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सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता – अध्याय 13 शलोक 1 से 34

सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 13 शलोक 1 से 34

सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 13 शलोक 1

श्रीभगवानुवाच (THE LORD SAID):

इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते।
एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः॥1॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 13 शलोक 1 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiइस शरीर को, हे कौन्तेय, क्षेत्र कहा जाता है। और ज्ञानी लोग इस क्षेत्र को जो जानता है उसे क्षेत्रज्ञ कहते हैं।

EnThe Lord said, This body is, O son of Kunti, a battlefield (kshetr) and the men who know it (kshetragya) are called wise because they have grown spiritually dexterous by perceiving its essence.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 13 शलोक 2

क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम॥2॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 13 शलोक 2 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiसभी क्षोत्रों में तुम मुझे ही क्षेत्रज्ञ जानो हे भारत (सभी शरीरों में मैं क्षेत्रज्ञ हूँ)। इस क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का ज्ञान (समझ) ही वास्तव में ज्ञान है, मेरे मत से।

EnAnd be it known to you, O Bharat, that I am the all-knowing Self (kshetragya) in all spheres; and to me awareness of the reality of kshetr and kshetragya, of mutable nature and the Self, is knowledge.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 13 शलोक 3

तत्क्षेत्रं यच्च यादृक्च यद्विकारि यतश्च यत्।
स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे शृणु॥3॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 13 शलोक 3 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiवह क्षेत्र जो है और जैसा है, और उसके जो विकार (बदलाव) हैं, और जिस से वो उत्पन्न हुआ है, और वह क्षेत्रज्ञ जो है, और जो इसका प्रभाव है, वह तुम मुझ से संक्षेप में सुनो।

EnListen to me briefly on the whence and what of that sphere and its variations and properties, as well on the kshetragya and his abilities.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 13 शलोक 4

ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक्।
ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः॥4॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 13 शलोक 4 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiऋषियों ने बहुत से गीतों में और विविध छन्दों में पृथक पृथक रुप से इन का वर्णन किया है। तथा सोच समझ कर संपूर्ण तरह निश्चित कर के ब्रह्म सूत्र के पदों में भी इसे बताया गया है।

EnThis has (also) been said in various distinct ways by sages in different scriptural verses and well-reasoned, definitive aphorisms on the knowledge of the Supreme Spirit (Brahmsutr).
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 13 शलोक 5, 6

महाभूतान्यहंकारो बुद्धिरव्यक्तमेव च।
इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः॥5॥

इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं संघातश्चेतना धृतिः।
एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम्॥6॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 13 शलोक 5, 6  का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiमहाभूत (मूल प्राकृति), अहंकार (मैं का अहसास), बुद्धि, अव्यक्त प्रकृति (गुण), दस इन्द्रियाँ (पाँच इन्द्रियां और मन और कर्म अंग), और पाँचों इन्द्रियों के विषय। इच्छा, द्वेष, सुख, दुख, संघ (देह समूह), चेतना, धृति (स्थिरता) – यह संक्षेप में क्षेत्र और उसके विकार बताये गये हैं

EnSpeaking briefly, mutable physical body is the aggregate of the five elements, ego, intellect, even the unmanifest, the ten sense organs, mind and the five objects of sense, as well as desire, malice, pleasure and pain, and intelligence and fortitude.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 13 शलोक 7

अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम्।
आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः॥7॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 13 शलोक 7 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiअभिमान न होना (स्वयं के मान की इच्छा न रखना), झुठी दिखावट न करना, अहिंसा (जीवों की हिंसा न करना), शान्ति, सरलता, आचार्य की उपासना करना, शुद्धता (शौच), स्थिरता और आत्म संयम।

EnAbsence of pride and arrogant conduct, disinclination to do injury to anyone, forgiveness, integrity of thought and speech, devoted service to the teacher, outward as well as inner purity, moral firmness, restraint of the body along with the mind and senses,…
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 13 शलोक 8

इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहंकार एव च।
जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्॥8॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 13 शलोक 8 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiइन्द्रियों के विषयों के प्रति वैराग्य (इच्छा शून्यता), अहंकार का अभाव, जन्म मृत्यु जरा (बुढापे) और बिमारी (व्याधि) के रुप में जो दुख दोष है उसे ध्यान में रखना (अर्थात इन से मुक्त होने का प्रयत्न करना)।

EnDisinterest in pleasures of both the world and heaven, absence of ego, constant reflection over the maladies of birth, death, old age, sickness, and pain,…
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 13 शलोक 9

असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु।
नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु॥9॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 13 शलोक 9 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiआसक्ति से मुक्त रहना (संग रहित रहना), पुत्र, पत्नी और गृह आदि को स्वयं से जुड़ा न देखना (ऐकात्मता का भाव न होना), इष्ट (प्रिय) और अनिष्ट (अप्रिय) का प्राप्ति में चित्त का सदा एक सा रहना।

EnDetachment from son, wife, home and the like, freedom from infatuation, bearing with both the pleasant and the unpleasant with equanimity,…
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 13 शलोक 10

मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी।
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि॥10॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 13 शलोक 10 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiमुझ में अनन्य अव्यभिचारिणी (स्थिर) भक्ति होना, एकान्त स्थान पर रहने का स्वभाव होना, और लोगों से घिरे होने को पसंद न करना।

EnUnswerving devotion to me with a single-minded concern for yog, fondness of living in sequestered places, distaste for human society,…
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 13 शलोक 11

अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम्।
एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा॥11॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 13 शलोक 11 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiसदा अध्यात्म ज्ञान में लगे रहना, तत्त्व (सार) का ज्ञान होना, और अपनी भलाई (अर्थ अर्थात भगवात् प्राप्ति जिसे परमार्थ – परम अर्थ कहा जाता है) को देखना, इस सब को ज्ञान कहा गया है, और बाकी सब अज्ञान है।

EnConstantly resting in the awareness that is called adhyatm and perception of the Supreme Spirit who is the end of realization of truth are all knowledge and whatever is contrary to them is ignorance.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 13 शलोक 12

ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते।
अनादि मत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते॥12॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 13 शलोक 12 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiजो ज्ञेय है (जिसका ज्ञान प्राप्त करना चाहिये), मैं उसका वर्णन करता हूँ, जिसे जान कर मनुष्य अमरता को प्राप्त होता है। वह (ज्ञेय) अनादि है (उसका कोई जन्म नहीं है), परम ब्रह्म है। न उसे सत कहा जाता है, न असत् कहा जाता है (वह इन संज्ञाओं से परे है)।

EnI shall discourse (to you) well upon the God without a beginning or end, who is worthy of being known and after knowing whom the stuff of immortality is gained and who is said to be neither a being nor a non-being|
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 13 शलोक 13

सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्।
सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति॥13॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 13 शलोक 13 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiहर ओर हर जगह उसके हाथ और पैर हैं, हर ओर हर जगह उसके आँखें और सिर तथा मुख हैं, हर जगह उसके कान हैं। वह इस संपूर्ण संसार को ढक कर (हर जगह व्याप्त हो) विराजमान है।

EnHe has hands and feet, eyes, heads, mouths, and ears on all sides, because he exists pervading all in the world.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 13 शलोक 14

सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्।
असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च॥14॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 13 शलोक 14 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiवह सभी इन्द्रियों से वर्जित होते हुये सभी इन्द्रियों और गुणों को आभास करता है। वह असक्त होते हुये भी सभी का भरण पोषण करता है। निर्गुण होते हुये भी सभी गुणों को भोक्ता है।

EnKnowing the objects of all senses he is yet without senses; unattached to and beyond the properties of nature he is yet the sustainer of all; and he is also the one into whom all the properties merge.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 13 शलोक 15

बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च।
सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत्॥15॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 13 शलोक 15 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiवह सभी चर और अचर प्राणियों के बाहर भी है और अन्दर भी। सूक्षम होने के कारण उसे देखा नहीं जा सकता। वह दुर भी स्थित है और पास भी।

EnExisting in all animate and inanimate beings, he is both animate and inanimate; he is also unmanifest because he is so subtle, and both distant and close.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 13 शलोक 16

अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम्।
भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च॥16॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 13 शलोक 16 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiसभी भूतों (प्राणियों) में एक ही होते हुये भी (अविभक्त होते हुये भी) विभक्त सा स्थित है। वहीं सभी प्राणियों का पालन पोषण करने वाला है, वहीं ज्ञेयं (जिसे जाना जाना चाहिये) है, ग्रसिष्णु है, प्रभविष्णु है।

EnThe Supreme Spirit who is worth knowing, and who appears to be different in different beings although he is one and undivided, is the begetter, sustainer, and destroyer of all beings.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 13 शलोक 17

ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते।
ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम्॥17॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 13 शलोक 17 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiसभी ज्योतियों की वही ज्योति है। उसे तमसः (अन्धकार) से परे (परम) कहा जाता है। वही ज्ञान है, वहीं ज्ञेय है, ज्ञान द्वारा उसे प्राप्त किया जाता है। वही सब के हृदयों में विराजमान है।

EnThe light among lights and said to be beyond darkness, that God, the embodiment of knowledge, worthy of being known, and attainable only through knowledge, dwells in the hearts of all.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 13 शलोक 18

इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः।
मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते॥18॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 13 शलोक 18 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiइस प्रकार तुम्हें संक्षेप में क्षेत्र (यह शरीर आदि), ज्ञान और ज्ञेय (भगवान) का वर्णन किया है। मेरा भक्त इन को समझ जाने पर मेरे स्वरुप को प्राप्त होता है।

EnKnowing the truth of what has been briefly said of kshetr, knowledge, and of God, who ought to be known, my devotee attains to my state.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 13 शलोक 19

श्रीभगवानुवाच (THE LORD SAID):

प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि।
विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसंभवान्॥19॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 13 शलोक 19 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiतुम प्रकृति और पुरुष दोनो की ही अनादि (जन्म रहित) जानो। और विकारों और गुणों को तुम प्रकृति से उत्पन्न हुआ जानो।

EnBe it known to you that both nature and Soul are without beginning and end, and also that maladies such as attachment, revulsion, and all the objects that are possessed of the three properties are born from nature.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 13 शलोक 20

कार्यकरणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते।
पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते॥20॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 13 शलोक 20 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiकार्य के साधन और कर्ता होने की भावना में प्रकृति को कारण बताया जाता है। और सुख दुख के भोक्ता होने में पुरुष को उसका कारण कहा जाता है।

EnWhereas nature is said to be the begetter of deed and doer, the Soul is said to be begetter of the experience of pleasure and pain.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 13 शलोक 21

पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्‌क्ते प्रकृतिजान्गुणान्।
कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु॥21॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 13 शलोक 21 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiयह पुरुष (आत्मा) प्रकृति में स्थित हो कर प्रकृति से ही उत्पन्न हुये गुणों को भोक्ता है। इन गुणों से संग (जुडा होना) ही पुरुष का सद और असद योनियों में जन्म का कारण है।

EnThe nature-based Soul experiences nature-born objects which are characterized by the three properties and it is association with these properties that is the cause of his birth in higher or lower forms.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 13 शलोक 22

उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः।
परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः॥22॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 13 शलोक 22 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiयह पुरुष (जीव आत्मा) इस देह में स्थित होकर देह के साथ संग करता है इसलिये इसे उपद्रष्टा कहा जाता है, अनुमति देता है इसलिये इसे अनुमन्ता कहा जा सकता है, स्वयं को देह का पालन पोषण करने वाला समझने के कारण इसे भर्ता कहा जा सकता है, और देह को भोगने के कारण भोक्ता कहा जा सकता है, स्वयं को देह का स्वामि समझने के कारण महेष्वर कहा जा सकता है। लेकिन स्वरूप से यह परमात्मा तत्व ही है अर्थात इस का देह से कोई संबंध नहीं।

EnAlthough residing in the body, the Soul is transcendental and said to be the witness, the granter, the enjoyer, and the great God and Supreme Spirit.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 13 शलोक 23

य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह।
सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते॥23॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 13 शलोक 23 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiजो इस प्रकार पुरुष और प्रकृति तथा प्रकृति में स्थित गुणों के भेद को जानता है, वह मनुष्य सदा वर्तता हुआ भी दोबारा फिर मोहित नहीं होता।

EnIn whatever manner he conducts himself, the man who knows the truth of the Soul and nature with its three properties is never born again.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 13 शलोक 24

ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना।
अन्ये सांख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे॥24॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 13 शलोक 24 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiकोई ध्यान द्वारा अपने ही आत्मन से अपनी आत्मा को देखते हैं, अन्य सांख्य ज्ञान द्वारा अपनी आत्मा का ज्ञान प्राप्त करते हैं, तथा अन्य कई कर्म योग द्वारा।

EnWhile some perceive the Supreme Spirit in their heart by contemplation with their refined mind, some others know him by the yog of knowledge, and yet others by the yog of action.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 13 शलोक 25

अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वान्येभ्य उपासते।
तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः॥25॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 13 शलोक 25 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiलेकिन दूसरे कई इसे न जानते हुये भी जैसा सुना है उस पर विश्वास कर, बताये हुये की उपासना करते हैं। वे श्रुति परायण (सुने हुये पर विश्वास करते और उसका सहारा लेते) लोग भी इस मृत्यु संसार को पार कर जाते हैं।

EnBut ignorant of these ways, there are yet others who worship by just learning the truth from accomplished sages and, relying upon what they hear, they also doubtlessly steer across the gulf of the mortal world.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 13 शलोक 26

यावत्संजायते किंचित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम्।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ॥26॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 13 शलोक 26 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiहे भरतर्षभ, जो भी स्थावर यां चलने-फिरने वाले जीव उत्पन्न होते हैं, तुम उन्हें इस क्षेत्र (शरीर तथा उसके विकार आदि) और क्षेत्रज्ञ (आत्मा) के संयोग से ही उत्पन्न हुआ समझो।

EnRemember, O the best of Bharat, that whatever animate or inanimate being exists is born from the coming together of the insentient kshetr and the sentient kshetragya,
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 13 शलोक 27

समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्।
विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति॥27॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 13 शलोक 27 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiपरमात्मा सभी जीवों में एक से स्थित हैं। विनाश को प्राप्त होते इन जीवों में जो अविनाशी उन परमात्मा को देखता है, वही वास्तव में देखता है।

EnHe alone knows the truth who steadily sees the imperishable God in all animate and inanimate beings that are destructible.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 13 शलोक 28

समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम्।
न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम्॥28॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 13 शलोक 28 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiहर जगह इश्वर को एक सा अवस्थित देखता हुआ जो मनुष्य सर्वत्र समता से देखता है, वह अपने ही आत्मन द्वारा अपनी हिंसा नहीं करता, इसलिये वह परम पति को प्राप्त करता है।

EnHe achieves the supreme goal because, evenly perceiving the existence of the identical God in all beings, he does not himself degrade his Self.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 13 शलोक 29

प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः।
यः पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यति॥29॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 13 शलोक 29 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiजो प्रकृति को ही हर प्रकार से सभी कर्म करते हुये देखता है, और स्वयं को अकर्ता (कर्म न करने वाला) जानता है, वही वास्तव में सत्य देखता है।

EnAnd that man knows the truth who regards all action as performed by nature and his own Soul as a non-doer.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 13 शलोक 30

यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति।
तत एव च विस्तारं ब्रह्म संपद्यते तदा॥30॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 13 शलोक 30 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiजब वह इन सभी जीवों के विविध भावों को एक ही जगह स्थित देखता है (प्रकृति में) और उसी एक कारण से यह सारा विस्तार देखता है, तब वह ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है।

EnHe realizes God when he sees the whole variety of beings as resting upon and as an extension of the will of that one Supreme Spirit.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 13 शलोक 31

अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः।
शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते॥31॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 13 शलोक 31 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiहे कौन्तेय, जीवात्मा अनादि और निर्गुण होने के कारण विकारहीन (अव्यय) परमात्मा तत्व ही है। यह शरीर में स्थित होते हुये भी न कुछ करती है और न ही लिपती है।

EnAlthough embodied, the imperishable Supreme Spirit is neither a doer nor tainted because, O son of Kunti, he is without beginning or end and transcending all properties.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 13 शलोक 32

यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते।
सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते॥32॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 13 शलोक 32 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiजैसे हर जगह फैला आकाश सूक्षम होने के कारण लिपता नहीं है उसी प्रकार हर जगह अवस्थित आत्मा भी देह से लिपती नहीं है।

EnAs the all-extensive sky is unsullied because of its subtlety, even so the embodied Soul is neither a doer nor tainted because he is beyond all the properties.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 13 शलोक 33

यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः।
क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत॥33॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 13 शलोक 33 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiजैसे एक ही सूर्य इस संपूर्ण संसार को प्रकाशित कर देता है, उसी प्रकार हे भारत, क्षेत्री (आत्मा) भी क्षेत्र को प्रकाशित कर देती है।

EnThe Soul illuminates the whole kshetr just as the one sun lights up the entire world.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 13 शलोक 34

क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा।
भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम्॥34॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 13 शलोक 34 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiइस पर्कार जो क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के बीच में ज्ञान दृष्टि से भेद देखते हैं और उन को अलग अलग जानते हैं, वे इस प्रकृति से विमुक्त हो परम गति को प्राप्त करते हैं।

EnThey who have thus perceived the distinction between kshetr and kshetragya, and the way of liberation from the maladies of nature, with the eye of wisdom attain to the Supreme Spirit.
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