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सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता – अध्याय 15 शलोक 1 से 20

सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 15 शलोक 1 से 20

सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 15 शलोक 1

श्रीभगवान बोले (THE LORD SAID):

ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्॥1॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 15 शलोक 1 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiअश्वत्थ नाम वृक्ष जिसे अव्यय बताया जाता है, जिसकी जडें ऊपर हैं और शाखायें नीचे हैं, वेद छन्द जिसके पत्ते हैं, जो उसे जानता है वह वेदों का ज्ञाता है।

EnHe who knows the Peepal (Fig) tree that the world is, with its roots above and branches below and which is said to be imperishable, and of which Vedic verses are the foliage, is a knower of the Ved.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 15 शलोक 2

अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः।
अधश्च मूलान्यनुसंततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके॥2॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 15 शलोक 2 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiउस वृक्ष की गुणों और विषयों द्वारा सिंचीं शाखाएं नीचे ऊपर हर ओर फैली हुईं हैं। उसकी जडें भी मनुष्य के कर्मों द्वारा मनुष्य को हर ओर से बाँधे नीचे उपर बढी हुईं हैं।

EnIts branches nourished by the three properties extend high and low, objects of the senses are its shoots, and its action-engendering roots stretch below to the world of men.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 15 शलोक 3

न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च संप्रतिष्ठा।
अश्वत्थमेनं सुविरूढमूल-मसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा॥3॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 15 शलोक 3 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiन इसका वास्तविक रुप दिखता है, न इस का अन्त और न ही इस का आदि और न ही इस का मूल स्थान (जहां यह स्थापित है)। इस अश्वथ नामक वृक्ष की बहुत धृढ शाखाओं को असंग रूपी धृढ शस्त्र से काट कर।

EnSince its form is not to be seen here as such and it has neither an end nor a beginning, nor a secure foundation, this immensely-grown tree should be cut down with the axe of renunciation.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 15 शलोक 4

ततः पदं तत्परिमार्गितव्यंयस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः।
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्येयतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी॥4॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 15 शलोक 4 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiउसके बाद परम पद की खोज करनी चाहिये, जिस मार्ग पर चले जाने के बाद मनुष्य फिर लौट कर नहीं आता। उसी आदि पुरुष की शरण में चले जाना चाहिये जिन से यह पुरातन वृक्ष रूपी संसार उत्पन्न हुआ है।

EnThen that goal should be sought for, after arriving at which one does not have to turn back again, with a sense of total submission to that primal God whence all worldly life is born.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 15 शलोक 5

निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः।
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञैर्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्॥5॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 15 शलोक 5 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiमान और मोह से मुक्त, संग रूपी दोष पर जीत प्राप्त किये, नित्य अध्यात्म में लगे, कामनाओं को शान्त किये, सुख दुख जिसे कहा जाता है उस द्वन्द्व से मुक्त हुये, ऐसे मूर्खता हीन महात्मा जन उस परम अव्यय पद को प्राप्त करते हैं।

EnMen of knowledge who are free from vanity and delusion, victorious against the evil of infatuation, ever-abiding in the Supreme Spirit, totally devoid of desire, and liberated from the contradictions of joy and grief, achieve the eternal goal.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 15 शलोक 6

न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥6॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 15 शलोक 6 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiन उस पद को सूर्य प्रकाशित करता है, न चन्द्र और न ही अग्नि (वह पद इस सभी लक्षणों से परे है), जहां पहुँचने पर वे पुनः वापिस नहीं आते, वही मेरा परम धाम (स्थान) है।

EnThat after reaching which there is no return, and which is illumined by neither the sun nor the moon, nor by fire, is my supreme abode.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 15 शलोक 7

श्रीभगवान बोले (THE LORD SAID):


ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।
मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति॥7॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 15 शलोक 7 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiमेरा ही सनातन अंश इस जीव लोक में जीव रूप धारण कर, मन सहित छे इन्द्रियों (मन और पाँच अन्य इन्द्रियों) को, जो प्रकृति में स्थित हैं, आकर्षित करता है।

EnThe immortal Soul in the body is a part of mine and it is he who attracts the five senses and the sixth-the mindthat dwell in nature.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 15 शलोक 8

शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः।
गृहित्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात्॥8॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 15 शलोक 8 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiजैसे वायु गन्ध को ग्रहण कर एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाता है, उसी प्रकार आत्मा इन इन्द्रियों को ग्रहण कर जिस भी शरीर को प्राप्त करता है वहां ले जाता है।

EnLike the wind carrying a scent from its source, the Soul that is lord of the body also bears along with him the senses and the mind from its previous body and assumes a new one.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 15 शलोक 9

श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च।
अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते॥9॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 15 शलोक 9 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiशरीर में स्थित हो वह सुनने की शक्ति, आँखें, छूना, स्वाद, सूँघने की शक्ति तथा मन द्वारा इन सभी के विषयों का सेवन करता है।

EnGoverning the senses of hearing, sight, touch, taste, smell and also the mind, he (the Soul) experiences objects through them.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 15 शलोक 10

उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम्।
विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः॥10॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 15 शलोक 10 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiशरीर को त्यागते हुये, या उस में स्थित रहते हुये, गुणों को भोगते हुये, जो विमूढ (मूर्ख) हैं वे उसे (आत्मा) को नहीं देख पाते, परन्तु जिनके पास ज्ञान चक्षु (आँखें) हैं, अर्थात जो ज्ञान युक्त हैं, वे उसे देखते हैं।

EnThe ignorant are unaware of the Soul, endowed with the three properties and departing from the body or dwelling in it and enjoying objects; only they who have eyes of wisdom discern him.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 15 शलोक 11

यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम्।
यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः॥11॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 15 शलोक 11 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiसाधना युक्त योगी जन इसे स्वयं में अवस्थित देखते हैं (अर्थात अपनी आत्मा का अनुभव करते हैं), परन्तु साधना करते हुये भी अकृत जन, जिनका चित अभी ज्ञान युक्त नहीं है, वे इसे नहीं देख पाते।

EnYogi know the essence of the Soul dwelling in their heart, but the unknowing who have not purified themselves (of evils) fail to see him even after much endeavour.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 15 शलोक 12

श्रीभगवान बोले (THE LORD SAID):

यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम्।
यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम्॥12॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 15 शलोक 12 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiजो तेज सूर्य से आकर इस संपूर्ण संसार को प्रकाशित कर देता है, और जो तेज चन्द्र औऱ अग्नि में है, उन सभी को तुम मेरा ही जानो।

EnKnow that the radiance of the sun that lights up the world, and of the moon and fire, is my own effulgence.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 15 शलोक 13

गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा।
पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः॥13॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 15 शलोक 13 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiमैं ही सभी प्राणियों में प्रविष्ट होकर उन्हें धारण करता हूँ (उनका पालन पोषण करता हूँ)। मैं ही रसमय चन्द्र बनकर सभी औषधीयाँ (अनाज आदि) उत्पन्न करता हूँ।

EnPermeating the earth, I support all beings with my radical energy and like the ambrosial moon, I provide the sap that nourishes all plants.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 15 शलोक 14

अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः।
प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम्॥14॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 15 शलोक 14 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiमैं ही प्राणियों की देह में स्थित हो प्राण और अपान वायुओं द्वारा चारों प्रकार के खानों को पचाता हूँ।

EnI am the fire, possessed of pran and apan, within the body of all living beings that consumes the four kinds of food.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 15 शलोक 15

सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च।
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्॥15॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 15 शलोक 15 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiमैं सभी प्राणियों के हृदय में स्थित हूँ। मुझ से ही स्मृति, ज्ञान होते है। सभी वेदों द्वारा मैं ही जानने योग्य हूँ। मैं ही वेदों का सार हुँ और मैं ही वेदों का ज्ञाता हुँ।

EnSeated in the heart of all beings, I am their memory and knowledge and also the strength that overcomes all impediments; I am that which is worthy of being apprehended by the Ved; and I verily am the author of the Vedant as well as their knower.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 15 शलोक 16

श्रीभगवान बोले (THE LORD SAID):

द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च।
क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते॥16॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 15 शलोक 16 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiइस संसार में दो प्रकार की पुरुष संज्ञायें हैं – क्षर और अक्षऱ (अर्थात जो नश्वर हैं और जो शाश्वत हैं)। इन दोनो प्रकारों में सभी जीव (देहधारी) क्षर हैं और उन देहों में विराजमान आत्मा को अक्षर कहा जाता है।

EnThere are two kinds of beings in the world, the mortal and the immortal: whereas the bodies of all beings are destructible, their Souls are said to be imperishable.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 15 शलोक 17

उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः।
यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः॥17॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 15 शलोक 17 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiपरन्तु इन से अतिरिक्त एक अन्य उत्तम पुरुष और भी हैं जिन्हें परमात्मा कह कर पुकारा जाता है। वे विकार हीन अव्यय ईश्वर इन तीनो लोकों में प्रविष्ट होकर संपूर्ण संसार का भरण पोषण करते हैं।

EnBut higher than both of them is the one who pervades the three worlds to support and sustain all, and who is named the eternal God and Supreme Spirit (Ishwar).
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 15 शलोक 18

यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः।
अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः॥18॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 15 शलोक 18 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiक्योंकि मैं क्षर (देह धारी जीव) से ऊपर हूँ तथा अक्षर (आत्मा) से भी उत्तम हूँ, इस लिये मुझे इस संसार में पुरुषोत्तम के नाम से जाना जाता है।

EnSince I am supreme by virtue of being beyond both the perishable ( body) and the imperishable (Soul), I am known as the Supreme Being ( Purushottam ) in the world as well as in the Ved.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 15 शलोक 19

यो मामेवमसंमूढो जानाति पुरुषोत्तमम्।
स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत॥19॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 15 शलोक 19 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiजो अन्धकार से परे मनुष्य मुझे पुरुषोत्तम जानता है, वह ही सब कुछ जानता है और संपूर्ण भावना से हर प्रकार मुझे भजता है, हे भारत।

EnThe all-knowing man, who is thus aware of my essence, O Bharat, as the Supreme Being, always worships me with perfect devotion.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 15 शलोक 20

इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ।
एतद्‌बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत॥20॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 15 शलोक 20 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiहे अनघ (पाप हीन अर्जुन), इस प्रकार मैंने तुम्हें इस गुह्य शास्त्र को सुनाया। इसे जान लेने पर मनुष्य बुद्धिमान और कृतकृत्य हो जाता है, हे भारत।

EnI have thus instructed you, O the sinless, in this most subtle of all knowledge because, O Bharat, by knowing its essence a man gains wisdom and accomplishes all his tasks.
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