगवान बोले (THE LORD SAID):

सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसंभवाः।
निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्॥5॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 14 शलोक 5 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiहे माहाबाहो, सत्त्व, रज और तम – प्रकृति से उत्पन्न होने वाले यह तीन गुण अविकारी अव्यय आत्मा को देह में बाँधते हैं।

EnThe three nature-born properties (sattwa, rajas, and tamas), O the mighty-armed, bind the imperishable Self to the body.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 14 शलोक 6

तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम्।
सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ॥6॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 14 शलोक 6 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiहे आनघ (पापरहित), उन में से सत्त्व निर्मल और प्रकाशमयी, पीडा रहित होने के कारण सुख के संग और ज्ञान द्वारा आत्मा को बाँधता है।

EnOf the three properties, O the sinless, the purifying and enlightening sattwa binds one to the desire for joy and knowledge.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 14 शलोक 7

रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम्।
तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम्॥7॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 14 शलोक 7 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiतृष्णा (भूख, इच्छा) और आसक्ति से उत्पन्न रजो गुण को तुम रागात्मक जानो। यह देहि (आत्मा) को कर्म के प्रति आसक्ति से बाँधता है, हे कौन्तेय।

EnKnow, O son of Kunti, that the properly of rajas, born from desire and infatuation, binds the Self with attachment to action and its fruits. Rajas, an embodiment of passion, inclines one to action.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 14 शलोक 8

तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम्।
प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत॥8॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 14 शलोक 8 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiतम को लेकिन तुम अज्ञान से उत्पन्न हुआ जानो जो सभी देहवासीयों को मोहित करता है। हे भारत, वह प्रमाद, आलस्य और निद्रा द्वारा आत्मा को बाँधता है।

EnAnd, O Bharat, know that the property of tamas, which deludes all beings, arises from ignorance and binds the Soul with carelessness, sloth, and slumber.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 14 शलोक 9

श्रीभगवान बोले (THE LORD SAID):

सत्त्वं सुखे संजयति रजः कर्मणि भारत।
ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे संजयत्युत॥9॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 14 शलोक 9 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiसत्त्व सुख को जन्म देता है, रजो गुण कर्मों (कार्यों) को, हे भारत। लेकिन तम गुण ज्ञान को ढक कर प्रमाद (अज्ञानता, मुर्खता) को जन्म देता है।

EnWhereas the property of sattwa motivates one to joy, rajas prompts to action, and tamas veils knowledge and drives one to carelessness.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 14 शलोक 10

रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत।
रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा॥10॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 14 शलोक 10 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiहे भारत, रजो गुण और तमो गुण को दबा कर सत्त्व बढता है, सत्त्व और तमो गुण को दबा कर रजो गुण बढता है, और रजो और सत्त्व को दबाकर तमो गुण बढता है।

EnAnd, O Bharat, (just as) sattwa grows by overcoming the properties of rajas and tamas, tamas grows by overpowering rajas and sattwa, and the property of rajas grows by suppressing tamas and sattwa.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 14 शलोक 11

सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते।
ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत॥11॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 14 शलोक 11 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiजब देह के सभी द्वारों में प्रकाश उत्पन्न होता है और ज्ञान बढता है, तो जानना चाहिये की सत्त्व गुण बढा हुआ है।

EnWhen the mind and senses are suffused with the light of knowledge and consciousness, it should be taken as a sign of the growing strength of sattwa.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 14 शलोक 12

लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा।
रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ॥12॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 14 शलोक 12 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiहे भरतर्षभ, जब रजो गुण की वृद्धि होती है तो लोभ प्रवृत्ति और उद्वेग से कर्मों का आरम्भ, स्पृहा (अशान्ति) होते हैं।

EnWhen the property of rajas is ascendant, O the best of Bharat, greed, worldly inclination, the tendency to undertake action, restlessness, and desire for sensual pleasures arise.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 14 शलोक 13

अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च।
तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन॥13॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 14 शलोक 13 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiहे कुरुनन्दन। तमो गुण के बढने पर अप्रकाश, अप्रवृत्ति (न करने की इच्छा), प्रमाद और मोह उत्पन्न होते हैं।

EnWhen there is an upsurge of tamas, O Kurunandan, darkness, disinclination to duty which ought to be done, carelessness, and tendencies that engender infatuation arise.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 14 शलोक 14

यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत्।
तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते॥14॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 14 शलोक 14 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiजब देहभृत सत्त्व के बढे होते हुये मृत्यु को प्राप्त होता है, तब वह उत्तम ज्ञानमंद लोगों के अमल (स्वच्छ) लोकों को जाता है।

EnIf the Soul departs when the property of sattwa is dominant, it attains to the pure worlds of the virtuous.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 14 शलोक 15

रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते।
तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते॥15॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 14 शलोक 15 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiरजो गुण की बढोती में जब जीव मृत्यु को प्राप्त होता है, तो वह कर्मों से आसक्त जीवों के बीच जन्म लेता है। तथा तमो गुण की वृद्धि में जब मनुष्य मृत्यु को प्राप्त होता है तो वह मूढ योनियों में जन्म लेता है।

EnIf he meets with death when rajas is presiding, he is born as (one of ) humans who are attached to action; and he is born in the form of unintelligent beings if he leaves the body when tamas is prevailing.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 14 शलोक 16

कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम्।
रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम्॥16॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 14 शलोक 16 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiसात्विक (सत्त्व गुण में आधारित) अच्छे कर्मों का फल भी निर्मल बताया जाता है, राजसिक कर्मों का फल लेकिन दुख ही कहा जाता है, और तामसिक कर्मों का फल अज्ञान ही है।

EnWhile righteousness is said to be the pure outcome of action that is governed by sattwa, the outcome of rajas is sorrow, and the outcome of tamas is ignorance.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 14 शलोक 17

सत्त्वात्संजायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च।
प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च॥17॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 14 शलोक 17 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiसत्त्व ज्ञान को जन्म देता है, रजो गुण लोभ को। तमो गुण प्रमाद, मोह और अज्ञान उत्पन्न करता है।

EnKnowledge arises from the property of sattwa, greed beyond any doubt from rajas, and carelessness, delusion, and ignorance from tamas.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 14 शलोक 18

ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः।
जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः॥18॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 14 शलोक 18 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiसत्त्व में स्थित प्राणि ऊपर उठते हैं, रजो गुण में स्थित लोग मध्य में ही रहते हैं (अर्थात न उनका पतन होता है न उन्नति), लेकिन तामसिक जघन्य गुण की वृत्ति में स्थित होने के कारण (निंदनीय तमो गुण में स्थित होने के कारण) नीचें को गिरते हैं (उनका पतन होता है)।

EnWhereas they who dwell in sattwa ascend to higher worlds, they who sojourn in rajas remain in the middle (the world of men), and they who abide in the meanest of properties tamas are doomed to the lowest state.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 14 शलोक 19

नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति।
गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति॥19॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 14 शलोक 19 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiजब मनुष्य गुणों के अतिरिक्त और किसी को भी कर्ता नहीं देखता समझता (स्वयं और दूसरों को भी अकर्ता देखता है), केवल गुणों को ही गर्ता देखता है, और स्वयं को गुणों से ऊपर (परे) जानता है, तब वह मेरे भाव को प्राप्त करता है।

EnWhen the Soul (that is a mere witness) does not see anyone besides the three properties as doer and when he knows the essence of the Supreme Spirit who is beyond these properties, he attains to my state.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 14 शलोक 20

गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान्।
जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते॥20॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 14 शलोक 20 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiइन तीनों गुणों को, जो देह की उत्पत्ति का कारण हैं, लाँघ कर देही अर्थात आत्मा जन्म, मृत्यु और जरा आदि दुखों से विमुक्त हो अमृत का अनुभव करता है।

EnTranscending the properties that are the germ of the gross, corporal body and liberated from the miseries of birth, death, and old age, the Soul achieves the ultimate bliss.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 14 शलोक 21

अर्जुन जी बोले (Arjun Said):

कैर्लिङ्गैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो।
किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते॥21॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 14 शलोक 21 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiहे प्रभो, इन तीनो गुणों से अतीत हुये मनुष्य के क्या लक्षण होते हैं। उस का क्या आचरण होता है। वह तीनों गुणो से कैसे पार होता है।

En(Tell me), O Lord, the attributes of the man who has risen above the three properties, his manner of life, and the way by which he transcends the three properties.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 14 शलोक 22

श्रीभगवान बोले (THE LORD SAID):

प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव।
न द्वेष्टि संप्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति॥22॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 14 शलोक 22 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiहे पाण्डव, तानों गुणों से ऊपर उठा महात्मा न प्रकाश (ज्ञान), न प्रवृत्ति (रजो गुण), न ही मोह (तमो गुण) के बहुत बढने पर उन से द्वेष करता है और न ही लोप हो जाने पर उन की इच्छा करता है।

EnThe man, O Pandav, who neither abhors radiance, inclination to action, and attachment that are generated respectively by the operations of sattwa, rajas, and tamas when he is involved in them, nor aspires for them when he is liberated;…
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 14 शलोक 23

उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते।
गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्गते॥23॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 14 शलोक 23 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiजो इस धारणा में स्थित रहता है की गुण ही आपस में वर्त रहे हैं, और इसलिये उदासीन (जिसे कोई मतलब न हो) की तरह गुणों से विचलित न होता, न ही उन से कोई चेष्ठा करता है।

En(And) who, like a dispassionate onlooker, is unmoved by the properties and is steady and unshaken by dint of his realization that these properties of nature but abide in themselves;…
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 14 शलोक 24

समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः।
तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः॥24॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 14 शलोक 24 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiसुख और दुख में एक सा, अपने आप में ही स्थित जो मिट्टि, पत्थर और सोने को एक सा देखता है। जो प्रिय और अप्रिय की एक सी तुलना करता है, जो धीर मनुष्य निंदा और आत्म संस्तुति (प्रशंसा) को एक सा देखता है।

En(And) who, ever dwelling in his Self, views joy, sorrow, earth, stone, and gold as equal, is patient, and evenly regards the pleasant and the unpleasant, slander and praise;…
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 14 शलोक 25

मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः।
सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते॥25॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 14 शलोक 25 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiजो मान और अपमान को एक सा ही तोलता है (बराबर समझता है), मित्र और विपक्षी को भी बराबर देखता है। सभी आरम्भों का त्याग करने वाला है, ऐसे महात्मा को गुणातीत (गुणों के अतीत) कहा जाता है।

En(And) who puts up with honour and dishonour, as (also) with friend and foe, with equanimity, and who gives up the undertaking of action is said to have transcended all the properties.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 14 शलोक 26

मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते।
स गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते॥26॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 14 शलोक 26 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiऔर जो मेरी अव्यभिचारी भक्ति करता है, वह इन गुणों को लाँघ कर ब्रह्म की प्राप्ति करने का पात्र हो जाता है।

EnAnd the man who serves me with the yog of unswerving devotion overcomes the three properties and secures the state of oneness with God.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 14 शलोक 27

ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च।
शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च॥27॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 14 शलोक 27 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiक्योंकि मैं ही ब्रह्म का, अमृतता का (अमरता का), अव्ययता का, शाश्वतता का, धर्म का, सुख का और एकान्तिक सिद्धि का आधार हूँ (वे मुझ में ही स्थापित हैं)।

EnFor I am the one in which the eternal God, immortal life, the imperishable dharm, and the ultimate bliss all (abide).
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