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सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता – अध्याय 9 शलोक 1 से 25

सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता – अध्याय 9 शलोक 1 से 25

सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 9 शलोक 1

श्रीभगवानुवाच (THE LORD SAID):

इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे।
ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्॥1॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 9 शलोक 1 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiमैं तुम्हे इस परम रहस्य के बारे में बताता हूँ क्योंकि तुममें इसके प्रति कोई वैर वहीं है। इसे ज्ञान और अनुभव सहित जान लेने पर तुम अशुभ से मुक्ति पा लोगे।

EnI shall instruct you well with analogy in this mysterious knowledge, O the sinless, after knowing which you will be liberated from this sorrowful world.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 9 शलोक 2

राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम्।
प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम्॥2॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 9 शलोक 2 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiयह विद्या सबसे श्रेष्ठ है, सबसे श्रेष्ठ रहस्य है, उत्तम से भी उत्तम और पवित्र है, सामने ही दिखने वाली है (टेढी नहीं है), न्याय और अच्छाई से भरी है, अव्यय है और आसानी से इसका पालन किया जा सकता है।

EnThis (knowledge) is the monarch of all learning as well as of all mysteries, most sacred, doubtlessly propitious, easy to practise, and indestructible.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 9 शलोक 3

अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप।
अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि॥3॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 9 शलोक 3 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiहे परन्तप, इस धर्म में जिन पुरुषों की श्रद्धा नहीं होती, वे मुझे प्राप्त न कर, बार बार इस मृत्यु संसार में जन्म लेते हैं।

EnMen who have no faith in this knowledge, O Parantap, do not attain to me and are doomed to roaming about the mortal world.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 9 शलोक 4

मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना।
मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः॥4॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 9 शलोक 4 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiमैं इस संपूर्ण जगत में अव्यक्त (जो दिखाई न दे) मूर्ति रुप से विराजित हूँ। सभी जीव मुझ में ही स्थित हैं, मैं उन में नहीं।

EnThe whole world is pervaded by me, the unmanifest Supreme Being, and all beings dwell within my will but I am not in them.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 9 शलोक 5

न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम्।
भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः॥5॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 9 शलोक 5 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiलेकिन फिर भी ये जीव मुझ में स्थित नहीं हैं। देखो मेरे योग ऍश्वर्य को, इन जीवों में स्थित न होते हुये भी मैं इन जीवों का पालन हार, और उत्पत्ति कर्ता हूँ।

EnAnd even all beings are not within me, and such is the power of my yog-maya that my Spirit, the creator and preserver of all beings, is not within them.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 9 शलोक 6

यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान्।
तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय॥6॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 9 शलोक 6 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiजैसे सदा हर ओर फैले हुये आकाश में वायु चलती रहती है, उसी प्रकार सभी जीव मुझ में स्थित हैं।

EnBe it known to you that all beings dwell in me just as the great wind that roams everywhere always dwells in the sky.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 9 शलोक 7

श्रीभगवानुवाच (THE LORD SAID):

सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम्।
कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम्॥7॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 9 शलोक 7 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiहे कौन्तेय, सभी जीव कल्प का अन्त हो जाने पर (1000 युगों के अन्त पर) मेरी ही प्रकृति में समा जाते हैं और फिर कल्प के आरम्भ पर मैं उनकी दोबारा रचना करता हूँ।

EnAll beings, O son of Kunti, attain to my nature and merge into it at the end of a cycle (kalp) and I recreate them at the beginning of another cycle.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 9 शलोक 8

प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः।
भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात्॥8॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 9 शलोक 8 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiइस प्रकार प्रकृति को अपने वश में कर, पुनः पुनः इस संपूर्ण जीव समूह की मैं रचना करता हूँ जो इस प्रकृति के वश में होने के कारण वशहीन हैं।

EnI repeatedly shape all these beings, who are helplessly dependent on their innate properties, according to their action.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 9 शलोक 9

न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनंजय।
उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु॥9॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 9 शलोक 9 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiयह कर्म मुझे बांधते नहीं हैं, हे धनंजय, क्योंकि मैं इन कर्मैं को करते हुये भी इनसे उदासीन (जिसे कोई खास मतलब न हो) और संग रहित रहता हूँ।

EnUnattached and disinterested in these acts, O Dhananjay, I am not bound by action.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 9 शलोक 10

मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम्।
हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते॥10॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 9 शलोक 10 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiमेरी अध्यक्षता के नीचे यह प्रकृति इन चर और अचर (चलने वाले और न चलने वाले) जीवों को जन्म देती है। इसी से, हे कौन्तेय, इस जगत का परिवर्तन चक्र चलता है।

EnIn association with me, O son of Kunti, my maya shapes this world of the animate and the inanimate , and the world revolves like a wheel of recurrence for the aforesaid reason.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 9 शलोक 11

श्रीभगवानुवाच (THE LORD SAID):

अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्।
परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्॥11॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 9 शलोक 11 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiइस मानुषी तन का आश्रय लेने पर (मानव रुप अवतार लेने पर), जो मूर्ख हैं वे मुझे नहीं पहचानते। मेरे परम भाव को न जानते कि मैं इन सभी भूतों का (संसार और प्राणीयों का) महान् ईश्वर हूँ।

EnThe deluded who do not know my ultimate being regard me in the human form as but an inferior mortal.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 9 शलोक 12

मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः।
राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः॥12॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 9 शलोक 12 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiव्यर्थ आशाओं में बँधे, व्यर्थ कर्मों में लगे, व्यर्थ ज्ञानों से जिनका चित्त हरा जा चुका है, वे विमोहित करने वाली राक्षसी और आसुरी प्रकृति का सहारा लेते हैं।

EnThe ignorant are , like evil spirits, afflicted with the property of darkness and so their hopes and actions and knowledge are all futile.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 9 शलोक 13

महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः।
भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम्॥13॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 9 शलोक 13 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiलेकिन महात्मा लोग, हे पार्थ, दैवी प्रकृति का आश्रय लेकर मुझे ही अव्यय (विकार हीन) और इस संसार का आदि जान कर, अनन्य मन से मुझे भजते हैं।

EnBut, O Parth, they who have found shelter in divine nature and know me as the eternal, imperishable source of all beings, worship me with perfect devotion.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 9 शलोक 14

सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः।
नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते॥14॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 9 शलोक 14 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiऍसे भक्त सदा मेरी प्रशंसा (कीर्ति) करते हुये, मेरे सामने नतमस्तक हो और सदा भक्ति से युक्त हो दृढ व्रत से मेरी उपासने करते हैं।

EnAlways engaged in the recital of my name and virtues, ever-active to realize me, and constantly offering obeisance to me, devotees with a firm determination worship me with undivided faith.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 9 शलोक 15

ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते।
एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम्॥15॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 9 शलोक 15 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiऔर दूसरे कुछ लोग ज्ञान यज्ञ द्वारा मुझे उपासते हैं। अलग अलग रूपों में एक ही देखते हुये, और इन बहुत से रुपों को ईश्वर का विश्वरूप ही देखते हुये।

EnWhile some worship me by gyan-yagya as the allencompassing Supreme Spirit with the feeling that I am all, some worship me with a sense of identity, some with a sense of being separate from me (regarding me as master and themselves as servants), while yet others worship me in many a different fashion.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 9 शलोक 16

श्रीभगवानुवाच (THE LORD SAID):

अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम्।
मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम्॥16॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 9 शलोक 16 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiमैं क्रतु हूँ, मैं ही यज्ञ हूँ, स्वधा मैं हूँ, मैं ही औषधी हूँ। मन्त्र मैं हूँ, मैं ही घी हूँ, मैं अग्नि हूँ और यज्ञ में अर्पित करने का कर्म भी मैं ही हूँ।

EnI am the action that is undertaken, the yagya, the fulfillment of earlier resolutions, the healer, the sacred prayer, the oblation as well as the sacred fire, and I am also the sacrificial act of oblation.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 9 शलोक 17

पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः।
वेद्यं पवित्रमोंकार ऋक्साम यजुरेव च॥17॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 9 शलोक 17 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiमैं इस जगत का पिता हूँ, माता भी, धाता भी और पितामहः (दादा) भी। मैं ही वेद्यं (जिसे जानना चाहिये) हूँ, पवित्र ॐ हूँ, और ऋग, साम, और यजुर भी मैं ही हूँ।

EnAnd I too am the bearer and preserver of the whole world as also the giver of rewards for action; father, mother and also the grandsire; the sacred, imperishable OM who is worthy of being known; and all Ved-Rig, Sam and Yajur.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 9 शलोक 18

गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्।
प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम्॥18॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 9 शलोक 18 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiमैं ही गति (परिणाम) हूँ, भर्ता (भरण पोषण करने वाला) हूँ, प्रभु (स्वामी) हूँ, साक्षी हूँ, निवास स्थान हूँ, शरण देने वाला हूँ और सुहृद (मित्र अथवा भला चाहने वाला) हूँ। मैं ही उत्पत्ति हूँ, प्रलय हूँ, आधार (स्थान) हूँ, कोष हूँ। मैं ही विकारहीन अव्यय बीज हूँ।

EnI am the supreme goal, the sustainer and Lord of all, the maker of good and evil, the abode and shelter of all, the benefactor who wants nothing in return, the beginning and the end, the fountainhead as well as that in whom all beings are dissolved, and also the indestructible primal energy.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 9 शलोक 19

तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च।
अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन॥19॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 9 शलोक 19 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiमैं ही भूमि को (सूर्य रूप से) तपाता हूँ और मैं ही जल को सोक कर वर्षा करता हूँ। मैं अमृत भी हूँ, मृत्यु भी, हे अर्जुन, और मैं ही सत् भी और असत् भी।

EnI am the sun that burns, I draw the clouds and also make them rain, and, O Arjun, I am the drought of immortality as well as death, and I am also both substance and shadow.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 9 शलोक 20

श्रीभगवानुवाच (THE LORD SAID):

त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते।
ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोकमश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान्॥20॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 9 शलोक 20 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiतीन वेदों (ऋग, साम, यजुर) के ज्ञाता, सोम (चन्द्र) रस का पान करने वाले, क्षीण पाप लोग स्वर्ग प्राप्ति की इच्छा से यज्ञों द्वारा मेरा पूजन करते हैं। उन पुण्य कर्मों के फल स्वरूप वे देवताओं के राजा इन्द्र के लोक को प्राप्त कर, देवताओं के दिव्य भोगों का भोग करते हैं।

EnMen who do pious deeds enjoined by the three Ved, who have tasted nectar and freed themselves from sin, and who wish for heavenly existence through worshipping me by yagya, go to heaven (Indrlok) and enjoy godly pleasures as a reward for their virtuous acts.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 9 शलोक 21

ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति।
एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते॥21॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 9 शलोक 21 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiवे उस विशाल स्वर्ग लोक को भोगने के कारण क्षीण पुण्य होने पर फिर से मृत्यु लोक पहुँचते हैं। इस प्रकार कामी (इच्छाओं से भरे) लोग, तीन शीखाओं वाले धर्म (तीन वेदों) का पालन कर, अपनी इच्छाओं को प्राप्त कर बार बार आते जाते हैं।

EnWith the gradual wearing out of the merits of their piety, they go back to the mortal world after enjoying the pleasures of great heaven ; and it is thus that they who seek refuge in the desire-oriented action prescribed by the three Ved and covet joy are condemned to repeated death and birth.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 9 शलोक 22

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥22॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 9 शलोक 22 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiकिसी और का चिन्तन न कर, अनन्य चित्त से जो जन मेरी उपासना करते हैं, उन नित्य अभियुक्त (सदा मेरी भक्ति से युक्त) लोगों को मैं योग और क्षेम (जो नहीं है उसकी प्राप्ति और जो है उसकी रक्षा – लाभ की प्राप्ति और अलाभ से रक्षा) प्रदान करता हूँ।

EnI myself protect the yog of men who abide in me with steady and undeviating faith and who worship me selflessly, constantly remembering me as God.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 9 शलोक 23

येऽप्यन्यदेवताभक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः।
तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम्॥23॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 9 शलोक 23 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiजो (अन्य देवताओं के) भक्त अन्य देवताओं का श्रद्धा से पूजन करते हैं, वे भी, हे कौन्तेय, मेरा ही पूजन करते हैं लेकिन अविधि पूर्ण ढँग से।

EnAlthough even covetous devotees indeed worship me in worshipping other gods, their worship is against the ordained provision and therefore enveloped by ignorance.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 9 शलोक 24

अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च।
न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते॥24॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 9 शलोक 24 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiमैं ही सभी यज्ञों का भोक्ता (भोगने वाला) और प्रभु हूँ। वे मुझे सार तक नहीं जानते, इसी लिये वे गिर पड़ते हैं।

EnThey have to undergo rebirth because they are ignorant of the reality that I am the enjoyer as well as the master of all yagya.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 9 शलोक 25

यान्ति देवव्रता देवान्पितॄन्यान्ति पितृव्रताः।
भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम्॥25॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 9 शलोक 25 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiदेवताओं (के अर्चन) का व्रत रखने वाले देवताओं के पास जाते हैं, पितृ पूजन वाले पितरों को प्राप्त करते हैं, जीवों का पूजन करने वाले जीवों को प्राप्त करते हैं, और मेरी भक्ति करने वाले मुझे ही प्राप्त करते हैं।

EnMen who are devoted to gods attain to gods, worshippers of ancestors attain to their ancestors, worshippers of beings attain to the state of beings, and my worshippers attain to me.

 

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