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सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता – अध्याय 17 शलोक 1 से 28

सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 17 शलोक 1 से 28

सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 17 शलोक 1

अर्जुन बोले (Arjun Said):

ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः।
तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः॥1॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 17 शलोक 1 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiहे कृष्ण। जो लोग शास्त्र में बताई विधि की चिंता न कर, अपनी श्रद्धा अनुसार यजन (यज्ञ) करते हैं, उन की निष्ठा कैसी ही – सातविक, राजसिक अथवा तामसिक।

EnWhat, O Krishn, is the property-sattwa, rajas, or tamas of persons who albeit worship with faith but in disregard of the scriptural ordinance ?
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 17 शलोक 2

श्री भगवान बोले (THE LORD SAID):

त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा।
सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृणु॥2॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 17 शलोक 2 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiहे अर्जुन। देहधारियों की श्रद्धा उनके स्वभाव के अनुसार तीन प्रकार की होती है – सात्त्विक, राजसिक और तामसिक। इस बारे में मुझ से सुनो।

EnListen to me on how the faith arising from people’s innate nature, too, is of three kinds, virtuous, impassioned, and blind.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 17 शलोक 3

सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत।
श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः॥3॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 17 शलोक 3 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiहे भारत, सब की श्रद्धा उन के अन्तःकरण के अनुसार ही होती है। जिस पुरुष की जैसी श्रद्धा होती है, वैसा ही वह स्वयं भी होता है।

EnSince the faith of all people, O Bharat, is according to their inherent propensity and man is reverent, he is what his faith is.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 17 शलोक 4

यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः।
प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः॥4॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 17 शलोक 4 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiसातविक जन देवताओं को यजते हैं। राजसिक लोग यक्ष औऱ राक्षसों का अनुसरण करते हैं। तथा तामसिक लोग भूत प्रेतों की यजना करते हैं।

EnWhile the virtuous worship gods and the impassioned and morally blind worship yaksh and demons, they who are blinded by ignorance worship ghosts and naturespirits.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 17 शलोक 5, 6

अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः।
दम्भाहंकारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः॥5॥

कर्षयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः।
मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान्॥6॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 17 शलोक 5, 6 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiजो लोग शास्त्रों में नहीं बताये घोर तप करते हैं, ऐसे दम्भ, अहंकार, काम, राग औऱ बल से चूर अज्ञानी (बुद्धि हीन) मनुष्य इस शरीर में स्थित पाँचों तत्वों को कर्षित करते हैं, साथ में मुझे भी जो उन के शरीर में स्थित हुँ। ऐसे मनुष्यों को तुम आसुरी निश्चय (असुर वृ्त्ति) वाले जानो।

EnMark you that they who undergo terrible self-mortification without scriptural sanction and are afflicted with hypocrisy and arrogance besides lust, attachment, and vanity of power, and who wear out not only the elements that form their bodies but also me who dwells in their Souls, are ignorant men with evil disposition.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 17 शलोक 7

श्री भगवान बोले (THE LORD SAID):

आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः।
यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं शृणु॥7॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 17 शलोक 7 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiप्राणियों को जो आहार प्रिय होता है वह भी तीन प्रकार का होता है। वैसे ही यज्ञ, तप तथा दानसभी – ये सभी भी तीन प्रकार के होते हैं। इन का भेद तुम मुझ से सुनो।

EnListen to me (as I tell you) the distinction between the three kinds of yagya, penance, and alms, that are like the three kinds of food relished according to individual taste.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 17 शलोक 8

आयुःसत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः।
रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः॥8॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 17 शलोक 8 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiजो आहार आयु बढाने वाला, बल तथा तेज में वृद्धि करने वाला, आरोग्य प्रदान करने वाला, सुख तथा प्रीति बढाने वाला, रसमयी, स्निग्ध (कोमल आदि), हृदय की स्थिरता बढाने वाला होता है – ऐसा आहार सातविक लोगों को प्रिय होता है।

EnFood that is naturally pleasing and conducive to life, intellect, strength, sound health, happiness, and satisfaction besides being savoury, tender, and durable is loved by the virtuous.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 17 शलोक 9

कट्‌वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः।
आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः॥9॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 17 शलोक 9 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiकटु (कडवा), खट्टा, ज्यादा नमकीन, अति तीक्षण (तीखा), रूखा या कष्ट देने वाला – ऐसा आहार जो दुख, शोक और राग उत्पन्न करने वाला है वह राजसिक मनुष्यों को भाता है।

EnBitter, sour, salty, too hot, pungent, rough, and acidic food that gives rise to sorrow, worries, and illness, is preferred by the passionate.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 17 शलोक 10

यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत्।
उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम्॥10॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 17 शलोक 10 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiजो आहार आधा पका हो, रस रहित हो गया हो, बासा, दुर्गन्धित, गन्दा या अपवित्र हो – वैसा तामसिक जनों को प्रिय लगता है।

EnFood that is half-cooked, unsavoury, odorous, stale, leftover, and defiled is liked by men with a dull sensibility.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 17 शलोक 11

अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते।
यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः॥11॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 17 शलोक 11 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiजो यज्ञ फल की कामना किये बिना, यज्ञ विधि अनुसार किया जाये, यज्ञ करना कर्तव्य है – मन में यह बिठा कर किया जाये वह सात्त्विक है।

EnYagya that has scriptural sanction and the performance of which is an obligation, is fitting and auspicious when it is practised by persons with intent minds who aspire to no reward.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 17 शलोक 12

अभिसंधाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत्।
इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम्॥12॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 17 शलोक 12 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiजो यज्ञ फल की कामना से, और दम्भ (दिखावे आदि) के लिये किया जाये, हे भारत श्रेष्ठ, ऐसे यज्ञ को तुम राजसिक जानो।

EnAnd, O the unequalled among Bharat, be it known to you that the yagya which is embarked upon for mere ostentation, or even with a view to some reward, is contaminated by passion and moral blindness.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 17 शलोक 13

विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम्।
श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते॥13॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 17 शलोक 13 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiजो यज्ञ विधि हीन ढंग से किया जाये, अन्न दान रहित हो, मन्त्रहीन हो, जिसमें कोई दक्षिणा न हो, श्रद्धा रहित हो – ऐसे यज्ञ को तामसिक यज्ञ कहा जाता है।

EnDevoid of scriptural sanction and powerless to invoke the Supreme Spirit as well as to restrain the mind, the yagya that is engaged in without a sense of total sacrifice and faith is said to be demoniacal
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 17 शलोक 14

देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम्।
ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते॥14॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 17 शलोक 14 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiदेवताओं, ब्राह्मण, गुरु और बुद्धिमान ज्ञानी लोगों की पूजा, शौच (सफाई, पवित्रता), सरलता, ब्रह्मचार्य, अहिंसा – यह सब शरीर की तपस्या बताये जाते हैं।

EnAdoration of God, the twice-born, the teacher-preceptor, and of the learned, along with having the qualities of innocence, uprightness, chastity, and disinclination to violence-are said to be penance of the body.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 17 शलोक 15

अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥15॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 17 शलोक 15 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiउद्वेग न पहुँचाने वाले सत्य वाक्य जो सुनने में प्रिय और हितकारी हों – ऐसे वाक्य बोलना, शास्त्रों का स्वध्याय तथा अभ्यास ये वाणी की तपस्या बताये जाते है।

EnAnd utterance that does not agitate but is soothing, propitious, and truthful, and which is but an exercise in the study of Ved, in remembrance of the Supreme Being, and in Self-contemplation, is said to be the penance of speech.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 17 शलोक 16

मनः प्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः।
भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते॥16॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 17 शलोक 16 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiमन में शान्ति (से उत्पन्न हुई प्रसन्नता), सौम्यता, मौन, आत्म संयम, भावों (अन्तःकरण) की शुद्धि – ये सब मन की तपस्या बताये जाते हैं।

EnAffable temperament, tranquillity, silent meditation, selfpossession, inner purity, and the like are said to be penance of the mind.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 17 शलोक 17

श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत्त्रिविधं नरैः।
अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तैः सात्त्विकं परिचक्षते॥17॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 17 शलोक 17 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiमनुष्य जिस श्रद्धा से तपस्य करता है, वह भी तीन प्रकार की है। सातविक तपस्या वह है जो फल की कामना से मुक्त होकर की जाती है।

EnThe threefold types of penance undergone with utmost faith by selfless persons who do not desire any fruit thereof is said to be truly righteous.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 17 शलोक 18

सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत्।
क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम्॥18॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 17 शलोक 18 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiजो तपस्या सत्कार, मान तथा पूजे जाने के लिये की जाती है, या दिखावे अथवा पाखण्ड से की जाती है, ऐसी अस्थिर और अध्रुव (जिस का असतित्व स्थिर न हो) तपस्या को राजसिक कहा जाता है।

EnAnd if undergone with the purpose of gaining homage, honour, and adoration, or for mere display, penance is unsteady and ephemeral, and is said to have the property of rajas.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 17 शलोक 19

मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः।
परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम्॥19॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 17 शलोक 19 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiवह तप जो मूर्ख आग्रह कारण (गलत धारणा के कारण) और स्वयं को पीडा पहुँचाने वाला अथवा दूसरों को कष्ट पहुँचाने हेतु किया जाये, ऐसा तप तामसिक कहा जाता है।

EnThe penance that is undertaken out of mere stupid stubbornness or to hurt others is said to be diabolical.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 17 शलोक 20

दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्॥20॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 17 शलोक 20 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiजो दान यह मान कर दिया जाये की दान देना कर्तव्य है, न कि उपकार करने के लिये, और सही स्थान पर, सही समय पर उचित पात्र (जिसे दान देना चाहिये) को दिया जाये, उस दान को सात्विक दान कहा जाता है।

EnAnd the alms that are given to the right person at the right place and time, and in the spirit that charity is a bounden duty done without any expectation, are said to be good.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 17 शलोक 21

यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः।
दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम्॥21॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 17 शलोक 21 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiजो दान उपकार हेतु, या पुनः फल की कामना से दिया जाये, या कष्ट भरे मन से दिया जाये उसे राजसिक कहा जाता है।

EnAnd alms which are offered grudgingly and for a good turn in exchange, or with some recompense in view, is said to be impulsive and morally improper.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 17 शलोक 22

अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते।
असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम्॥22॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 17 शलोक 22 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiपरन्तु जो दान गलत स्थान पर या गलत समय पर, अनुचित पात्र को दिया जाये, या बिना सत्कार अथवा तिरस्कार के दिया जाये, उसे तामसिक दान कहा जायेगा।

EnAnd the alms which are dispensed without deference or contemptuously to unworthy recipients at an inappropriate place and time are said to be diabolical.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 17 शलोक 23

श्री भगवान बोले (THE LORD SAID):

ॐतत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः।
ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा॥23॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 17 शलोक 23 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiॐ तत सत् – इस प्रकार ब्रह्म का तीन प्रकार का निर्देश कहा गया है। उसी से पुरातन काल में ब्राह्मणों, वेदों और यज्ञों का विधान हुआ है।

EnOm, tat , and sat are three epithets used for the Supreme Being from whom at the outset there came forth the Brahmin, Ved, and yagya.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 17 शलोक 24

तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः।
प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम्॥24॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 17 शलोक 24 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiइसलिये ब्रह्मवादि शास्त्रों में बताई विधि द्वारा सदा ॐ के उच्चारण द्वारा यज्ञ, दान और तप क्रियायें आरम्भ करते हैं।

EnIt is hence that the deeds of yagya, charity, and penance, as ordained by scripture, are always initiated by the devotees of Ved with a resonant utterance of the syllable OM.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 17 शलोक 25

तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतपःक्रियाः।
दानक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभिः॥25॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 17 शलोक 25 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiऔर मोक्ष की कामना करने वाले मनुष्य “तत” कह कर फल की इच्छा त्याग कर यज्ञ, तप औऱ दान क्रियायें करते हैं। (तत अर्थात वह)

EnStripped of desire for any reward and holding that God is all pervading, persons who aspire to the ultimate bliss embark on the tasks of yagya, penance, and charity as ordained by scripture.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 17 शलोक 26

सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते।
प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते॥26॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 17 शलोक 26 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiहे पार्थ, सद-भाव (सत भाव) तथा साधु भाव में सत शब्द का प्रयोग किया जाता है। उसी प्रकार प्रशंसनीय कार्य में भी ‘सत’ शब्द प्रयुक्त होता है।

EnSat is employed to express the ideas of truth and excellence, and, O Parth, the word is also used to denote a propitious act.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 17 शलोक 27

यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते।
कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते॥27॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 17 शलोक 27 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiयज्ञ, तप तथा दान में स्थिर होने को भी सत कहा जाता है। तथा भगवान के लिये ही कर्म करने को भी ‘सत’ कहा जाता है।

EnAnd it is said that the condition inherent in yagya, penance, and charity, as well as the endeavour to attain to God, is also real.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 17 शलोक 28

अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत्।
असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह॥28॥

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय 17 शलोक 28 का हिन्दी और English में अनुवाद
Hiजो भी यज्ञ, दान, तपस्या या कार्य श्रद्धा बिना किया जाये, हे पार्थ उसे ‘असत्’ कहा जाता है, न उस से यहाँ कोई लाभ होता है, और न ही आगे।

EnTherefore, O Parth, is it said that, devoid of faith, the oblation and alms that are offered and the penance that is suffered, as well as all other similar ventures, are all false, for they can do us good neither in this world nor in the next.
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