Homeधार्मिक ग्रंथसम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीतासम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता – अध्याय 18 शलोक 1 से 78

सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता – अध्याय 18 शलोक 1 से 78

सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 18 शलोक 1 से 78

सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 1

अर्जुन बोले (Arjun Said):

संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम्।
त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन॥1॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 18 शलोक 1 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiहे महाबाहो, हे हृषीकेश, हे केशिनिषूदन, मैं संन्यास और त्याग (कर्म योग) के सार को अलग अलग जानना चाहता हूँ।

Enl am curious to learn, O the mighty armed, O Hrishikesh, master of the senses and slayer of demons the principles of relinquishment and of renunciation.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 2

श्री भगवान बोले (THE LORD SAID):

काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः।
सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः॥2॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 18 शलोक 2 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiबुद्धिमान ज्ञानी जन कामनाओं से उत्पन्न हुये कर्मों के त्याग को सन्यास समझते हैं और सभी कर्मों के फलों के त्याग को बुद्धिमान लोग त्याग (कर्म योग) कहते हैं।

EnWhereas numerous scholars use renunciation for the giving up of coveted deeds many others of mature judgement use relinquishment to name the abnegation of the fruits of all action.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 3

त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः।
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे॥3॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 18 शलोक 3 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiकुछ मुनि जन कहते हैं की सभी कर्म दोषमयी होने के कारण त्यागने योग्य हैं। दूसरे कहते हैं की यज्ञ, दान और तप कर्मों का त्याग नहीं करना चाहिये।

EnWhile many erudite men insist that since all actions are vile they ought to be forsaken, other scholars proclaim that deeds such as yagya, charity, and penance ought not to be forsaken.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 4

निश्चयं शृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम।
त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः संप्रकीर्तितः॥4॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 18 शलोक 4 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiकर्मों के त्याग के विषय में तुम मेरा निश्चय सुनो हे भरतसत्तम। हे पुरुषव्याघ्र, त्याग को तीन प्रकार का बताया गया है।

EnListen, O the best of Bharat, to my notion of renunciation and of how, O the unmatched among men, this renunciation is said to be of three kinds.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 5

यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्।
यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्॥5॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 18 शलोक 5 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiयज्ञ, दान और तप कर्मों का त्याग करना उचित नहीं है – इन्हें करना चाहिये। यज्ञ, दान और तप मुनियों को पवित्र करते हैं।

EnRather than forsaking them, deeds such as yagya, charity, and penance ought certainly to be undertaken as a duty, for yagya, charity, and penance are deeds that redeem men of wisdom.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 6

एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च।
कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम्॥6॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 18 शलोक 6 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiपरन्तु ये कर्म (यज्ञ दान तप कर्म) भी संग त्याग कर तथा फल की इच्छा त्याग कर करने चाहिये, केवल अपना कर्तव्य जान कर। यह मेरा उत्तम निश्चय है।

EnIt is my considered belief, O Parth, that these deeds as also all others ought certainly to be accomplished after forsaking attachment and desire for the fruits of labour.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 7

नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते।
मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः॥7॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 18 शलोक 7 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiनियत कर्म का त्याग करना उचित नहीं हैं। मोह के कारण कर्तव्य कर्म का त्याग करना तामसिक कहा जाता है।

EnAnd, since the requisite action ought not to be abandoned, forsaking it out of some misconception is deemed as renunciation of the nature of ignorance (tamas).
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 8

दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत्।
स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत्॥8॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 18 शलोक 8 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiशरीर को कष्ट देने के भय से कर्म को दुख मानते हुये उसे त्याग देने से मनुष्य को उस त्याग का फल प्राप्त नहीं होता। ऐसे त्याग को राजसिक त्याग कहा जाता है।

EnHe who rashly foregoes action under the assumption that all of it is grievous, or out of fear of physical suffering, is deprived of the merits of his relinquishment.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 9

कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन।
सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः॥9॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 18 शलोक 9 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiहे अर्जुन, जिस नियत कार्य को कर्तव्य समझ कर किया जाये, संग को त्याग कर तथा फल को मन से त्याग कर, ऐसे त्याग को सातविक माना जाता है।

EnOnly that relinquishment is esteemed righteous, O Arjun, which is ordained and practised with the conviction that doing it after having forsaken attachment and fruits of labour is a moral commitment.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 10

न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते।
त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः॥10॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 18 शलोक 10 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiजो मनुष्य न अकुशल कर्म से द्वेष करता है और न ही कुशल कर्म के प्रति खिचता है (अर्थात न लाभदायक फल की इच्छा करता है और न अलाभ के प्रति द्वेष करता है), ऐसा त्यागी मनुष्य सत्त्व में समाहित है, मेधावी (बुद्धिमान) है और संशय हीन है।

EnGifted with flawless moral excellence and freedom from doubt, one who neither abhors deeds that are unpropitious nor is enamoured of those that are propitious is wise and self-denying.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 11

न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः।
यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते॥11॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 18 शलोक 11 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiदेहधारीयों के लिये समस्त कर्मों का त्याग करना सम्भव नहीं है। परन्तु जो कर्मों के फलों का त्याग करता है, वही वास्तव में त्यागी है।

EnSince the abandonment of all action by an embodied being is impossible, the one who has given up the fruits of action is credited with having practised relinquishment.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 12

अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम्।
भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां क्वचित्॥12॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 18 शलोक 12 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiकर्म का तीन प्रकार का फल हो सकता है – अनिष्ट (बुरा), इष्ट (अच्छा अथवा प्रिय) और मिला-जुला (दोनों)। जन्होंने कर्म के फलों का त्याग नहीं किया, उन्हें वे फल मृत्यु के पश्चात भी प्राप्त होते हैं, परन्तु उन्हें कभी नहीं जिन्होंने उन का त्याग कर दिया है।

EnWhereas the triple returns-good, bad, and mixed-of covetous people’s actions, issue forth even after death, the actions of people who have renounced all, do not ever bear any fruits.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 13

 श्री भगवान बोले (THE LORD SAID):

पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे।
सांख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम्॥13॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 18 शलोक 13 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiहे महाबाहो, सभी कर्मों के सिद्ध होने के पीछे पाँच कारण साँख्य सिद्धांत में बताये गये हैं। उनका तुम मुझ से ज्ञान लो।

EnLearn well from me, O the mighty-armed, the five principles that Sankhya 1 acknowledges as accomplishers of all action.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 14

अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्।
विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम्॥14॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 18 शलोक 14 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiये पाँच हैं – अधिष्ठान, कर्ता, विविध प्रकार के करण, विविध प्रकार की चेष्टायें तथा देव।

EnIn respect of this, there are the prime mover, the several agents, the varied endeavours, the sustaining power, and likewise the fifth means that is providence.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 15

शरीरवाङ्‌मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः।
न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः॥15॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 18 शलोक 15 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiमनुष्य अपने शरीर, वाणी अथवा मन से जो भी कर्म का आरम्भ करता है, चाहे वह न्याय पूर्ण हो या उसके विपरीत, यह पाँच उस कर्म के हेतु (कारण) होते हैं।

EnThese are the five causes of whatever action a man accomplishes with his mind, speech, and body, either in accordance with or even in contravention of scripture.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 16

तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः।
पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः॥16॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 18 शलोक 16 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiजो मनुष्य अशुद्ध बुद्धि द्वारा केवल अपने आत्म को ही कर्ता देखता है (कर्म करने का एक मात्र कारण), वह दुर्मति सत्य नहीं देखता।

EnDespite this, however he who-out of his immature judgement-views the consummate, detached Self as the doer is dull-minded and he sees not.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 17

यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते।
हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते॥17॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 18 शलोक 17 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiजिस में यह भाव नहीं है की ‘मैंने किया है’ और जिस की बुद्धि लिपि नहीं है (शुद्ध है), वह इस संसार में (किसी जीव को) मार कर भी नहीं मारता और न ही (कर्म फल में) बँधता है।

EnThough he may slay, the man who is liberated from conceit and whose mind is unsullied is neither a killer nor bound by his action.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 18

ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना।
करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसंग्रहः॥18॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 18 शलोक 18 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiज्ञान, ज्ञेय (जाने जाने योग्य) औऱ परिज्ञाता – ये कर्म में प्रेरित करते हैं, और करण, कर्म और कर्ता – यह कर्म के संग्रह (निवास स्थान) हैं।

EnWhereas the way of securing knowledge, the worthwhile knowledge, and the knower constitute the threefold inspiration to action, the doer, the agents, and the action itself are the threefold constituents of action.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 19

 श्री भगवान बोले (THE LORD SAID):

ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः।
प्रोच्यते गुणसंख्याने यथावच्छृणु तान्यपि॥19॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 18 शलोक 19 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiज्ञान (कोई जानकारी), कर्म और कर्ता भी साँख्य सिद्धांत में गुणों के अनुसार तीन प्रकार के बताये गये हैं। उन का भी तुम मुझसे यथावत श्रवण करो।

EnListen to me well on how even knowledge and action and the doer have been graded into three kinds each, in the Sankhya philosophy of properties (gun).
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 20

सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते।
अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम्॥20॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 18 शलोक 20 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiजिस ज्ञान द्वारा मनुष्य सभी जीवों में एक ही अव्यय भाव (परमेश्वर) को देखता है, एक ही अविभक्त (जो बाँटा हुआ नहीं है) को विभिन्न विभिन्न रूपों में देखता है, उस ज्ञान को तुम सात्विक जानो।

EnKnow that knowledge as immaculate (sattwik) by which one perceives the reality of the indestructible God as an undivided entity in all divided beings.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 21

पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान्।
वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम्॥21॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 18 शलोक 21 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiजिस ज्ञान द्वारा मनुष्य सभी जीवों को अलग अलग विभिन्न प्रकार का देखता है, उस ज्ञान दृष्टि को तुम राजसिक जानो।

EnKnow that knowledge as tainted by passion by which one perceives divided entities in all separate beings.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 22

यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम्।
अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम्॥22॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 18 शलोक 22 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiऔर जिस ज्ञान से मनुष्य एक ही व्यर्थ कार्य से जुड जाता है मानो वही सब कुछ हो, वह तत्वहीन, अल्प (छोटे) ज्ञान को तुम तामसिक जानो।

EnAnd know that knowledge as besmirched by ignorance (tamas) which adheres to the body alone as if it were the whole truth, and which is irrational, unfounded on truth, and petty.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 23

नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतम्।
अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते॥23॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 18 शलोक 23 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiजो कर्म नियत है (कर्तव्य है), उसे संग रहित और बिना राग द्वेष के किया गया है, जिसे फल की इच्छा नहीं रख कर किया गया है, उस कर्म को सात्विक कहा जाता है।

EnThat action is said to be immaculate which is ordained and embarked on with detachment, by one who is free from infatuation as well as loathing, and who does not aspire to any reward.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 24

यत्तु कामेप्सुना कर्म साहंकारेण वा पुनः।
क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम्॥24॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 18 शलोक 24 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiजो कर्म बहुत परिश्रम से फल की कामना करते हुये किया गया है, अहंकार युक्त पुरुष द्वारा किया गया है, वह कर्म राजसिक है।

EnAnd that action is said to be of the nature of passion which is strenuous and entered upon by one who covets rewards and is egotisti.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 25

अनुबन्धं क्षयं हिंसामनवेक्ष्य च पौरुषम्।
मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते॥25॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 18 शलोक 25 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiजो कर्म सामर्थय का, परिणाम का, हानि और हिंसा का ध्यान न करते हुये मोह द्वारा आरम्भ किया गया है, जो कर्म तामसिक कहलाता है।

EnThat action is said to be unenlightened which is taken up out of sheer ignorance and with disregard for outcome, loss to oneself, and injury to others, as well as for one’s own competence.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 26

मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः।
सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते॥26॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 18 शलोक 26 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiजो कर्ता संग मुक्त है, ‘अहम’ वादी नहीं है, धृति (स्थिरता) और उत्साह पूर्ण है, तथा कार्य के सिद्ध और न सिद्ध होने में एक सा है (अर्थात फल से जिसे कोई मतलब नहीं), ऐसे कर्ता को सात्विक कहा जाता है।

EnThat doer is said to be of immaculate nature who is free from attachment, who does not indulge in arrogant speech, and who is endowed with patience and vigour as well as unswayed by success and failure.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 27

रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः।
हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः॥27॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 18 शलोक 27 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiजो कर्ता रागी होता है, अपने किये काम के फल के प्रति इच्छा और लोभ रखता है, हिंसात्मक और अपवित्र वृत्ति वाला होता है, तथा (कर्म के सिद्ध होने या न होने पर) प्रसन्नता और शोक ग्रस्त होता है, उसे राजसिक कहा जाता है।

EnThat doer is said to be of the attribute of passion who Is impulsive, covetous of the fruits of action, acquisitive, pernicious, vitiated, and subject to joy and sorrow.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 28

अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः।
विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते॥28॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 18 शलोक 28 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiजो कर्ता अयुक्त (कर्म भावना का न होना, सही चेतना न होना) हो, स्तब्ध हो, आलसी हो, विषादी तथा दीर्घ सूत्री हो (लम्बा खीचने वाला हो) (जिसकी कर्म न करने में ही रुची हो तथा आलस से भरा हो) – ऐसे कर्ता को तामसिक कहते हैं।

EnThat doer is said to be of the attribute of ignorance who is fickle, uncouth, vain, devious, spiteful, dispirited, lazy, and procrastinatin.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 29

बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृणु।
प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनंजय॥29॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 18 शलोक 29 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiहे धनंजय, अब तुम अशेष रूप से अलग अलग बुद्धि तथा धृति (स्थिरता) के भी तीनों गुणों के अनुसार जो भेद हैं, वे सुनो।

EnListen to me, too, O Dhananjay, on the threefold classification according to the properties of nature as I make them exhaustively and respectively, of intellect, steadfastness, and happiness.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 30

प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये।
बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी॥30॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 18 शलोक 30 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiप्रवृत्ति (किसी भी चीज़ या कर्म में लगना) और निवृत्ति (किसी भी चीज़ या कर्म से मानसिक छुटकारा पाना) क्या है (तथा किस चीज में प्रवृत्त होना चाहिये और किस से निवृत्त होना चाहिये), कार्य क्या है, और अकार्य (कार्य न करना) क्या है, भय क्या है और अभय क्या है, किस से बन्धन उत्पन्न होता है, और किस से मोक्ष उत्पन्न होता है – जो बुद्धि इन सब को जानती है (इनका भेद देखती है), हे पार्थ वह बुद्धि सात्त्विकहै।

EnThat intellect is immaculate, O Parth, which is aware of the essence, of the way of inclination as also of renunciation, of worthy and unworthy action, of fear and fearlessness, and of bondage and liberation.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 31

यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च।
अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी॥31॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 18 शलोक 31 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiहे पार्थ, जिस बुद्धि द्वारा मनुष्य अपने धर्म (कर्तव्य) और अधर्म को, तथा कार्य (जो करना चाहिये) और अकार्य को सार से नहीं जानता, वह बुद्धि राजसिक है।

EnThat intellect is of the nature of passion and moral blindness, O Parth, by which one cannot even know the righteous and the unrighteous as well as what is worthy or unworthy of being done.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 32

अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता।
सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी॥32॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 18 शलोक 32 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiहे पार्थ, जिस बुद्धि से मनुष्य अधर्म को ही धर्म मानता है, अंधकार से ठकी जिस बुद्धि द्वारा मनुष्य सभी हितकारी गुणों अथवा कर्तव्यों को विपरीत ही देखता है, वह बुद्धि तामसिक है।

EnThat intellect is of the nature of ignorance, O Parth, which is enveloped in darkness and which apprehends the sinful as virtuous and views everything in a distorted way.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 33

धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः।
योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी॥33॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 18 शलोक 33 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiहे पार्थ, जिस धृति (मानसिक स्थिरता) द्वारा मनुष्य अपने प्राण और इन्द्रियों की क्रियाओं को नियमित करता है, तथा उन्हें नित्य योग साधना में प्रविष्ट करता है, ऐसी धृति सातविक है।

EnThat resolute steadfastness, by which, O Parth, one governs through the practice of yog operations of the mind, the life-breaths, and the senses, is immaculate.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 34

यया तु धर्मकामार्थान्धृत्या धारयतेऽर्जुन।
प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी॥34॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 18 शलोक 34 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiहे अर्जुन, जब मनुष्य फलों की इच्छा रखते हुये, अपने (स्वार्थ हेतु) धर्म, इच्छा और धन की प्राप्ति के लिये कर्मों तथा चेष्टाओं में प्रवृत्त रहता है, वह धर्ति राजसिक है हे पार्थ।

EnThat steadfastness, O Parth, by which the avaricious man holds fast and acquisitively to obligations, wealth, and pleasure, is of the nature of passion and moral blindness.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 35
शलोक 35

यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च।
न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी॥35॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 18 शलोक 35 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiहे पार्थ, जिस दुर्बुद्धि भरी धृति के कारण मनुष्य स्वप्न (निद्रा), भय, शोक, विषाद, मद (मूर्खता) को नहीं त्यागता, वह तामसिक है।

En(And) that steadfastness, O Parth, by which the evilminded man declines to forsake sloth, fear, worry, grief, and also arrogance, is of the nature of ignorance.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 36, 37

सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृणु मे भरतर्षभ।
अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति॥36॥

यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम्।
तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम्॥37॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 18 शलोक 36, 37 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiउसी प्रकार, हे भरतर्षभ, तुम मुझ से तीन प्रकार के सुख के विषय में भी सुनो। वह सुख जो (योग) अभ्यास द्वारा प्राप्त होता है, तथा जिस से मनुष्य को दुखों का अन्त प्राप्त होता है, जो शुरु में तो विष के समान प्रतीत होता है (प्रिय नहीं लगता), परन्तु उस का परिणाम अमृत समान होता है (प्रिय लगता है), उस स्वयं की बुद्धि की प्रसन्नता (सुख) से प्राप्त होने वाले सुख को सात्विक कहा जाता है।

EnNow listen to me, O the best of Bharat, on the three kinds of happiness, including the felicity, which one comes to dwell in, by practice and thus achieves cessation of griefs. That happiness which is at first like poison but finally tastes like nectar, for it issues forth from the lucidity of an intellect that has realized the Self, is of an impeccable nature.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 38

विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम्।
परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम्॥38॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 18 शलोक 38 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiजो सुख भावना विषयों की इन्द्रियों के संयोग से प्राप्त होती है (जैसी स्वादिष्ट भोजन आदि), जो शुरु में तो अमृत समान प्रतीत होता है, परन्तु उसका परिणाम विष जैसा होता है, उस सुख को तुम राजसिक जानो।

EnThat happiness which springs from the association of the senses with their objects, and which is like nectar at the beginning but like gall at the end, is said to be tainted with passion and moral blindness.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 39

यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः।
निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम्॥39॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 18 शलोक 39 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiजो सुख शुरु में तथा अन्त में भी आत्मा को मोहित करता है, निद्रा, आलस्य और प्रमाद से उत्पन्न होने वाले ऐसी सुख भावना को तामसिक कहा जाता है।

EnThat happiness which both initially and finally beguile the Self, and which arises from slumber, lethargy, and negligence, is said to be of the nature of ignorance.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 40

न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः।
सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः॥40॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 18 शलोक 40 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiऐसा कोई भी जीव नहीं है, न इस पृथवि पर और न ही दिव्य लोक के देवताओं में, जो प्रकृति से उत्पन्न हुये इन तीन गुणों से मुक्त हो।

EnThere is no being, either on earth or among the dwellers of heaven, who is entirely free from the three properties born of nature.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 41

 श्री भगवान बोले (THE LORD SAID):

ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप।
कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः॥41॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 18 शलोक 41 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiहे परन्तप, ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों और शूद्रों के कर्म उन के स्वभाव से उत्पन्न गुणों के अनुसार ही विभक्त किये गये हैं।

EnThe duties of Brahmin, Kshatriya, Vaishya, as also of Shudr are determined by properties that are born out of their nature.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 42

शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च।
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्॥42॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 18 शलोक 42 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiमानसिक शान्ति, संयम, तपस्या, पवित्रता, शान्ति, सरलता, ज्ञान तथा अनुभव – यह सब ब्राह्मण के स्वभाव से ही उत्पन्न कर्म हैं।

EnSelf-restraint, subduing of the senses, innocence, continence, mercy, uprightness, piety, true knowledge, and direct perception of divinity are the Brahmins province-born our of his nature.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 43

शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्।
दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्॥43॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 18 शलोक 43 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiशौर्य, तेज, स्थिरता, दक्षता, युद्ध में पीठ न दिखाना, दान, स्वामी भाव – यह सब एक क्षत्रीय के स्वभाविक कर्म हैं।

EnValour, majesty, dexterity, unwillingness to retreat in battle, charity, and sovereignty are the natural province of a Kshatriya.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 44

कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्।
परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्॥44॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 18 शलोक 44 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiकृषि, गौ रक्षा, वाणिज्य – यह वैश्य के स्वभाव से उत्पन्न कर्म हैं। परिचर्य – यह शूद्र के स्वाभिक कर्म हैं।

EnFarming, protection of cows (the senses) and commerce are the natural province of a Vaishya, whereas rendering service is the natural calling of a Shudr.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 45

स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः।
स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥45॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 18 शलोक 45 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiअपने अपने (स्वभाव से उत्पन्न) कर्मों का पालन करते हुये मनुष्य सिद्धि (सफलता) को प्राप्त करता है। मनुष्य वह सिद्धि लाभ कैसे प्राप्त करता है – वह तुम सुनो।

EnCommitment to his own inborn duty brings man to the ultimate accomplishment and you should listen to me on how a man achieves perfection through dedication to his innate calling.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 46

यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्।
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः॥46॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 18 शलोक 46 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiजिन (परमात्मा) से यह सभी जीव प्रवृत्त हुये हैं (उत्पन्न हुये हैं), जिन से यह संपूर्ण संसार व्याप्त है, उन परमात्मा की अपने कर्म करने द्वारा अर्चना कर, मनुष्य सिद्धि को प्राप्त कर लेता है।

EnBy adoration of that God, who has created all beings and who pervades the whole universe, through the undertaking of his natural calling, man attains to final accomplishment.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 47

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्॥47॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 18 शलोक 47 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiदूसरे का गुण संपन्न धर्म के बराबर अपना धर्म (कर्तव्य, कर्म) ही श्रेय है (बेहतर है), भले ही उस में कोई गुण न हों, क्योंकि अपने स्वभाव द्वारा नियत कर्म करते हुये मनुष्य पाप प्राप्त नहीं करता।

EnEven though unmeritorious, one’s own native calling is superior to the office of others, for a man carrying out his natural obligation does not bring sin upon himself.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 48

सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्।
सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः॥48॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 18 शलोक 48 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiहे कौन्तेय, अपने जन्म से उत्पन्न (स्वभाविक) कर्म को उसमें दोष होने पर भी नहीं त्यागना चाहिये, क्योंकि सभी आरम्भों में (कर्मों में) ही कोई न कोई दोष होता है, जैसे अग्नि धूँयें से ठकी होती है।

EnOne’s innate duty ought not to be forsaken, O son of Kunti, even if it is blemished, because all actions are impaired by some flaw or the other as fire is shrouded by smoke.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 49

श्री भगवान बोले (THE LORD SAID):

असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः।
नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति॥49॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 18 शलोक 49 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiहर जगह असक्त (संग रहित) बुद्धि मनुष्य जिसने अपने आप पर जीत पा ली है, हलचल (स्पृह) मुक्त है, ऐसा मनुष्य सन्यास (मन से इच्छा कर्मों के त्याग) द्वारा नैष्कर्म सिद्धि को प्राप्त होता है।

EnHe whose intellect is aloof all round, who is without desire, and who has conquered his mind, attains to the ultimate state that transcends all action through renunciation.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 50

सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे।
समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा॥50॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 18 शलोक 50 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiइस प्रकार सिद्धि प्राप्त किया मनुष्य किस प्रकार ब्रह्म को प्राप्त करता है, तथा उसके ज्ञान की क्या निष्ठा होती है वह तुम मुझ से संक्षेप में सुनो।

EnLearn in brief from me, O son of Kunti, of how one who is immaculate achieves realization of the Supreme Being, which represents the culmination of knowledge.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 51, 52, 53

बुद्ध्या विशुद्ध्या युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च।
शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च॥51॥
विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः।
ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः॥52॥

अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम्।
विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते॥53॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 18 शलोक 51, 52, 53 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiपवित्र बुद्धि से युक्त, अपने आत्म को स्थिरता से नियमित कर, शब्द आदि विषयों को त्याग कर, तथा राग-द्वेष आदि को छोड कर, एकेले स्थान पर निवास करते हुये, नियमित आहार करते हुये, अपने शरीर, वाणी और मन को योग में प्रविष्ट करते हुये वह योगी नित्य ध्यान योग में लगा, वैराग्य पर आश्रित रहता है। तथा अहंकार, बल, घमन्ड, इच्छा, क्रोध और घर संपत्ति आदि को मन से त्याग कर, ‘मैं’ भाव से मुक्त हो शान्ति को प्राप्त करता है और ब्रह्म प्राप्ति का पात्र बनता है।

EnBlessed with a pure intellect, firmly in command of the Self, with objects of sensual gratification like sound forsaken , with both fondness and revulsion destroyed,- Dwelling in seclusion, eating frugally, subdued in mind, speech and body, incessantly given to the yog of meditation, firmly resigned,- Giving up conceit, arrogance of power, yearning, ill humour, and acquisitiveness, devoid of attachment, and in possession of a mind at repose, a man is worthy of becoming one with God.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 54

ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति।
समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्॥54॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 18 शलोक 54 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiब्रह्म के साथ एक हो जाने पर, वह प्रसन्न आत्मा, न शोक करता है न इच्छा करता है। सभी जीवों के प्रति एक सा हो कर, वह मेरी परम भक्ति प्राप्त करता है।

EnIn this serene-tempered man, who views all beings equally, who abides intently in the Supreme Being, neither grieving over nor hankering after anything, there is fostered a faith in me that transcends all else.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 55

भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः।
ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्॥55॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 18 शलोक 55 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiउस भक्ति द्वारा वह मुझे पूर्णत्या, जितना मैं हुँ, सार तक मुझे जान लेता है। और मुझे सार तक जान लेने पर मुझ में ही प्रवेश कर जाता है (मुझ में एक हो जाता है)।

EnThrough his transcendental faith he knows my essence well, what my reach is, and having thus known my essence he is at once united with me.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 56

श्री भगवान बोले (THE LORD SAID):

सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः।
मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम्॥56॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 18 शलोक 56 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiसभी कर्मों के सदा मेरा ही आश्रय लेकर करो। मेरी कृपा से तुम उस अव्यय शाश्वत पद को प्राप्त कर लोगे।

EnAlthough engaged in action whole heartedly, one who finds refuge in me achieves the everlasting, indestructible, final bliss.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 57

चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः।
बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव॥57॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 18 शलोक 57 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiसभी कर्मों को अपने चित्त से मुझ पर त्याग दो (उन के फलों को मुझ पर छोड दो, और कर्मों को मेरे हवाले करते केवल मेरे लिये करो)। सदी इसी बुद्धि योग का आश्रय लेते हुये, सदा मेरे ही चित्त वाले बनो।

EnEarnestly resigning all your deeds to me, finding shelter in me, and embracing the yog of knowledge, you should ever fix your mind on me.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 58

मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।
अथ चेत्त्वमहंकारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि॥58॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 18 शलोक 58 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiमुझ में ही चित्त रख कर, तुम मेरी कृसा से सभी कठिनाईयों को पार कर जाओगे। परन्तु यदि तुम अहंकार वश मेरी आज्ञा नहीं सुनोगे तो विनाश को प्राप्त होगे।

EnEver resting on me, you will be saved from all afflictions and gain deliverance, but you shall be destroyed if out of arrogance you do not pay heed to my words.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 59

यदहंकारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे।
मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति॥59॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 18 शलोक 59 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiयदि तुम अहंकार वश (अहंकार का आश्रय लिये) यह मानते हो कि तुम युद्ध नहीं करोगे, तो तुम्हारा यह व्यवसाय (धारणा) मिथ्या है, क्योंकि तुम्हारी प्रकृति तुम्हें (युद्ध में) नियोजित कर देगी।

EnYour egotistic resolve not to fight is surely mistaken, for your nature will compel you to rake up arms in the war.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 60

स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा।
कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत्॥60॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 18 शलोक 60 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiहे कौन्तेय, सभी अपने स्वभाव के कारण अपने कर्मों से बंधे हुये हैं। जिसे तुम मोह के कारण नहीं करना चाहते, उसे तुम विवश होकर फिर भी करोगे।

EnBound by your natural calling even against your resolve, O son of Kunti, you will have to undertake the deed you are reluctant to do because of your self-deception.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 61

ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया॥61॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 18 शलोक 61 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiहे अर्जुन, ईश्वर सभी प्राणियों के हृदय में विराजमान हैं और अपनी माया द्वारा सभी जीवों को भ्रमित कर रहे हैं, मानो वे (प्राणी) किसी यन्त्र पर बैठे हों।

EnPropelling all living things that bestride a body-which is but a contrivance-by his maya, O Arjun, God abides in the hearts of all beings.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 62

तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।
तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्॥62॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 18 शलोक 62 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiउन्हीं की शरण में तुम संपूर्ण भावना से जाओ, हे भारत। उन्हीं की कृपा से तुम्हें परम शान्ति और शाश्वत स्थान प्राप्त होगा।

EnSeek refuge with all your heart, O Bharat, in that God by whose grace you will attain to repose and the everlasting, ultimate bliss.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 63

इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्‌गुह्यतरं मया।
विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु॥63॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 18 शलोक 63 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiइस प्रकार मैंने तुम्हें गुह्य से भी गूह्य इस ज्ञान का वर्णन किया। इस पर पूर्णत्या विचार करके जैसी तु्म्हारी इच्छा हो करो।

EnThus have I imparted to you the knowledge which is the most mysterious of all abstruse learning; so reflect well on the whole of it (and then) you may do as you wish.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 64

सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः।
इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम्॥64॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 18 शलोक 64 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiतुम एक बार फिर से सबसे ज्यादा रहस्यमयी मेरे परम वचन सुनो। तुम मुझे बहुत प्रिय हो, इसलिये मैं तुम्हारे हित के लिये तुम्हें बताता हूँ।

EnListen yet again to my most secret words, indeed felicitous, that I am going to speak to you because you are the dearest to me.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 65

मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे॥65॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 18 शलोक 65 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiमेरे मन वाले बनो, मेरे भक्त बनो, मेरी पूजा करने वाले बनो, मुझे नमस्कार करो। इस प्रकार तुम मुझे ही प्राप्त करोगे, मैं तुम्हें वचन देता हूँ, क्योंकि तुम मुझे प्रिय हो।

EnI give you my sincere pledge, because you are so dear to me, that you must attain to me if you keep me in mind, adore me, worship me, and bow in obeisance to me.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 66

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥66॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 18 शलोक 66 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiसभी धर्मों को त्याग कर (हर आश्रय त्याग कर), केवल मेरी शरण में बैठ जाओ। मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्ति दिला दुँगा, इसलिये शोक मत करो।

EnGrieve not, for l shall free you from all sins if you abandon all other obligations (dharm) and seek refuge in me alone.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 67

श्री भगवान बोले (THE LORD SAID):

इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन।
न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति॥67॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 18 शलोक 67 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiइसे कभी भी उसे मत बताना जो तपस्या न करता हो, जो मेरा भक्त ना हो, और न उसे जिसमें सेवा भाव न हो, और न ही उसे जो मुझ में दोष निकालता हो।

EnThis (the Geeta) which has been articulated for you must never be made known to one who is bereft of penance, devotion, and of willingness to listen, as also to one who speaks ill of me.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 68

य इमं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति।
भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः॥68॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 18 शलोक 68 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiजो इस परम रहस्य को मेरे भक्तों को बताता है, वह मेरी परम भक्ति करने के कारण मुझे ही प्राप्त करता है, इस में कोई संशय नहीं।

EnThe one who, with firm devotion to me, imparts this most secret teaching of my worshippers will doubtlessly attain to me.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 69

न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः।
भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि॥69॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 18 शलोक 69 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiन ही मनुष्यों में उस से बढकर कोई मुझे प्रिय कर्म करने वाला है, और न ही इस पृथ्वि पर उस से बढकर कोई और मुझे प्रिय होगा।

EnNeither is there among mankind any doer who is dearer to me than this man, nor will there by any in the world who is dearer to me than him.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 70

अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः।
ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः॥70॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 18 शलोक 70 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiजो हम दोनों के इस धर्म संवाद का अध्ययन करेगा, वह ज्ञान यज्ञ द्वारा मेरा पूजन करेगा, यह मेरा मत है।

EnAnd it is my belief that I shall have been worshipped through the yagya of knowledge by one who makes a thorough study of this sacred dialogue between us.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 71

श्रद्धावाननसूयश्च शृणुयादपि यो नरः।
सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम्॥71॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 18 शलोक 71 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiजो मनुष्य इसको श्रद्धा और दोष-दृष्टि रहित मन से सुनेगा, वह भी (अशुभ से) मुक्त हो पुण्य कर्म करने वालों के शुभ लोकों में स्थान ग्रहण करेगा।

EnEven he will be freed from sins who just hears it (the Geeta) with devoutness and without any ill will, and he will secure the worlds of the righteous.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 72

कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा।
कच्चिदज्ञानसंमोहः प्रनष्टस्ते धनंजय॥72॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 18 शलोक 72 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiहे पार्थ, क्या यह तुमने एकाग्र मन से सुना है। हे धनंजय, क्या तुम्हारा अज्ञान से उत्पन्न सम्मोह नष्ट हुआ है।

EnHave you, O Parth, listened intently to my words and, O Dhananjay, is your delusion born our of ignorance dispelled?
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 73

अर्जुन बोले (Arjun Said):

नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत।
स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव॥73॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 18 शलोक 73 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiहे अच्युत, आप की कृपा से मेरा मोह नष्ट हुआ, और मुझे वापिस स्मृति प्राप्त हुई है। मेरे सन्देह दूर हो गये हैं, और मैं आप के वचनों पर स्थित हुआ आप की आज्ञा का पालन करूंगा।

EnSince my ignorance has been dispelled by your grace, O Achyut, and I have recovered discernment, I am free from doubt and shall follow your precept.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 74

संजय बोले (Sanjay Said):

इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः।
संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम्॥74॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 18 शलोक 74 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiइस प्रकार मैंने भगवान वासुदेव और महात्मा पार्थ के इस अद्भुत रोम हर्षित करने वाले संवाद को सुना।

EnThus have I heard the mysterious and sublime dialogue of Vasudeo and the sage-like Arjun.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 75

व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद्गुह्यमहं परम्।
योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम्॥75॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 18 शलोक 75 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiभगवान व्यास जी के कृपा से मैंने इस परम गूह्य (रहस्य) योग को साक्षात योगेश्वर श्री कृष्ण के वचनों द्वारा सुना।

EnIt is by the blessing of the most revered Vyas that I have heard this transcendental, most mysterious yog enunciated directly by the Lord of yog Krishn himself.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 76

राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम्।
केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः॥76॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 18 शलोक 76 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiहे राजन, भगवान केशव और अर्जुन के इस अद्भुत पुण्य संवाद को बार बार याद कर मेरा हृदय पुनः पुनः हर्षित हो रहा है।

EnThe recollection of the felicitous and marvellous colloquy between Keshav and Arjun transports me , O King (Dhritrashtr), to sublime joy time after time.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 77

तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः।
विस्मयो मे महान् राजन्हृष्यामि च पुनः पुनः॥77॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 18 शलोक 77 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiऔर पुनः पुनः भगवान हरि के उस अति अद्भुत रूप को याद कर, मुझे महान विस्मय हो रहा है हे राजन, और मेरा मन पुनः पुनः हर्ष से भरे जा रहा है।

EnRecalling the amazing visage of the Lord again and again, O King, I am lost in wonder and ecstasy over and over.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 78

यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥78॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 18 शलोक 78 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiजहां योगेश्वर कृष्ण हैं, जहां धनुर्धर पार्थ हैं, वहीं पर श्री (लक्ष्मी, ऐश्वर्य, पवित्रता), विजय, विभूति और स्थिर नीति हैं – यही मेरा मत है।

EnGood fortune, conquest, splendour, and steadfast wisdom abide wherever are Lord Krishn and the noble archer Arjun : such is my conviction.
<< सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 17 सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 1 >>

 

Rate This Article: