Homeधार्मिक ग्रंथसम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीतासम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता – अध्याय 3 शलोक 1 से 36

सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता – अध्याय 3 शलोक 1 से 36

कर्तव्य व कर्म का महत्व (सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता – अध्याय 3 शलोक 1 से 36)

सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 3 शलोक 1

अर्जुन बोले (Arjun Said):

ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन।
तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव॥1॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 3 शलोक 1 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hi हे केशव, अगर आप बुद्धि को कर्म से अधिक मानते हैं तो मुझे इस घोर कर्म में क्यों न्योजित कर रहे हैं॥

En 0 Janardan, if you think knowledge superior to action, why do you, O Keshav, ask me to engage in fearsome action?
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 3 शलोक 2

व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव में।
तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम्॥2॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 3 शलोक 2 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hi मिले हुऐ से वाक्यों से मेरी बुद्धि शंकित हो रही है। इसलिये मुझे वह एक रस्ता बताईये जो निष्चित प्रकार से मेरे लिये अच्छा हो॥

En Since your complex words are so confusing to my mind, kindly tell me the one way by which I may attain to the state of blessedness.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 3 शलोक 3

श्रीभगवान बोले (THE LORD SAID):

लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ।
ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम्॥3॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 3 शलोक 3 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hi हे नि़ष्पाप, इस लोक में मेरे द्वारा दो प्रकार की निष्ठाऐं पहले बताई गयीं थीं। ज्ञान योग सन्यास से जुड़े लोगों के लिये और कर्म योग उनके लिये जो कर्म योग से जुड़े हैं॥

En I told you before, O the sinless (Arjun), two ways of spiritual discipline, the Way of Discrimination or Knowledge for sages and the Way of Selfless Action for men of action.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 3 शलोक 4

न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते।
न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति॥4॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 3 शलोक 4 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hi कर्म का आरम्भ न करने से मनुष्य नैष्कर्म सिद्धी नहीं प्राप्त कर सकता अतः कर्म योग के अभ्यास में कर्मों का करना जरूरी है। और न ही केवल त्याग कर देने से सिद्धी प्राप्त होती है॥

En Man neither attains to the final state of actionlessness by desisting from work, nor does he achieve Godlike perfection by just renunciation of work.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 3 शलोक 5

न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः॥5॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 3 शलोक 5 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hi कोई भी एक क्षण के लिये भी कर्म किये बिना नहीं बैठ सकता। सब प्रकृति से पैदा हुऐ गुणों से विवश होकर कर्म करते हैं॥

En Since all men have doubtlessly sprung from nature, no one can at any time live even for a moment without action.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 3 शलोक 6

कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्।
इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते॥6॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 3 शलोक 6 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hi कर्म कि इन्द्रीयों को तो रोककर, जो मन ही मन विषयों के बारे में सोचता है उसे मिथ्या अतः ढोंग आचारी कहा जाता है॥

En That deluded man is a dissembler who apparently restrains his senses by violence2 but whose mind continues to be preoccupied with objects of their gratification.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 3 शलोक 7

यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन।
कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते॥7॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 3 शलोक 7 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hi हे अर्जुन, जो अपनी इन्द्रीयों और मन को नियमित कर कर्म का आरम्भ करते हैं, कर्म योग का आसरा लेते हुऐ वह कहीं बेहतर हैं॥

En And, O Arjun, that man is meritorious who restrains his senses with his mind and employs his organs of action to do selfless work in a spirit of complete detachment.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 3 शलोक 8

नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः॥8॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 3 शलोक 8 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hi जो तुम्हारा काम है उसे तुम करो क्योंकि कर्म से ही अकर्म पैदा होता है, मतलब कर्म योग द्वारा कर्म करने से ही कर्मों से छुटकारा मिलता है। कर्म किये बिना तो यह शरीर की यात्रा भी संभव नहीं हो सकती। शरीर है तो कर्म तो करना ही पड़ेगा॥

En You ought to do your prescribed action as enjoined by scripture, for doing work is better than not doing any, and in the absence of it even the journey of your body may not be completed.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 3 शलोक 9

श्रीभगवान बोले (THE LORD SAID):

यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः।
तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर॥9॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 3 शलोक 9 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hi केवल यज्ञा समझ कर तुम कर्म करो हे कौन्तेय वरना इस लोक में कर्म बन्धन का कारण बनता है। उसी के लिये कर्म करते हुऐ तुम संग से मुक्त रह कर समता से रहो॥

En Since the conduct of yagya is the only action and all other business in which people are engaged are only forms of worldly bondage, O son of Kunti, be unattached and do your duty to God well.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 3 शलोक 10

सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः।
अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक्॥10॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 3 शलोक 10 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hi यज्ञ के साथ ही बहुत पहले प्रजापति ने प्रजा की सृष्टि की और कहा की इसी प्रकार कर्म यज्ञ करने से तुम बढोगे और इसी से तुम्हारे मन की कामनाऐं पूरी होंगी॥

En At the beginning of kalp-the course of self-realization Prajapati Brahma shaped yagya along with mankind and enjoined on them to ascend by yagya which could give them what their hearts aspired to.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 3 शलोक 11

देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः।
परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ॥11॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 3 शलोक 11 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hi तुम देवताओ को प्रसन्न करो और देवता तुम्हें प्रसन्न करेंगे, इस प्रकार परस्पर एक दूसरे का खयाल रखते तुम परम श्रेय को प्राप्त करोगे॥

En And may you cherish gods by yagya and may gods foster you, for this is the means by which you will finally achieve the ultimate state.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 3 शलोक 12

इष्टान्भोगान्हि वह देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः।
तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः॥12॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 3 शलोक 12 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hi यज्ञों से संतुष्ट हुऐ देवता तुम्हें मन पसंद भोग प्रदान करेंगे। जो उनके दिये हुऐ भोगों को उन्हें दिये बिना खुद ही भोगता है वह चोर है॥

En The gods you foster by yagya will shower upon you without asking all the joys you wish for, but the man who avails himself of these joys without having paid for them is truly a thief.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 3 शलोक 13

यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः।
भुञ्जते ते त्वघं पापा यह पचन्त्यात्मकारणात्॥13॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 3 शलोक 13 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hi जो यज्ञ से निकले फल का आनंद लेते हैं वह सब पापों से मुक्त हो जाते हैं लेकिन जो पापी खुद पचाने को लिये ही पकाते हैं वे पाप के भागीदार बनते हैं॥

En The wise who partake of what is left over from yagya are rid of all evil, but the sinners who cook only for the sustenance of their bodies partake of nothing but sin.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 3 शलोक 14

अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः।
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः॥14॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 3 शलोक 14 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hi जीव अनाज से होते हैं। अनाज बिरिश से होता है। और बिरिश यज्ञ से होती है। यज्ञ कर्म से होता है॥ (यहाँ प्राकृति के चलने को यज्ञ कहा गया है)

En All beings get their life from food, food grows from rain, rain emerges from yagya, and yagya is an outcome of action.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 3 शलोक 15

कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम्।
तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्॥15॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 3 शलोक 15 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hi कर्म ब्रह्म से सम्भव होता है और ब्रह्म अक्षर से होता है। इसलिये हर ओर स्थित ब्रह्म सदा ही यज्ञ में स्थापित है।

En Be it known to you that action arose from the Ved and the Ved from the indestructible Supreme Spirit, so that the allpervasive, imperishable God is ever present in yagya.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 3 शलोक 16

एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः।
अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति॥16॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 3 शलोक 16 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hi इस तरह चल रहे इस चक्र में जो हिस्सा नहीं लेता, सहायक नहीं होता, अपनी ईन्द्रीयों में डूबा हुआ वह पाप जीवन जीने वाला, व्यर्थ ही, हे पार्थ, जीता है॥

En The man in this world, O Parth, who loves sensual pleasure and lead an impious life, and does not conduct himself in accordance with the thus prescribed cycle (of Selfrealization), leads but a futile life.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 3 शलोक 17

यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः।
आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते॥17॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 3 शलोक 17 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hi लेकिन जो मानव खुद ही में स्थित है, अपने आप में ही तृप्त है, अपने आप में ही सन्तुष्ट है, उस के लिये कोई भी कार्य नहीं बचता॥

En But there remains nothing more to do for the man who rejoices in his Self, finds contentment in his Self, and feels adequate in his Self.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 3 शलोक 18

नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन।
न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः॥18॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 3 शलोक 18 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hi न उसे कभी किसी काम के होने से कोई मतलब है और न ही न होने से। और न ही वह किसी भी जीव पर किसी भी मतलब के लिये आश्रय लेता है॥

En Such a man has neither anything to gain from action nor anything to lose from inaction, and he has no interest in any being or any object.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 3 शलोक 19

तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर।
असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः॥19॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 3 शलोक 19 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hi इसलिये कर्म से जुड़े बिना सदा अपना कर्म करते हुऐ समता का अचरण करो॥ बिना जुड़े कर्म का आचरण करने से पुरुष परम को प्राप्त कर लेता है॥

En So always do what is right for you to do in the spirit of selflessness, for in doing his duty the selfless man attains to God.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 3 शलोक 20

कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः।
लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन्कर्तुमर्हसि॥20॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 3 शलोक 20 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hi कर्म के द्वारा ही जनक आदि सिद्धी में स्थापित हुऐ थे। इस लोक समूह, इस संसार के भले के लिये तुम्हें भी कर्म करना चाहिऐ॥

En Since sages such as Janak had also attained to the ultimate realization by action, and keeping in mind, the preservation of the (God made) order, it is incumbent upon you to act.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 3 शलोक 21

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥21॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 3 शलोक 21 का हिन्दी और English में अनुवाद

क्योंकि जो ऐक श्रेष्ठ पुरुष करता है, दूसरे लोग भी वही करते हैं। वह जो करता है उसी को प्रमाण मान कर अन्य लोग भी पीछे वही करते हैं॥

Others emulate the actions of a great man and closely follow the example set by him.

सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 3 शलोक 22

न में पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंचन।
नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि॥22॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 3 शलोक 22 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hi हे पार्थ, तीनो लोकों में मेरे लिये कुछ भी करना वाला नहीं है। और न ही कुछ पाने वाला है लेकिन फिर भी मैं कर्म में लगता हूँ॥

En Although, O Parth, there is no task in all the three worlds which I have to do, and neither is there any worthwhile object which I have not achieved, I am yet engaged in action.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 3 शलोक 23

यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥23॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 3 शलोक 23 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hi हे पार्थ, अगर मैं कर्म में नहीं लगूँ तो सभी मनुष्य भी मेरे पीछे वही करने लगेंगे॥

En For should I not be diligent in the performance of my task, O Parth, other men will follow my example in every way.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 3 शलोक 24

उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम्।
संकरस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः॥24॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 3 शलोक 24 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hi अगर मै कर्म न करूँ तो इन लोकों में तबाही मच जायेगी और मैं इस प्रजा का नाशकर्ता हो जाऊँगा॥

En If I do not perform my action well, the whole world will perish and I Shall be the cause of varnsankar and so a destroyer of mankind.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 3 शलोक 25

श्रीभगवान बोले (THE LORD SAID):

सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत।
कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम्॥25॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 3 शलोक 25 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hi जैसे अज्ञानी लोग कर्मों से जुड़ कर कर्म करते हैं वैसे ही ज्ञानमन्दों को चाहिये कि कर्म से बिना जुड़े कर्म करें। इस संसार चक्र के लाभ के लिये ही कर्म करें।

En As the ignorant act with a feeling of attachment to their actions, even so, O Bharat, the wise ought to act for the presentation of the (divinely) established world-order.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 3 शलोक 26

न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम्।
जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन्॥26॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 3 शलोक 26 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hi जो लोग कर्मो के फलों से जुड़े है, कर्मों से जुड़े हैं ज्ञानमंद उनकी बुद्धि को न छेदें। सभी कामों को कर्मयोग बुद्धि से युक्त होकर समता का आचरण करते हुऐ करें॥

En Rather than confusing and undermining the faith of the ignorant who are attached to action, the wise man should prompt them to dwell in God and act well as he himself does.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 3 शलोक 27
 शलोक 27

प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः।
अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते॥27॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 3 शलोक 27 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hi सभी कर्म प्रकृति में स्थित गुणों द्वारा ही किये जाते हैं। लेकिन अहंकार से विमूढ हुआ मनुष्य स्वय्म को ही कर्ता समझता है॥

En Although all action is caused by the properties of nature, the man with an egoistic and deluded mind presumes that he himself is the doer.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 3 शलोक 28

तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः।
गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते॥28॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 3 शलोक 28 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hi हे महाबाहो, गुणों और कर्मों के विभागों को सार तक जानने वाला, यह मान कर की गुण ही गुणों से वर्त रहे हैं, जुड़ता नहीं॥

En But the wise man, who is aware of different spheres of the properties of nature in the form of mind and senses as well as of their action upon objects, is not a prey to attachment, O the mighty-armed, because he knows that the mind and senses (gun) dwell upon objects of perception (gun).
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 3 शलोक 29

प्रकृतेर्गुणसंमूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु।
तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत्॥29॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 3 शलोक 29 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hi प्रकृति के गुणों से मूर्ख हुऐ, गुणों के कारण हुऐ उन कर्मों से जुड़े रहते है। सब जानने वाले को चाहिऐ कि वह अधूरे ज्ञान वालों को विचलित न करे॥

En They ought not to undermine the faith of the deluded who are unaware of the truth, because they are enamoured of the constituents of matter and so attached to senses and their functions.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 3 शलोक 30
 शलोक 30

मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा।
निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः॥30॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 3 शलोक 30 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hi सभी कर्मों को मेरे हवाले कर, अध्यात्म में मन को लगाओ। आशाओं से मुक्त होकर, “मै” को भूल कर, बुखार मुक्त होकर युद्ध करो॥

En So, O Arjun, contemplate the Self, surrender all your action to me, abandon all desire, pity, and grief, and be ready to fight.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 3 शलोक 31

यह में मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः।
श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः॥31॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 3 शलोक 31 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hi मेरे इस मत को, जो मानव श्रद्धा और बिना दोष निकाले सदा धारण करता है और मानता है, वह कर्मों से मु्क्ती प्राप्त करता है॥

En Unquestioning and devoted men who always act according to this precept of mine are liberated from action.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 3 शलोक 32

यह त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति में मतम्।
सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः॥32॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 3 शलोक 32 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hi जो इसमें दोष निकाल कर मेरे इस मत का पालन नहीं करता, उसे तुम सारे ज्ञान से वंचित, मूर्ख हुआ और नष्ट बुद्धी जानो॥

En Know that skeptical men, who do not act in keeping with this precept of mine because they are devoid of knowledge and discrimination, are doomed to misery.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 3 शलोक 33

सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि।
प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति॥33॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 3 शलोक 33 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hi सब वैसा ही करते है जैसी उनका स्वभाव होता है, चाहे वह ज्ञानवान भी हों। अपने स्वभाव से ही सभी प्राणी होते हैं फिर सयंम से क्या होगा॥

En Since all beings are constrained to act in conformity with their natural disposition and the wise man also strives accordingly, of what avail can violence (with nature) be?
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 3 शलोक 34

इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ।
तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ॥34॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 3 शलोक 34 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hi इन्द्रियों के लिये उन के विषयों में खींच और घृणा होती है। इन दोनो के वश में मत आओ क्योंकि यह रस्ते के रुकावट हैं॥

En Do not be ruled by attachment and aversion, because both of them are the great enemies that obstruct you on the way to good.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 3 शलोक 35

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः॥35॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 3 शलोक 35 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hi अपना काम ही अच्छा है, चाहे उसमे कमियाँ भी हों, किसी और के अच्छी तरह किये काम से। अपने काम में मृत्यु भी होना अच्छा है, किसी और के काम से चाहे उसमे डर न हो॥

En Although inferior (in merit), one’s own dharm is the best and even meeting with death in it brings good, whereas a dharm other than one’s own, though well observed, generates only fear.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 3 शलोक 36

अर्जुन बोले (Arjun Said):

अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः।
अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः॥36॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 3 शलोक 36 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hi लेकिन, हे वार्ष्णेय, किसके जोर में दबकर पुरुष पाप करता है, अपनी मरजी के बिना भी, जैसे कि बल से उससे पाप करवाया जा रहा हो॥

En What, O Varshneya (Krishn), is that which drives man, forced against his will as it were and with reluctance, to act impiously?
<< सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 2 सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 4 >>

 

Rate This Article: