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सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता – अध्याय 16 शलोक 1 से 24

सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 16 शलोक 1 से 24

सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 16 शलोक 1

श्री भगवान बोले (THE LORD SAID):

अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः।
दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्॥1॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 16 शलोक 1 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiअभय, सत्त्व संशुद्धि, ज्ञान और कर्म योग में स्थिरता, दान, इन्द्रियों का दमन, यज्ञ (जैसे प्राणायाम, जप यज्ञ, द्रव्य यज्ञ आदि), स्वध्याय, तपस्या, सरलता।

EnFearlessness, inner purity, steadfastness of yog for knowledge, charity, continence, yagya, study of scriptures, penance, and uprightness,…
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 16 शलोक 2

अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम्।
दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम्॥2॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 16 शलोक 2 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiअहिंसा (किसी भी प्राणी की हिंसा न करना), सत्य, क्रोध न करना, त्याग, मन में शान्ति होना (द्वेष आदि न रखना), सभी जीवों पर दया, संसारिक विषयों की तरफ उदासीनता, अन्त करण में कोमलता, अकर्तव्य करने में लज्जा।

EnNonviolence, truthfulness, abstinence from anger, renunciation, tranquillity, absence of malice, compassion for all beings, disinterestedness, tenderness, modesty, abstinence from futile effort,…
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 16 शलोक 3

तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता।
भवन्ति संपदं दैवीमभिजातस्य भारत॥3॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 16 शलोक 3 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiतेज, क्षमा, धृति (स्थिरता), शौच (सफाई और शुद्धता), अद्रोह (द्रोह – वैर की भावना न रखना), मान की इच्छा न रखना – हे भारत, यह दैवी प्रकृति में उत्पन्न मनुष्य के लक्षण होते हैं।

EnMagnificence, forgiveness, patience, purity of thought and conduct, and absence of animosity and vanity-are (all) attributes of the man endowed with divine riches.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 16 शलोक 4

दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च।
अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ संपदमासुरीम्॥4॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 16 शलोक 4 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiदम्भ (क्रोध अभिमान), दर्प (घमन्ड), क्रोध, कठोरता और अपने बल का दिखावा करना, तथा अज्ञान – यह असुर प्राकृति को प्राप्त मनुष्य के लक्षण होते हैं।

EnOstentation, arrogance and conceit as well as wrath, harsh speech, and ignorance are all, O Parth, the qualities of a man with devilish character.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 16 शलोक 5

दैवी संपद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता।
मा शुचः संपदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव॥5॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 16 शलोक 5 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiदैवी प्रकृति विमोक्ष में सहायक बनती है, परन्तु आसुरी बुद्धि और ज्यादा बन्धन का कारण बनती है। तुम दुखी मत हो क्योंकि तुम दैवी संपदा को प्राप्त हो हे अर्जुन।

EnSince it is established, O Pandav, that while the treasure of divinity liberates and the demoniacal state acts as a shackle, you have no need to grieve for you are blessed with divine riches.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 16 शलोक 6

श्री भगवान बोले (THE LORD SAID):

द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन्दैव आसुर एव च।
दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ मे शृणु॥6॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 16 शलोक 6 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiइस संसार में दो प्रकार के जीव हैं – दैवी प्रकृति वाले और आसुरी प्रकृति वाले। दैवी स्वभाव के बारे में अब तक विस्तार से बताया है। अब आसुरी बुद्धि के विषय में सुनो हे पार्थ।

EnThere are in the world, O Parth, two kinds of beings, the pious, on whom I have already dwelt at length, and the devilish of whom you will now hear from me.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 16 शलोक 7

प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः।
न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते॥7॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 16 शलोक 7 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiअसुर बुद्धि वाले मनुष्य प्रवृत्ति और निवृत्ति को नहीं जानते (अर्थात किस चीज में प्रवृत्त होना चाहिये किस से निवृत्त होना चाहिये, उन्हें इसका आभास नहीं)। न उनमें शौच (शुद्धता) होता है, न ही सही आचरण, और न ही सत्य।

EnWanting in inclination to both engage in proper action and avoid improper acts, the demoniacal have neither purity nor the right conduct, nor even truthfulness.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 16 शलोक 8

असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्।
अपरस्परसंभूतं किमन्यत्कामहैतुकम्॥8॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 16 शलोक 8 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiउनके अनुसार यह संसार असत्य और प्रतिष्ठा हीन है (अर्थात इस संसार में कोई दिखाई देने वाले से बढकर सत्य नहीं है और न ही इसका कोई मूल स्थान है) , न ही उनके अनुसार इस संसार में कोई ईश्वर हैं, केवल परस्पर (स्त्रि पुरुष के) संयोग से ही यह संसार उत्पन्न हुआ है, केवल काम भाव ही इस संसार का कारण है।

EnSince the world, they say, is unreal, without shelter and God, and created by itself through mutual (male-female) intercourse, what else is it for except physical indulgence?
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 16 शलोक 9

एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः।
प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः॥9॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 16 शलोक 9 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiइस दृष्टि से इस संसार को देखते, ऐसे अल्प बुद्धि मनुष्य अपना नाश कर बैठते हैं और उग्र कर्मों में प्रवृत्त होकर इस संसार के अहित के लिये ही प्रयत्न करते हैं।

EnDepraved and dim-witted because they hold such a view, these malicious and cruel people are born only to ravage the world.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 16 शलोक 10

काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः।
मोहाद्‌गृहीत्वासद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः॥10॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 16 शलोक 10 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiदुर्लभ (असंभव) इच्छाओं का आश्रय लिये, दम्भ (घमन्ड) मान और अपने ही मद में चुर हुये, मोहवश (अज्ञान वश) असद आग्रहों को पकड कर अपवित्र (अशुचि) व्रतों में जुटते हैं।

EnPossessed of arrogance, conceit and wantonness, and immersed in insatiable lust, they subscribe to false doctrines out of ignorance and act wickedly.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 16 शलोक 11

चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः।
कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः॥11॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 16 शलोक 11 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiमृत्यु तक समाप्त न होने वालीं अपार चिन्ताओं से घिरे, वे काम उपभोग को ही परम मानते हैं।

EnBeset by countless anxieties that stretch right up to death and absorbed in the enjoyment of sensual objects, they are firmly convinced that satisfaction of carnal desires is the highest goal.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 16 शलोक 12

आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः।
ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसञ्चयान्॥12॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 16 शलोक 12 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiसैंकडों आशाओं के जाल में बंधे, इच्छाओं और क्रोध में डूबे, वे अपनी इच्छाओं और भोगों के लिये अन्याय से कमाये धन के संचय में लगते हैं।

EnChained by hundreds of bonds of illusory hopes, and at the mercy of desire and anger, they wrongfully endeavour to store wealth for the satisfaction of their lust.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 16 शलोक 13

इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम्।
इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम्॥13॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 16 शलोक 13 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hi‘इसे तो हमने आज प्राप्त कर लिया है, अन्य मनोरथ को भी हम प्राप्त कर लेंगें। इतना हमारे पास है, उस धन भी भविष्य में हमारा हो जायेगा’।

EnTheir perpetual thought is: I have gained this today and Ishall have that wish; I have these riches and I shall have more in the future.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 16 शलोक 14

असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि।
ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी॥14॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 16 शलोक 14 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hi‘इस शत्रु तो हमारे द्वारा मर चुका है, दूसरों को भी हम मार डालेंगें। मैं ईश्वर हूँ (मालिक हूँ), मैं सुख सम्रद्धि का भोगी हूँ, सिद्ध हुँ, बलवान हुँ, सुखी हुँ ‘।

EnI have slain that enemy and l shall also slay other enemies; I am God and the holder of sovereignty.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 16 शलोक 15

आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया।
यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः॥15॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 16 शलोक 15 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hi‘मेरे समान दूसरा कौन है। हम यज्ञ करेंगें, दान देंगें और मजा उठायेंगें ‘ – इस प्रकार वे अज्ञान से विमोहित होते हैं।

EnThus deluded by ignorance they think: I am wealthy and noble-born. Who can equal me? I shall perform yagya, give alms, and lead a life of bliss.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 16 शलोक 16

अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः।
प्रसक्ताः कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ॥16॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 16 शलोक 16 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiउनका चित्त अनेकों दिशाओं में दौडता हुआ, अज्ञान के जाल से ढका रहता है। इच्छाओं और भोगों से आसक्त चित्त, वे अपवित्र नरक में गिरते जाते हैं।

EnMisled in many a way, entangled in the webs of attachment, and inordinately fond of sensual pleasure, they fall into the most defiled hell.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 16 शलोक 17

आत्मसंभाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः।
यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम्॥17॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 16 शलोक 17 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiअपने ही घमन्ड में डूबे, सवयं से सुध बुध खोये, धन और मान से चिपके, वे केवन ऊपर ऊपर से ही (नाम के लिये ही) दम्भ और घमन्ड में डूबे अविधि पूर्ण ढंग से यज्ञ करते हैं।

EnThese conceited persons, intoxicated by vanity and wealth, offer ostentatious sacrifices which are yagya only in name, in violation of scriptural injunction.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 16 शलोक 18

अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः।
मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः॥18॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 16 शलोक 18 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiअहंकार, बल, घमन्ड, काम और क्रोध में डूबे वे सवयं की आत्मा और अन्य जीवों में विराजमान मुझ से द्वेष करते हैं और मुझ में दोष ढूँडते हैं।

EnSubservient to vanity, brute force, arrogance, lust and anger, these wicked and degraded persons have a feeling of enmity to me who dwells in them and in all others.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 16 शलोक 19

तानहं द्विषतः क्रुरान्संसारेषु नराधमान्।
क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु॥19॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 16 शलोक 19 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiउन द्वेष करने वाले क्रूर, इस संसार में सबसे नीच मनुष्यों को मैं पुनः पुनः असुरी योनियों में ही फेंकता हुँ।

EnI forever condemn these abhorring, degraded, and cruel persons, the most abject, among mankind, to demoniacal births.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 16 शलोक 20

आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि।
मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम्॥20॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 16 शलोक 20 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiउन आसुरी योनियों को प्राप्त कर, जन्मों ही जन्मों तक वे मूर्ख मुझे प्राप्त न कर, हे कौन्तेय, फिर और नीच गतियों को (योनियों अथवा नरकों) को प्राप्त करते हैं।

EnInstead of realizing me, O son of Kunti, these ignorant fools, conceived in devilish wombs birth after birth, are doomed to fall yet lower to the most degraded state.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 16 शलोक 21

श्री भगवान बोले (THE LORD SAID):

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्॥21॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 16 शलोक 21 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiनरक के तीन द्वार हैं जो आत्मा का नाश करते हैं – काम (इच्छा), क्रोध, तथा लोभ। इसलिये, इन तीनों का ही त्याग कर देना चाहिये।

EnSince lust, anger, and greed are the three gateways to hell because they are destructive of the Self, they ought to be forsaken.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 16 शलोक 22

एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः।
आचरत्यात्मनः श्रेयस्ततो याति परां गतिम्॥22॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 16 शलोक 22 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiइन तीनों अज्ञान के द्वारों से विमुक्त होकर मनुष्य अपने श्रेय (भले) के लिये आचरण करता है, और फिर परम गति को प्राप्त होता है।

EnThe person, O son of Kunti, who escapes these three doors to hell, practises what is propitious for them and thus attains to the supreme State.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 16 शलोक 23

यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः।
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्॥23॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 16 शलोक 23 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiजो शास्त्र में बताये मार्ग को छोड कर, अपनी इच्छा अनुसार आचरण करता है, न वह सिद्धि प्राप्त करता है, न सुख और न ही परम गति।

EnThe one who transgresses scriptural injunction and acts indiscriminately according to his will achieves neither perfection nor the Supreme Goal, nor even happiness.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 16 शलोक 24

तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि॥24॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 16 शलोक 24 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiइसलिये तुम्हारे लिये शास्त्र प्रमाण रूप है (शास्त्र को प्रमाण मानकर) जिससे तुम जान सकते हो की क्या करने योग्य है और क्या नहीं करने योग्य है। शास्त्र द्वारा मार्ग को जान कर हि तुम्हें उसके अनुसार कर्म करना चाहिये।

EnSo scripture is the authority on what ought and ought not to be done, and having learnt that you have the ability to act according to the provisions laid down by the scripture.
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