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शंखचूड़ संहार (भगवान शिव जी की कथाएँ) – शिक्षाप्रद कथा

शंखचूड़ संहार (भगवान शिव जी की कथाएँ) - शिक्षाप्रद कथा

प्रजापति महर्षि कश्यप की कई पत्नियां थीं| उनमें से एक नाम दनु था| दनु की संतान दानव कहलाई| उसी दनु के बड़े पुत्र का नाम दंभ था| दंभ बहुत ही सदाचारी और धार्मिक प्रवृति का था| अन्य दानवों की भांति उनमें न तो ईर्ष्या ही थी और न ही देवताओं से विद्वेष भावना| वह विष्णु का भक्त था और उन्हीं की आराधना किया करता था| लेकिन उसे एक ही चिंता सताती रहती थी कि उसके कोई पुत्र न था| आचार्य शुक्र ने उसे श्री कृष्ण मंत्र की दीक्षा दी| दंभ ने दीक्षा पाकर पुष्कर में महान अनुष्ठान किया| अनुष्ठान सफल हुआ| उसके अनुष्ठान से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु प्रकट होकर बोले – “वत्स! मैं तुम्हारे अनुष्ठान से प्रसन्न हूं| वर मांगो|”

दंभ बोला – “भगवन! यदि आप मेरी तपस्या से प्रसन्न हैं तो मुझे ऐसा पुत्र दें जो आपका भक्त हो और त्रिलोकजयी हो| उसे देवता भी युद्ध में न जीत सकें|”

भगवान विष्णु ने ‘तथास्तु’ कहा और अंतर्धान हो गए और दंभ प्रसन्नचित अपने घर लौट आया|

गोलोक में श्री राधा ने श्री कृष्ण-पार्षद श्रीदामा को असुर होने का शाप दिया था| शाप मिलने पर वही दंभ की पत्नी के गर्भ में आया| जन्म होने के पश्चात दंभ ने अपने उस पुत्र का नाम शंखचूड़ रखा| जब वह कुछ बड़ा हुआ तो दंभ ने उसे मुनि जैगीषिव्य की देख-रेख में रख दिया| मुनि जैगीषिव्य ने उसे शिक्षा दीक्षा दी| अपनी कुमार अवस्था में ही शंखचूड़ पुष्कर में पहुंचा और उस महान धार्मिक तपस्थली में ध्यान मग्न रहकर वर्षों तक ब्रह्मा जी की तपस्या करता रहा| उसकी घोर तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी प्रकट होकर बोले – “वत्स! मैं तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हूं| वर मांगो|”

“पितामह! मुझे ऐसा वरदान दीजिए कि मुझे देवता पराजित न कर सकें|” शंखचूड़ ने कहा|

ब्रह्मा जी ने उसे ऐसा ही वरदान दिया और श्री कृष्ण कवच प्रदान करते हुए उसे आदेश दिया – “शंखचूड़! तुम बद्रिकाश्रम चले जाओ| वहां तुम्हारा भाग्य का सितारा उदय होने की प्रतीक्षा कर रहा है|”

आदेश मानकर शंखचूड़ बद्रिकाक्षम पहुंचा| वहां महाराज धर्मध्वज की पुत्री तुलसी भी तपस्या कर रही थी| दोनों का आपस में परिचय हुआ और ब्रह्मा जी की इच्छानुसार दोनों का विवाह हो गया| अपनी पत्नी को लेकर शंखचूड़, पुनः दैत्यपुरी लौट गया| शुक्राचार्य ने उसे दानवों का अधिपति बना दिया| सिंहासन पर बैठते ही उसने अपना साम्राज्य बढ़ाने के लिए देवलोक पर चढ़ाई कर दी| ब्रह्मा जी के वरदान के कारण वह अजेय हो चुका था, अतः उसे देवों को हराने में कोई कठिनाई नहीं हुई| उसने अमरावती पर कब्जा जमा लिया| इंद्र अमरावती छोड़कर भाग निकले| देवता उसके डर से कंदराओं में जा छुपे|

शंखचूड़ तीनों लोकों का शासक हो गया और सब लोकपालों का कार्य भी उसने संभाल लिया| उसने अपनी प्रजा की भलाई के लिए अनेक कार्य किए| प्रजा उससे बहुत प्रसन्न थी| सर्वत्र सुख और शांति थी| क्योंकि शंखचूड़ स्वयं भी कृष्ण भक्त था| अतः उसकी प्रजा भी भगवान कृष्ण पर पूरी आस्था रखने लगी| उसके राज्य से अधर्म का नाश हो गया| प्रजा इंद्र और देवताओं को भूलने लगी| इससे देवताओं को बहुत क्षोभ हुआ| इंद्र पितामह ब्रह्मा के पास पहुंचकर बोले – “पितामह! आपने शंखचूड़ को अभय होने का वरदान देकर उसे निरंकुश बना दिया है| वह अमरावती पर कब्जा जमाए बैठा है| देवता दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं| हमें बताइए हम क्या करें|”

पितामह बोले – “सुरेंद्र! शंखचूड़ धार्मिक और रीति से अपना शासन चला रहा है| प्रजा उससे प्रसन्न है| उसके राज्य में प्रजा सुखी और संपन्न है, हमें उससे कोई शिकायत नहीं है|”

इंद्र बोलें – “यह सब तो ठीक है पितामह! लेकिन क्या हम यूं ही भटकते रहेंगे| आखिर अमरावती है तो देवताओं का ही|”

पितामह बोले – “अवश्य है| किंतु शंखचूड़ ने तुम्हें युद्ध में पराजित करके उसे प्राप्त किया है| उसने तुम्हारी प्रजा को भी कोई कष्ट नहीं पहुंचाया है| सिर्फ सिंहासनों का ही फेरबदल हुआ है न|”

इंद्र बोला – “लेकिन पितामह! हम आपकी संतानें हैं| क्या आप चाहेंगे कि आपकी संतानें यूं ही दर-बदर भटकती रहें| कुछ उपाय कीजिए पितामह!”

पितामह बोले – “मैं इसमें कुछ नहीं कर सकता देवेंद्र! जब तक शंखचूंड़ के भाग्य में अमरावती का ऐश्वर्य भोगना है, वह भोगेगा ही| तुम भगवान विष्णु के पास चले जाओ| वे अवश्य कोई उपाय तुम्हें सुझा देंगे|”

वहां से निराश होकर इंद्र श्रीविष्णु के पास पहुंचा और उनकी स्तुति करके बोला – “भगवन! देवता इस समय भारी संकट में हैं| ब्रह्मा जी ने अपनी असमर्थता जाहिर करके मुझे आपके पास भेज दिया है| कुछ कीजिए प्रभु! अन्यथा संपूर्ण देव जाति ही नष्ट हो जाएगी|”

विष्णु बोले – “पितामह का कहना ठीक है| मैं भी अकारण शंखचूड़ के संबंधों में हस्तक्षेप करना पसंद नहीं करता| उसकी सारी प्रजा कृष्ण भक्त है और कृष्ण मेरा ही प्रतिरूप है| मैं अपने भक्त पर कष्ट होते नहीं देख सकता| लेकिन निराश होने की आवश्यकता नहीं सुरराज! तुम भगवान शिव के पास चले जाओ और उन्हीं से कोई उपाय पूछो| वे अवश्य तुम्हारे कष्ट का निवारण कर देंगे|”

विष्णु की बात सुनकर इंद्र निराश भाव से बैकुंठ से निकल आया| अंत में वह भगवान शिव के पास कैलाश पर्वत न जाकर शिवलोक पहुंचा और भगवान शिव की स्तुति करके अपने आने का प्रयोजन बताया| भगवान शिव ने उसकी बात सुनी और उसे आश्वस्त किया – “धैर्य रखो सुरराज! तुम्हारा सिंहासन तुम्हें अवश्य प्राप्त होगा| मैं गंधर्वराज चित्ररथ को अभी दूत बनाकर शंखचूड़ के पास रवाना करता हूं|”

शिव के आदेशानुसार गंधर्वराज चित्ररथ शंखचूड़ की राजधानी पहुंचा| उस समय शंखचूड़ अपने सिंहासन पर विराजमान था| चित्ररथ ने उसका अभिवादन करने के पश्चात अपने आने का कारण बताया – “दैत्यराज! मैं गंधर्वराज चित्ररथ हूं और भगवान शिव का एक संदेश लेकर आपके पास आया हूं|”

यह सुनकर शंखचूड़ के चेहरे पर आश्चर्य झलक आया| शिव के दूत को सामने पाकर वह सिंहासन से उठकर बोला – “मेरा अहोभाग्य है कि भगवान शिव ने मुझे किसी योग्य समझा| आप संदेश सुनाइए| क्या संदेश भेजा है भगवान रुद्र ने?”

गंधर्वराज बोला – “दैत्यराज! भगवान शिव का संदेश है कि तुम देवताओं का राज्य उन्हें वापस लौटा दो और उनकी अधिकार उन्हें दे दो| भगवान शिव ने देवों को अभय होने का वचन दिया है|”

शंखचूड़ बोला – “गंधर्वराज! भगवान शिव से मेरा प्रणाम कहना और उनसे कह देना कि शंखचूड़ के हृदय में आपके लिए बहुत ही ज्यादा श्रद्धा है| परंतु यदि उन्होंने इंद्र के बहकावे में आकर मुझे दंडित करने का निश्चय किया तो मैं उनकी बात नहीं मानूंगा और उनसे भी युद्ध करने के लिए तैयार हो जाऊंगा|”

चित्ररथ वापस लौटा और उसने भगवान शंकर को शंखचूड़ का उत्तर सुनाया| यह सुनकर शिव क्रोधित हो गए और अपने गणों को युद्ध का आदेश दे दिया|

उधर शंखचूड़ ने अपने पुत्र का अभिषेक कर उसे दानवाधिपति बना दिया और अपनी पत्नी से बोला – “मैंने युद्ध स्वीकार कर लिया है देवी! ईश्वर करे युद्ध में हमारी विजय हो| अब मुझे अनुमति दो| मेरी सेनाएं तैयार हैं|”

शंखचूड़ अपनी सेनाएं लेकर युद्ध भूमि में जा पहुंचा| दोनों सेनाएं गोमत्रक पर्वत के समीप एक दूसरे के आमने-सामने आ खड़ी हुईं| भगवान शिव ने शंखचूड़ के पास एक बार फिर संदेश भेजा कि वह नादानी न करे और युद्ध से दूर रहकर उनकी बात मान ले| किंतु शंखचूड़ न माना और दोनों सेनाओं में घनघोर युद्ध छिड़ गया| भगवान शिव और शंखचूड़ आमने-सामने डट गए| दोनों में अनेक अस्त्र-शस्त्रों से युद्ध होने लगा| फिर भगवान शिव ने ज्योंही शंखचूड़ का वध करने के लिए त्रिशूल उठाया तो आकाशवाणी हुई – “देवाधिदेव! आप प्रलयंकर हैं| सर्व समर्थ हैं किंतु आपको मर्यादा की रक्षा करनी चाहिए| श्रुति की मर्यादा को नष्ट न करें| जब तक शंखचूड़ के पास हरि का कवच है और जब तक उसकी पतिव्रता पत्नी मौजूद है, तब तक उस पर बुढ़ापा नहीं आ सकता और न ही उसकी मृत्यु हो सकती है|”

आकाशवाणी के खत्म होते ही शिव का त्रिशूल अपने आप रुक गया| तभी भगवान विष्णु प्रकट हुए| शिव बोले – “भगवन! आपने तो मुझे बड़े धर्म संकट में डाल दिया है| आप ही ने तो इंद्र को मेरे पास भेजा और जब मैंने उसे अभय करने के लिए युद्ध आरंभ किया तो अब आप ही का कवच आड़े आ रहा है| अब आप ही कोई उपाय सोचिए|”

विष्णु बोले – “शंखचूड़ के शाप का समय अब समाप्त होने ही वाला है भगवन! अब इसे असुर योनि से मुक्त करके गोलोक भेजना पड़ेगा| यह कृष्ण भक्त है और कृष्ण मेरा ही प्रतिरूप है अतः इसे वापस गोलोक में भेजना होगा|”

फिर विष्णु ने एक ब्राह्मण का वेश धारण किया और शंखचूड़ के पास पहुंचकर बोले – “दानवराज! मैं एक निर्धन ब्राह्मण हूं| कुछ पाने की आस लिए आपके पास आया हूं|”

शंखचूड़ बोला – “मांगो विप्रवर! जो भी मेरे पास है उसे दे देने में मुझे किंचित भी विलंब नहीं लगेगा| मेरा सिर भी मांगोगे तो वह भी दे देने में इंकार नहीं करूंगा| आप आदेश तो दें|”

ब्राह्मण वेशधारी विष्णु बोले – “दैत्यराज! मुझे आपका सिर नहीं आपका कवच चाहिए| बोलिए – देंगे अपना-कवच|”

शंखचूड़ ने अपना कवच उतारकर ब्राह्मण वेशधारी विष्णु को सौंपते हुए कहा – “अवश्य! यदि भगवान कृष्ण की ऐसी ही इच्छा है तो ऐसा ही होगा| आप कवच ले जाइए|”

ब्राह्मण वेशधारी विष्णु कवच लेकर दैत्यपुरी पहुंचे| फिर उन्होंने शंखचूड़ का वेश धारण किया और राजमहल में जाकर शंखचूड़ की पत्नी तुलसी के पास पहुंचे| तुलसी ने उन्हें अपना पति ही समझा और उनका स्वागत किया| उस रात विष्णु शंखचूड़ के महल में ही ठहरे| अचानक ही पतिव्रता तुलसी को धोखे का आभास हुआ| वह चौंककर बिस्तर से उठी| बोली – “कौन है तू और मेरे साथ छल करने का तुझमें साहस कैसे हुआ? जल्दी बोल अन्यथा अपने पतिव्रत तेज से अभी भस्म करती हूं|”

विष्णु अपने वास्तविक रूप में प्रकट हो गए| उन्होंने तुलसी को समझाते हुए कहा – “सुनो तुलसी! तुम्हारे पति का समय पूरा हुआ| एक शाप के कारण ही उसे असुर योनि में आना पड़ा था| अब से वह गोलोक में रहेगा| क्योंकि तुम्हारा पतिव्रत धर्म ही उसकी रक्षा कर रहा था| इसलिए मुझे छल करके तुम्हें कलुषित करना पड़ा|”

तुलसी रोते हुए बोली – “यह आपने अच्छा नहीं किया भगवन! यूं मेरे साथ छल करके मेरा सतीत्व नष्ट किया| मैं शाप देती हूं कि आज से आपको भी पत्थर बन जाना पड़ेगा| आपमें दया ममता नहीं है| आप पत्थर हैं पत्थर|”

विष्णु बोले – “और मैं तुम्हें वर देता हूं तुलसी कि मेरे पत्थर बन जाने पर तुम्हें भी मेरे पास ही स्थान मिलेगा| भविष्य में लोग तुलसी और शालग्राम की पूजा करेंगे| तुलसी के बगैर शालग्राम की पूजा अधूरी रहेगी|”

उसके बाद विष्णु अंतर्धान हो गए और युद्ध भूमि में खड़े शिव को अपनी दिव्य शक्ति से सब कुछ बता दिया| शंखचूड़ और शिव में पुनः युद्ध आरंभ हो गया किंतु तुलसी के पतिव्रत धर्म नष्ट हो जाने से शंखचूड़ की शक्ति घट गई थी| अतः शिव ने अपना त्रिशूल उसकी ओर फेंका तो वह सीधा शंखचूड़ के हृदयस्थल को वेध गया| वातावरण में हजारों बिजलियां एक साथ क्रौंध गईं| चारों दिशाएं कांप उठीं और देखते ही देखते शंखचूंड धरती पर जा गिरा| गिरते ही उसके प्राण पखेरू उड़ गए|

शाप से मुक्ति मिलते ही श्रीदामा गोलोक जा पहुंचा| उसकी भस्म से एक शंख प्रकट हुआ जो कालांतर में भगवान शिव के हाथों की शोभा बना| देवताओं ने शिव की ‘जय-जयकार’ की और इंद्र को अपना सिंहासन पुनः प्राप्त हो गया|

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