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तीसरे फकीर की कहानी (अलिफ लैला) – शिक्षाप्रद कथा

तीसरे फकीर की कहानी (अलिफ लैला) - शिक्षाप्रद कथा

मेरा नाम अजब है और मैं महाऐश्वर्यशाली बादशाह किसब का बेटा हूं| पिता के स्वर्गवास के बाद मैं सिंहासनारूढ़ हुआ और उसी नगर में रहने लगा, जिसे मेरे पिता ने अपने राजधानी बनाया था| मेरी राजधानी समुद्र के किनारे बसी थी| उसकी रक्षा के लिए डेढ़ सौ युद्धपोत तैयार रहते थे| इसके अलावा दूरस्थ व्यापार के लिए पचास जहाज थे और बहुत से दूसरे जहाज भी लंगर डाले रहते थे, ताकि लोग उन पर बैठकर समुद्र में सैर-सपाटा किया करें| मेरे राज्य में कई अन्य नगर और द्वीप भी थे|

एक बार मेरी इच्छा हुई कि मैं अपने राज्य के नगरों और द्वीपों में जाकर वहां के निवासियों को, जो मेरे पिता की मृत्यु से शोकाकुल थे, सांत्वना दूं और उन्हें आदेश दूं कि वे नागरिक कार्यों और व्यापार में तत्परता से लगे रहें| साथ ही मुझे यह शौक हुआ कि मैं जहाज चलाना सीखूं| इस उद्देश्य से मैं एक बड़े जहाज पर सवार होकर चला| मेरे जहाज के साथ दस हजार और चल रहे थे| चालीस दिन तक वायु हमारे अनुकूल रही| किंतु फिर ऐसा तूफान आया कि हम जीवन की आशा खो बैठे| दूसरे दिन आकाश साफ हो गया| हम लोग एक द्वीप पर उतर पड़े| दो दिन आराम करने और जहाज के भंडार भरने के बाद हम फिर चल पड़े| हमें आशा था कि दस दिन में हम अपने देश को वापस पहुंच जाएंगे| किंतु ऐसा न हुआ| कारण यह था कि जहाज एक अन्य तूफान में रास्ते से भटक गया था| हमारे कप्तान ने एक आदमी को मस्तूल पर चढ़ाया कि शायद कहीं जमीन दिखाई दे| उसने बताया कि ‘दाईं तरफ कोई काली-सी वस्तु दुखाई दे रही है| शायद वह भूमि हो| ‘लेकिन यह सुनकर कप्तान सिर पीटने और बाल नोचने लगा और बोला, “हे स्वामी! अब हम सब खत्म हो जाएंगे| हमारे बचने का कोई उपाय नहीं है|” यह कहकर वह और बुरी तरह रोने लगा| उसकी यह दशा देखकर अन्य मांझी भी घबरा गए|

मैंने हैरान होकर कप्तान से पूछा कि ‘हम क्यों समाप्त हो जाएंगे?’ उसने बताया, “तूफान के कारण हमें दिशा ज्ञान नहीं रहा| हम मार्ग से भटक गए हैं और अब हवा के कारण हमारा जहाज उस काली वस्तु के पास जा पहुंचेगा, जो एक चुम्बक का पहाड़ है| जहाज वहां पहुंचेगा तो उसकी सारी कीलें और लोह-पट्टिकाएं लकड़ी से अलग होकर उससे जा चिपकेंगे और जहाज टुकड़े-टुकड़े हो जाएगा| चुम्बक में यह गुण होता है कि वह लोहे को आकृष्ट करता है और जैसे-जैसे लोहा उसके समीप आता है, चुम्बक की आकर्षण शक्ति बढ़ती जाती है| सैकड़ों जहाजों के लोहे के टुकड़े इस पर्वत में जा चिपके हैं, जिनके कारण वह ऊपर से नीचे तक लोहे के टुकड़ों से ढक गया है और रंग में काला दिखाई देता है| कहते हैं यह पहाड़ बहुत ऊंचा है| उसके सभी किनारे ढलवां हैं| उसकी चोटी पर एक बहुत बड़ी पीतल की गोल और मोटी चादर है जो पीतल के खम्भों पर टिकी हुई है| उस चादर पर एक घुड़सवार की मूर्ति पीतल की बनी हुई है| उस घुड़सवार की छाती पर एक शीशे की तख्ती लगी है, जिस पर कुछ जादू के अक्षर खुदे हैं| कहते हैं कि पहाड़ की आकर्षण शक्ति का कारण वही मूर्ति है|”

यह कहकर कप्तान फिर रोने-पीटने लगा और उसके साथ जहाज के दूसरे मांझी भी रोने-चिल्लाने लगे| मुझे भी लगने लगा कि मेरी उम्र अब खत्म होने को है और मेरी मौत ही मुझे खींचकर यहां लाई है| सभी लोग इस चिंता में पड़ गए कि कैसे अपने प्राणों की रक्षा करें| वे लोग यह भी कहने लगे कि ‘जो कोई हमारे प्राण बचाएगा, हम सदा के लिए उसके गुलाम हो जाएंगे|’ सबने कोई-न-कोई उपाय सोच लिया| सुबह को हमारा जहाज उस काले पहाड़ के सामने जा पहुंचा| उसे देखकर सबके छक्के छूट गए और जो उपाय लोगों ने बचाव के लिए सोचे थे, सब भूल गए और जहाज में ऐसा करुण क्रन्दन होने लगा, जिसका कोई ठिकाना न था| दोपहर को वही हुआ, जो उस अनुभवी कप्तान ने कहा था| यानी पहाड़ ने जहाजों को ओतनी जोर से खींचा कि उनमें लगी कीलें और लोहे की दूसरी चीजें उड़-उड़कर पहाड़ से चिपकने लगीं| जहाजों के टूटने से महाभयानक शब्द होने लगा और कुछ ही क्षणों में ग्यारहों जहाज सागर ताल में समा गए| उन जहाजों की किसी वस्तु और किसी मनुष्य का पता न लगा| एक मैं ही भगवान की दया से जिंदा बचा रहा| संयोग से एक जहाज का टुकड़ा मेरे हाथ आ गया और मैं उसी के सहारे तैरने लगा| कुछ ही देर में मैं किनारे पर पहाड़ के नीचे पहुंचा| मैं पहाड़ पर चढ़कर सुरक्षित होना चाहता था, लेकिन वह ऐसी खड़ी ढलान का पहाड़ था कि कहीं ऊपर जाने की गुंजाइश ही नहीं मालूम होती थी| अचानक मुझे एक ओर नीचे से ऊपर जाते हुए मानव पद-चिन्ह खुदे हुए दिखाई दिए, जिनसे ऊपर तक सीढ़ियां-सी बन गई थीं| मैंने भगवान का नाम लेकर चढ़ना शुरू किया| चढ़ने की जगह बड़ी तंग थी और कहीं भी दूसरा मार्ग नहीं दिखाई देता था| साथ ही हवा इतने वेग से चल रही थी की प्रतिक्षण गिरने का भय था| लेकिन भगवान की कृपा से मैं धीरे-धीरे ऊपर तक जा पहुंचा और पीतल के गोले के अंदर जाकर भगवान को धन्यवाद देने लगा की उसने इतनी कठिन परिस्थितियों में भी मुझे जीवित रखा| रात हो गई थी, इसलिए मैं उस वृत्त के अंदर लेटकर सो गया|

स्वप्न में मैंने देखा, मुझसे एक बूढ़ा कह रहा है, ‘ऐ अजब! जागने पर अपने पांवों के नीचे की भूमि खोदना| वहां तुझे एक पीतल का धनुष और सीसे के तीन बाण मिलेंगे| वे तीनों बाण घोड़े सवार मूर्ति को मारना| इससे मूर्ति समुद्र में जा गिरेगी| फिर तुम घोड़े को वहीं भूमि में गाड़ देना| इसके बाद समुद्र में तूफान आएगा और वह इतना चढ़ने लगेगा की तुम्हारे पास तक आ जाएगा| तब तुम एक छोटी नाव से एक अन्य समुद्र में पहुंच जाओगे और फिर अपने नगर में पहुंच जाओगे| लेकिन खबरदार! इस सारे समय में भगवन का नाम बिलकुल नहीं लेना|’

इसके बाद मेरी आंख खुल गई| मैं अपने छुटकारे का उपाय जानकार अति प्रसन्न हुआ| बूढ़े के कहने के अनुसार मैंने धरती को खोदा तो उसमें तीन बाण और धनुष निकले| मैंने कमान से तीनों तीर पीतल के घुड़सवार पर छोड़े| तीसरे तीर के लगते ही सवार की मूर्ति समुद्र में गिर गई और घोड़े की मूर्ति मेरे पांवों के पास आ गिरी| मैंने उसे जमीन में गाड़ दिया, जहां से धनुष और बाण निकाले थे| अब समुद्र बढ़ने लगा और चढ़ते-चढ़ते पीतल के घेरे के पास आ गया| जहां मैं था, वहां एक नाव भी आ गई, जिसमें पीतल की मांझी बैठा था| मैं नाव पर बैठ गया| वृद्ध पुरुष की हिदायत को ध्यान में रखकर मैंने भगवान का नाम न लिया, बल्कि अपना मुंह बंद ही रखा| पीतल की मांझी नौ दिन तक नाव चलाता रहा और ऐसी जगह पहुंच गया, जहां आस-पास कई द्वीप दिखाई दे रहे थे| मैं बहुत खुश हुआ की अब कठिनाइयों से उबर जाऊंगा और इसी दशा में भगवान को धन्यवाद दे बैठा| तुरंत ही मांझी समेत वह नाव समुद्र में डूब गई| अब मैं फिर तैरने लगा और एक द्वीप की ओर जाने लगा| मैं कई घंटे तक तैरता रहा – यहां तक कि शाम होने लगी और मेरे हाथ-पांव भी थकान से ऐसे भारी हो गए कि मुझसे तैरा ही नहीं जाता था| ऐसे ही में एक बड़ी भारी लहर आई और उसने मुझे तट पर ला फेंका| मैं दौड़कर आगे चला गया कि कहीं दूसरी लहर आकर मुझे वापस समुद्र में न खींच ले जाए| मैंने अपने कपड़े उतारकर निचोड़े और हवा में हिलाकर सुखाए| फिर मैं इधर-उधर घूमकर देखने लगा| कई फल वाले पेड़ तो दिखाई दिए, लेकिन वहां आदमी कोई नहीं दिखाई दिया| मैंने कई फल खाए और इस तरह अपनी भूख और थकान दूर की| इसके बाद मैंने अपनी चिंता छोड़ दी और सोचा कि जो भगवान करेगा ठीक ही होगा|

थोड़ी देर बाद देखा कि एक छोटा-सा जहाज पाल उड़ाता हुआ उस द्वीप की ओर आ रहा है| पहले मैंने सोचा कि वह तट पर आए तो मैं उसके पास जाऊं| फिर सोचा कि अच्छी तरह देख लेना चाहिए कि कहीं ऐसा तो नहीं कि उसमें लुटेरे हों या मेरे शत्रु हों| इसलिए मैं एक घने और ऊंचे पेड़ पर चढ़ गया और एक मोटी डाल पर बैठकर ध्यानपूर्वक देखने लगा कि जहाज के लोग क्या करते हैं?

कुछ ही देर में जहाज किनारे पर रुका और उसमें से बहुत से आदमी फावड़े और दूसरे औजार लेकर निकले| फिर वे कुछ दूर जाकर भूमि खोदने लगे| खोदते-खोदते वे एक दरवाजे तक पहुंच गए| फिर वे जहाज में वापस गए और उसमें से बहुत-सी खाद्य वस्तुएं और बिस्तर आदि के बोझों को लादे हुए उसी दरवाजे से नीचे चले गए| फिर वे लोग जो नौकर चाकर ज्ञात होते थे, जहाज में जाकर एक वृद्ध पुरुष और चौदह-पंद्रह वर्ष के अति सुदंर किशोर युवक को लाए और सबके सब दरवाजे से नीचे उतर गए, जहां स्पष्टत: ही कोई मकान बना हुआ था| वहां से लौटकर उन्होंने दरवाजा बंद कर दिया और उस पर मिट्टी डालकर बराबर कर दी| जब वे वापस हुए तो वह सुंदर बालक उनके साथ नहीं था|

मुझे यह देखकर अत्यंत आश्चर्य हुआ और मैं कुछ देर और देखता रहा| वह जहाज जब चला गया और मैंने देखा कि वहां कोई नहीं है तो पेड़ से उतरकर उस स्थान पर गया, जहां पर उन्होंने भूमि खोदी थी| मैंने वहां की मिट्टी हटाई तो देखा कि वहां एक बड़ा चौकोर पत्थर रखा है| उसे उठाया तो दिखाई दिया कि नीचे तक सीढ़ियां गई हैं| मैं उतरकर नीचे गया तो देखा कि बहुत बड़ा मकान है और वहां हर तरफ कालीन बिछे हैं| दालान में कालीन पर सुंदर गद्दे पड़े हैं, जिन पर सुनहरे गिलाफ चढ़े हैं| वहां पर किशोर युवक बैठा था| वह एक हल्का-सा पंखा झल रहा था| उसके पास दो बड़ी मोमबत्तियां जल रही थीं| कई गुलदस्ते और खाने-पीने की बहुत सी चीजें उसके पास रखी थीं|

मुझे वहां देखकर वह किशोर घबरा गया| मैंने उसे तसल्ली देते हुए कहा, “तुम मुझसे डरो नहीं| तुम तो राजकुमार जैसे लगते हो| मैं तुम्हारे जैसे बच्चों को किसी प्रकार की हानि नहीं पहुंचाना चाहता| मुझे यह देखकर दुख हुआ है कि तुम्हारे साथी तुम्हें जीते जी इस कब्र में गाड़ गए हैं| खैर, अब चिंता न करो – मैं तुम्हें इस कब्र से निकाल दूंगा| लेकिन पहले तुम अपना किस्सा तो बताओ कि वे लोग तुम्हें यहां क्यों गाड़ गए हैं? देखो, सबकुछ निडर होकर सच-सच बताना| कुछ छुपाना नहीं| यह तो मैं देख चुका हूं कि उन सब लोगों ने मिलकर तुम्हें यहां दफन किया है और शायद तुम यहां पर जबर्दस्ती लाए गए हो| लेकिन मैं यह जानना चाहता हूं कि उन लोगों ने ऐसा क्यों किया?”

मेरी बातों से लड़के को तसल्ली हुई| उसने मुझे अपने पास बैठने को कहा और जब मैं बैठ गया तो उसने अपना वृत्तांत कहना आरंभ किया, “हे महानुभाव! मेरी कहानी बड़ी आश्चर्यजनक है, आप सुनकर स्तंभित रह जाएंगे| मेरा पिता एक जौहरी है| उसने अपने भाग्य और बुद्धिमानी से बहुत-सा धन एकत्रित किया है| उसके सैकड़ों नौकर-चाकर और बहुत-सी कोठियां हैं| वह अपने जहाजों पर सवार होकर देश-विदेश घूमता है| हर स्थान पर उसके गुमाश्ते हैं, जो उसकी ओर से रत्नों का क्रय-विक्रय करते हैं|

“इतना प्रचुर धन होने पर भी मेरे पिता के यहां बहुत दिनों तक कोई संतान नहीं हुई| एक रात उन्होंने स्वप्न में देखा, कोई कह रहा था कि ‘तुम्हारे यहां एक पुत्र होगा, किंतु उसकी आयु बहुत कम होगी!’ यह स्वप्न देखकर मेरे पिता को बड़ा दुख और चिंता व्याप्त हुई| उसके कुछ दिनों बाद मेरी माता ने मेरे पिता को बताया कि उसे गर्भ रह गया है| उसके नौ महीने बाद मैं पैदा हुआ| मेरे जन्म पर सारे परिवार वालों और नातेदारों को अतीव प्रसन्नता हुई, किंतु मेरे पिता को अपना स्वप्न याद करके दुख ही बना रहता था| अत: उन्होंने ज्योतिषी लोगों से सलाह ली| उन्होंने कहा कि इस बालक को चौदहवें वर्ष में मृत्यु का भय है| अगर उस समय बच गया तो फिर यह बहुत दिन जीएगा और इसकी आयु काफी लम्बी होगी|

“उन्होंने कहा, ‘हमें ग्रहों से यह भी ज्ञात हुआ है कि जब अजब नाम का बादशाह एक पीतल के घुड़सवार को जो एक चुम्बक के पर्वत की चोटी पर मौजूद है, समुद्र में गिरा देगा, उसके पचास दिन के बाद अजब बादशाह इस लड़के को मार डालेगा|’ मेरा पिता तो पहले ही से स्वप्न देखकर दुखी था, अब ज्योतिषियों से यह सुनकर और भी चिंता में पड़ गया और रात-दिन यह सोचता रहता कि इस लड़के की जान कैसे बचाई जाए| इसीलिए उसने यह तहखाने का मकान बनवाया| मुझे चौदहवां वर्ष लगा तो दूसरे ही दिन ज्योतिषियों ने आकर बता दिया कि बादशाह अजब से पीतल के घुड़सवार को समुद्र में गिरा दिया है|

“यह सुनकर मेरे पिता की चिंता और बढ़ी और वह घंटों तक सोचता रहा कि मेरे सिर से ग्रह कैसे टलें? अंतत: उसने इस निर्जन द्वीप में पहले से बनाए हुए भूमिगत आवास में मुझे बंद करने का निश्चय किया| उसने सोचा कि बादशाह अजब जैसा शक्तिशाली इस निर्जन द्वीप में क्यों आएगा? और आएगा भी तो यह तहखाना कैसे पाएगा? इसलिए चालीस दिन तक मुझे इस मकान में बंद कर दिया जाए, जिससे न मैं किसी को देखूं, न कोई मुझे देखे| यही कारण है मेरे इस स्थान पर लाए जाने का|”

जब वह बालक अपनी बात कह चुका तो मैं मन-ही-मन ज्योतिषियों के त्रिकालदर्शी होने के दावों पर हंसने लगा| मैं सोचने लगा कि ऐसे प्यारे निर्दोष बालक की मैं क्यों हत्या करने लगा| उसे सांत्वना देने के खयाल से मैंने उसे अपना नाम तो न बताया, किंतु उससे कहा, “तुम्हें अब डरने की बिलकुल आवश्यकता नहीं है| मैं तुम्हारी रक्षा के लिए यहां आ गया हूं| यह संयोग ही है कि तुम्हारा रक्षक मैं बना, क्योंकि आज ही तट के निकट मेरा जहाज डूबा और मैं अकेला उसमें से बचा और तैरता हुआ इस द्वीप पर आया, जहां पर मैंने तुम्हारा हाल देखा| तुम भगवान पर भरोसा रखो| किसी प्रकार की चिंता अपने मन में न लाओ| ज्योतिषियों की भविष्यवाणी कभी सच्ची नहीं होगी| मैं यहां रहकर चालीस दिन तक तुम्हारी सेवा और रक्षा करूंगा और भगवान की दया से यह चालीस दिन की अवधि भी कुशलतापूर्वक बीत जाएगी| जब तुम्हारा पिता तुम्हें लेने के लिए आएगा तो मैं भी तुम्हारे साथ तुम्हारे देश को चला जाऊंगा और वहां से किसी जहाज पर अपने देश के लिए रवाना हो जाऊंगा| मैं आजीवन तुम्हारा उपकार न भूलूंगा|”

मैंने इस प्रकार उससे धैर्य देने वाली बहुत-सी बातें की| मैंने ध्यान रखा कि भूल से मेरी जिह्वा पर मेरा या मेरे पिता का नाम न आए, क्योंकि इससे उस बालक के मन में अकारण भय उत्पन्न हो जाता| उसका जी बहलाने के लिए मैं उसे तरह-तरह की कहानियां और अन्य प्रकार के वृत्तांत सुनाता रहा| वह बालक अत्यंत कुशाग्र बुद्धि जान पड़ता था| इतने दिनों तक चुपचाप रहने के बाद मुझे भी उससे वार्तालाप करके बड़ी प्रसन्नता हो रही थी| रात हुई तो हम दोनों ने मिलकर भोजन किया| उसका पिता इतनी खाद्य-सामग्री रख गया था कि दो क्या तीन आदमियों तक को चालीस-इकतालीस दिन तक काफी होती| रात होने पर हम लोग भोजन करने के उपरांत सो गए|

दूसरे दिन सुबह जागने पर मैं उसके हाथ-मुंह धोने के लिए उसके पास जल ले गया| फिर हम लोगों ने स्वादिष्ट व्यंजनों का नाश्ता किया| दिन भर उसके साथ शतरंज और चौपड़ खेलकर उसका जी बहलाता रहा| रात को भोजन करके हम लोग फिर सो रहे| हम लोग इसी प्रकार दिन व्यतीत करने लगे और उसके कारण हम दोनों में एक दूसरे के प्रति स्नेह बहुत बढ़ गया| विशेषत: मुझे तो वह बालक प्राणों से भी प्यारा लगने लगा|

मुझे विश्वास हो गया कि ज्योतिषियों का यह कथन सिर्फ बकवास था कि बालक की मृत्यु अजब बादशाह के हाथ से होगी, क्योंकि अजब बादशाह यानी मुझे तो यह बालक जान से प्यारा है| मैं इसकी हत्या क्यों करूंगा?

इसी प्रकार उनतालीस दिन तक हम दोनों हंसी-खुशी उस घर में रहे| चालीसवें दिन वह सवेरे जागा तो बड़ा खुश था| कहने लगा, “देखिए महोदय! आज चालीसवां दिन है| भगवान की दया से और आपके अनुग्रह से मैं सही सलामत हूं| मेरा पिता जब सुनेगा कि आपने इस अवधि में मेरी कितनी सेवा की है और मेरा कितना उपकार किया है तो वह आपका अत्यंत कृतज्ञ होगा और आपको सुरक्षापूर्वक आपके देश में पहुंचा देगा|”

फिर उस लड़के ने मुझसे कहा कि मेरे लिए कुछ जल गर्म कर दीजिए ताकि मैं अच्छी तरह नहाकर नए कपड़े पहनूं, क्योंकि मेरा पिता आज मुझे लेने के लिए आएगा|

मैंने पानी गर्म करके उसके नहाने-धोने का प्रबंध कर दिया| नहाने के बाद वह बिस्तर पर लेटा| मैंने उसे लिहाफ ओढ़ा दिया और वह कुछ देर के लिए सो गया| सोकर उठने पर उसने कहा, “महोदय! मेरा जी करता है कि खरबूजा खाऊं| आप एक खरबूजा और थोड़ी-सी मिस्त्री मेरे लिए ले आइए|”

मैंने जाकर खरबूजे के ढेर में से एक अच्छा खरबूजा छांटा और उसे चीनी की प्लेट में रखकर उसके पास लाया| फिर मैंने उससे पूछा, “इसे काटने के लिए छुरी चाहिए, छुरी कहां है?”

उसने कहा, “मेरे सिरहाने की तरफ जो आला है, उसमें छुरी रखी है|”

आला ऊंचा था| मैं उस तक नहीं पहुंच सका| इसलिए मैंने उछलकर छुरी को उठाना चाहा| फिर भी यह न हो सका, इसलिए मैं एक मोखे का सहारा लेकर ऊंचा हुआ और छुरी मेरे हाथ में आ गई| मैं चाहता था कि धीरे से नीचे उतर जाऊं, लेकिन संयोग से मेरा पांव फिसल गया और मैं संभल ही न सका| मैं सीधे उस जौहरी के बेटे के ऊपर ही गिरा| मेरे हाथ की छुरी उसके हृदय में घुस गई और वह तड़पकर वहीं ठंडा हो गया|

मुझे अत्यंत शोक हुआ| दुख के कारण मैंने अपने कपड़े फाड़ डाले और छाती पीट-पीटकर पछाड़ें खाकर जमीन पर गिरने लगा| मैं रो-रोकर यही कहता रहा कि इस अभागे के लिए दिन में कुछ घड़ियां ही रह गई थीं| यह समय भी निकल जाता तो इसकी जान बच जाती| ज्योतिषियों का कथन ठीक निकला और मैं अभागा ही इस प्यारे बच्चे की मृत्यु का कारण बना| मैंने आकाश की ओर मुख किया और दोनों हाथ उठाकर कहने लगा, ‘हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर! तू सबकुछ देख रहा है और तू सबकुछ जानता है| तुझे ज्ञात है कि इस बालक को मैंने जानबूझकर नहीं मारा है| यदि इसकी मृत्यु में मेरा तनिक भी दोष हो तो तू इसी समय मेरे प्राण ले ले|”

इसी प्रकार मैं बहुत देर तक जौहरी के पुत्र की लाश पर बैठकर रोता-कलपता रहा| जब दिन थोड़ा-सा ही बाकी रहा तो मैंने सोचा कि अब इसका बाप इसे लेने आता होगा| मेरी इतने दिनों की सेवा व्यर्थ गई| अब मैं क्या मुंह लेकर उससे मिलूं| अब मेरा यहां ठहरना ठीक नहीं|

यही सोचकर मैं मकान से निकला और जीने पर पत्थर रखकर उस पर मिट्टी डालकर बराबर कर दी| बाहर निकलकर देखा तो जौहरी का जहाज पाल उड़ाए चला आ रहा था| मैंने सोचा कि जौहरी मुझे देखेगा तो अपने बेटे का हत्यारा समझकर मुझे अपने नौकरों से मरवा डालेगा| कारण यह कि जौहरी के पूछने पर मैं झूठ नहीं बोल सकूंगा| इसलिए मैं एक ऊंचे और घने पेड़ पर चढ़ गया और देखने लगा|

जहाज ने किनारे पर लंगर डाला और उसमें से बूढ़ा जौहरी अपनी नौकरों के साथ निकलकर खुशी-खुशी किनारे पर आया| तहखाने के पास जाकर उन लोगों ने जैसे ही पत्थर हटाकर जीने का रास्ता खोला| बूढ़े की प्रसन्नता गायब हो गई और उसके मुंह पर झाईं-सी फिर गई| कारण यह था कि उसने अपने पुत्र का नाम लेकर पुकारा तो अंदर से कोई उत्तर न आया| जब वे लोग अंदर गए तो देखा कि लड़का मरा पड़ा है और उसके हृदय में छुरी घुसी है, क्योंकि मुझे छुरी निकालने का ध्यान नहीं रहा था – अत: लाश को देखकर उन लोगों में अचानक रोना-चिल्लाना शुरू हो गया|

उन लोगों का विलाप और मृत बालक का उनके मुंह से गुणानुवाद सुनकर मुझे भी रोना आ रहा था| बूढ़ा जौहरी तो बेचारा अपने पुत्र का शव देखकर अचेत ही हो गया| उसके सेवकों ने उसे तहखाने से बाहर निकालकर उसी पेड़ के नीचे बिठाया, जिसके ऊपर मैं छिपा बैठा था| फिर वे लड़के की लाश को बाहर लाए| उसे नहलाया और सफेद कफन पहनाया और कब्र खोदकर उसमें लाश उतार दी| लड़के का पिता इस बीच बराबर रोता रहा| तीन बार कब्र में मिट्टी डाली गई और फिर उसके सेवकों ने कब्र को मिट्टी से ऊपर तक भरकर बराबर कर दिया|

इसके बाद वे लोग तहखाने में गए और वहां से बची हुई खाद्य-सामग्री और वस्त्र बाहर लाकर जहाज पर ले गए| कुछ ही देर में उनका जहाज उन सबको लेकर चल दिया| उसके कुछ देर बाद मैं पेड़ से उतरा और उसी तहखाने में चला गया| अब मेरा नियम हो गया था कि रात में उसी घर में रहता और दिन में इधर-उधर घूमकर वहां से निकलने के लिए रास्ते की खोज करता रहता| भूख लगने पर जंगली फल आदि से पेट भरता रहता| इसी प्रकार लगभग एक महीना और बीत गया|

फिर मैंने देखा कि समुद्र का जल धीरे-धीरे घट रहा है| समुद्र के घटने से द्वीप का विस्तार बहुत बढ़ गया| समुद्र इतना घटा कि जहां सबसे ज्यादा गहरा था, वहां भी कमर के बराबर पानी रह गया और किनारे के दूसरी ओर की भूमि दिखाई देने लगी| कुछ समय के बाद पानी और घटा और पिंडलियों के बराबर हो गया| अब मैंने उसे पार करने की सोची| समुद्र सूखने से मीलों बालू निकल आई थी| बड़ी कठिनाई से वह बालू-भूमि पार करके मैं समुद्र तट पर पहुंचा और पानी लांघ करके दूसरी भूमि पर पहुंचा| वहां दूर पर आग जलती दिखाई दी| मैंने सोचा यहां पर मनुष्य रहते होंगे, क्योंकि बगैर मनुष्यों के आग कैसे जलेगी| पास जाने पर पता चला कि वह आग नहीं, बल्कि तांबे का बना एक घर है, जिस पर सूर्य की किरणें पड़ रही हैं| मैं अभी सोच ही रहा था कि यह मकान किसका हो सकता है कि तभी उसमें से दस नौजवान बाहर निकले, उनके साथ लंबे कद का एक वृद्ध मनुष्य भी था| सारे जवान दाहिनी आंख के काने थे| मैं सोच ही रहा था कि ये लोग कौन हैं, इतने में उन्होंने स्वयं ही आकर मुझसे नम्रतापूर्वक पूछा, “आप कौन हैं और कहां से आए हैं?”

मैंने कहा कि मेरी कहानी बड़ी विचित्र और लम्बी है| यदि आप धैर्यपूर्वक सुन सकें तो मैं सुनाऊं| वे सब सुनने को बैठ गए और मैंने अपना वृत्तांत आद्योपान्त सुना दिया| उन्हें यह सुनकर बड़ा आश्चर्य हुआ| फिर वे लोग मुझे उस मकान के अंदर ले गए| उस मकान में कई बड़ी-बड़ी दलानें और बारादरियां पार करके एक बड़ा-सा नीला घर दिखाई दिया| उसके चारों ओर बीच में एक दालान था, जो उससे कुछ ऊंचा था| वृद्ध मनुष्य दालान में जा बैठा और कमरे के चारों ओर दसों जवान कालीनों पर बैठ गए| एक जवान ने मुझसे कहा, “ऐ मित्र! तुम भी घर के बीच में बिछे हुए कालीन पर बैठ जाओ, लेकिन हम कुछ भी करें, उसका कारण न पूछना| यह न पूछना कि तुम लोग दाहिनी आंख से काने क्यों हो?”

कुछ देर में वह बूढ़ा उठा और दसों काने जवानों के लिए खाना लाया| उसने हर एक को खाने में से उसका भाग दिया और एक भाग मुझे भी दिया, जिसे मैंने खा लिया| भोजनोपरांत वृद्ध पुरुष ने हम लोगों को एक-एक प्याला सुगंधित मदिरा का दिया| फिर उन लोगों ने मेरे वृत्तांत को जो उन्हें अद्भुत और रोचक लगा था, दुबारा सुना| इसके बाद हम इधर-उधर की बहुत-सी बातें करते रहे|

जब काफी रात बीत गई तो एक जवान ने बूढ़े से कहा, “हमारे सोने का समय हो गया है, अभी तुम हमारे दैनिक नियम की चीजें नहीं लाए?”

बूढ़ा एक कोठरी के अंदर जाकर वहां से दस थाल नीले ढक्कनों से ढके हुए लाया और हर जवान के सामने उसने एक-एक थाल रख दिया| ढक्कन खुलने पर मैंने देखा की हर थाल में राख और काली स्याही थी| उन्होंने राख और स्याही को मिलाकर अपने-अपने कक्षों में जाकर सो रहे|

उन लोगों की यह दशा देखकर मैं उत्कण्ठित हुआ| मैंने वचन दिया था की उनसे कुछ न पूछूंगा| किंतु मुझे उत्सुकता के कारण रात भर नींद न आई| दूसरे दिन सुबह हम सभी लोग सैर के लिए बाहर निकले तो मैंने उनसे पूछा, “सज्जनो! आप लोग हर तरह ज्ञानवान और बुद्धिमान हैं, किंतु कल रात आप लोगों ने जो कुछ किया, वह उन्मत्तों के अलावा कोई भी नहीं करेगा| मैं बड़ा परेशान हूं| मैंने आपको वचन दिया है कि मैं आपके कार्यकलापों के बारे में या आपके काने होने का कारण न पूछूंगा, किंतु यह भी सत्य है कि अब यह बातें पूछे बगैर मुझसे रहा नहीं जाता है| इसलिए मैं आपसे पूछता हूं कि आप लोगों ने क्यों अपना मुंह काला किया और क्यों मातम किया? और यह भी कि आप सभी दाहिनी आंख से काने क्यों हैं?”

किंतु उन्होंने कहा, “हम तुम्हें यह सब बातें नहीं बता सकते| अगर तुम्हें हमारे साथ रहना हो तो इन प्रश्नों को भूल जाओ|”

वह दिन भी बीता| रात को हम लोगों ने फिर अलग-अलग भोजन किया| उसके बाद बूढ़े ने फिर उन लोगों के सामने स्याही और राख से भरे थाल रखे और उन्होंने रोज की रस्म के तौर पर अपने मुंह काले किए और वही रोना-पीटना शुरू किया| दूसरी बार यह सब देखकर मेरी उत्सुकता और बढ़ गई| अगले दिन मैंने उनसे कहा, “हे मित्रों! अब मुझसे आप लोगों की यह दशा चुपचाप बैठकर देखी नहीं जाती| आप कृपया अपनी बातें मुझे बताएं और कोई ऐसा भी उपाय बताएं, जिससे मैं अपने देश में पहुंच जाऊं|”

तब उनमें से एक जवान ने मुझसे कहा, “तुम हमारी दशा देखकर दुखी न हो| हम लोग तुम्हारे मित्र और हितचिंतक हैं, इसलिए हम तुम्हें ये बातें नहीं बताते| कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारी दशा भी हम लोगों जैसी हो जाए| वैसे तुम बहुत जोर देते हो तो हम बता भी सकते हैं, किंतु उसका फल अच्छा नहीं होगा|”

मैंने कहा, “मैं यह सब जानना चाहता हूं, फल चाहे जो कुछ हो|”

तब वह जवान बोला, “देखो, हम तुम्हें एक बार फिर समझाते हैं कि इन बातों जो जानने की जिद छोड़ दो| हमारा कहना मानो और इस बारे में कुछ न पूछो, वरना हमारी तरह तुम भी काने हो जाओगे|”

मैंने कहा, “इस बात के फलस्वरूप मुझे जो भी दुख पहुंचे, मैं उसे सहने के लिए तैयार हूं| मैं इसे अपना ही दुर्भाग्य समझूंगा और आप लोगों में से किसी को इसके लिए दोष नहीं दूंगा|”

तब उस जवान ने कहा, “देखो, अगर किसी कारणवश तुम्हारी दाहिनी आंख फूटी और तुम हमारे पास वापस आए तो तुम हमारे साथ नहीं रह पाओगे| तुम देख रहे हो कि यहां दस ही कक्ष हैं और दसों भरे हुए हैं| यहां अब ग्यारहवें आदमी के रहने की गुंजाइश नहीं है|”

मैंने कहा, “मुझे यह भी स्वीकार है कि आप मुझे यहां न रहने दें, लेकिन अपना भेद जरूर बताएं|”

जब उन दसों जवानों ने देखा कि मैं अपनी बात पर अड़ा हुआ हूं तो उन्होंने एक भेड़ का वध किया और उसकी खाल उतारी, फिर मुझे दे दी और कहा, “इसे होशियारी से रखो, यह तुम्हारे बहुत काम आएगी| हम लोग तुम्हें इस भेड़ की खाल में सी देंगे और यहां से हट जाएंगे| फिर यहां एक अति विशालकाय पक्षी, जिसे रूख कहते हैं, आएगा और तुम्हें अपना खाद्य समझकर झपट्टा मारकर उठा लेगा और एक बहुत ऊंचे पहाड़ की चोटी पर रखकर तुम्हें खाना चाहेगा| हम पहले से ही तुम्हें होशियार किए देते हैं| ज्योंही तुम्हें मालूम हो कि तुम जमीन पर रखे गए हो, इस छुरी से खाल को चीरकर बाहर निकल आना और जोर से चीखना| रूख पक्षी इससे डरकर भाग जाएगा| इसके बाद तुम निर्भय होकर आगे बढ़ जाना| कुछ दूर चलकर तुम्हें एक आलीशान महल मिलेगा| उस महल में ऊपर से नीचे तक हर जगह सोने के पत्तर मंढ़े हैं और जगह-जगह पर बड़े सुंदर ढंग से हीरे और दूसरे रत्न जड़े हैं| तुम निर्द्वंद्व रूप से मकान के दरवाजे से, हमेशा खुला रहता है, अंदर चले जाना| हम सभी एक-एक करके उसे मकान में रहे हैं, किंतु उसमें क्या होगा – यह बताने की जरूरत हम नहीं समझते और जो कुछ हमारे साथ हुआ, वह भी नहीं बताएंगे – क्योंकि हमारी दशा ऐसी नहीं है कि उसके कहने-सुनने से हमें खुशी हो| तुम स्वयं ही वह सब देख-सुन लोगे| यह जरूर कहते हैं कि हमारी तरह तुम भी दाहिनी आंख से काने हो जाओगे| वैसे तो तुम पर जो अभी तक बीता है ओर जो आगे बीतेगा, वह सब लिखो तो पूरी पुस्तक तैयार हो जाएगी, किंतु हम इससे अधिक कुछ न कह सकेंगे|”

वह जवान अपनी बात समाप्त कर चुका तो मैंने भेड़ की खाल को अपने चारों ओर लपेट लिया| उन लोगों ने कुशलतापूर्वक मुझे इस तरह सिल दिया कि मेरे सांस लेने के लिए जगह रहे| मुझे इस प्रकार सीकर और जंगल में रखकर वे घर के अंदर चले गए| थोड़ी ही देर में रूख नामक विशाल पक्षी आया और भेड़ समझकर मुझे झपट्टा मारकर पंजों में दबाकर ले उड़ा और एक ऊंचे और एक ऊंचे पहाड़ की चोटी पर ले जाकर रख दिया|

नीचे जमीन महसूस करते ही मैं छुरी से खाल फाड़कर बाहर आ गया और बड़ी जोर से चीख मारी| पक्षी यह देखकर डरकर उड़ गया| मैं वहां से बताए मार्ग पर चल दिया और तीसरे पहर के लगभग महल तक पहुंच गया| मैंने जैसा सुना था, उससे भी अधिक अच्छा उसे पाया| खुले दरवाजे से अंदर पहुंचा तो अंदर एक और शानदार चौकोर मकान देखा, जिसके चारों ओर सौ द्वार थे| एक द्वार स्वर्ण का था और निन्यानवे चंदन की लकड़ी के थे| अंदर कई सुसज्जित वाटिकाएं और गृह थे| सामने एक बड़ी-सी बारादरी थी, जिसमें चालीस सुंदर नवयौवनाएं उत्तमोत्तम वस्त्रालंकारों से सुसज्जित बैठी थीं| मुझे देखकर वे उठ खड़ी हुईं| उन्होंने हंसकर मेरा स्वागत किया और कहने लगीं, “हम बहुत देर से आपकी प्रतीक्षा में थीं|”

फिर उन्होंने मुझे कुछ ऊंचे स्थान पर बिठाया| मैंने बहुत कहा कि आप लोगों से ऊंचे स्थान पर बैठने का अधिकारी नहीं हूं, किंतु उन्होंने नहीं माना| वे बोलीं, “आप हम सभी के पति और स्वामी हैं और हम सब आपकी पत्नियां और दासियां हैं|”

उन्हें देखकर और उनकी बातें सुनकर जो प्रसन्नता मुझे हुई, उसका वर्णन संभव नहीं है| कोई सुंदरी मेरे पांव धोने को गरम पानी लाई, किसी ने सुगंधित जल से मेरे हाथ धुलाए, किसी ने बहुमूल्य वस्त्र लाकर मुझे पहनाए, किसी ने नाना प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन मेरे सामने सजा दिए| फिर एक नवयौवना सुगंधित मदिरा की सुराही और प्याला लेकर मुझे पिलाने के लिए आ गई| इसी प्रकार वे देर तक हंसी-खुशी के साथ तरह-तरह से मेरी सेवा करती रहीं| मैं यह सब देखकर इतना अभिभूत हुआ कि अब तक के अपने सारे दुख-दर्द भूल गया और स्वयं को सारे संसार का अधिपति समझने लगा|

मैंने उन सभी सुंदरियों के साथ बैठकर भोजन और मदिरा पान किया| भोजन के बाद वे मेरे चारों ओर बैठ गईं और उन्होंने मुझसे मेरी यात्रा का वृत्तांत पूछना आरंभ किया| मैं भी उन्हें बताने लगा| इतने में रात हो गई| उन स्त्रियों ने मकान में बड़ी सुंदर रोशनी की| कुछ स्त्रियों ने मुझसे मनोहारी ढंग से बातचीत करनी शुरू कर दी|

फिर उन्होंने भोजन के पात्र हटाकर फल, मिठाई, शर्बत आदि शीशे के सुंदर पात्रों में लेकर सामने रख दिए और मुझे ऊंचे आसन पर बिठाकर मेरे चारों तरफ बैठकर गाने बजाने लगीं| उनमें जो नृत्य प्रवीन थीं, वे नृत्य भी करने लगीं| इसी में आधी रात बीत गई|

फिर उनमें से एक ने कहा, आज आप बहुत दूर से आए हैं, अब आराम करें|” उसी ने आगे कहा, “शयनकक्ष तैयार है| सोने से पहले हममें से किसी को चुन लें तो वह आपके साथ सो रहे|”

मैंने कहा “यह काम तो बड़ा कठिन और अनुचित होगा, क्योंकि सौंदर्य में तुम सभी एक से बढ़कर एक हो, मैं किसे चुनूं? फिर जिसे चुनूंगा, उसके अलावा दूसरों को बुरा नहीं लगेगा और क्या वे मेरी धृष्टता पर क्रुद्ध नहीं होंगी?”

तब उस सुंदरी ने कहा, “यह बात नहीं है| हम सबकी हार्दिक इच्छा है कि आपको प्रसन्न करें| हममें परस्पर ईर्ष्या नहीं है| आप हममें से जिसके चाहें हाथ पकड़कर ले जाएं| दूसरी बुरा नहीं मानेंगी, क्योंकि हम सभी चाहते हैं कि आप एक-एक करके हम सभी का भोग करें| आप हममें से प्रत्येक का आनंद उठाएंगे ही| किसी को आज तो किसी को कल| इसलिए हमें बुरा लगने का प्रश्न ही नहीं है| अब आप बगैर झिझक हममें से जिसे चाहें, उसे अपने साथ ले जाएं| हम सब शहजादियां हैं, किंतु आपकी सेवा के लिए हैं|”

यह सुनकर मैंने उसी सुंदरी की ओर हाथ बढ़ाया, जिसने मुझसे ऐसी बुद्धिमानी की बातें की थी| उसने तुरंत अपना हाथ मेरे हाथ में दे दिया| मैं उसके साथ अपने शयनकक्ष में आ गया और अन्य उनतालीस स्त्रियां अपने शयनगारों में चली गईं| दूसरे दिन सवेरे मैं अच्छी तरह उठ भी नहीं पाया था कि शेष उनतालीस स्त्रियों ने मेरे पास आकर अभिवादन किया| उनके आने से पहले मैंने वे सुंदर वस्त्र और रत्न पहन लिए, जो मेरे सिरहाने रख दिए गए थे|

कुछ देर बातचीत करने के बाद वे स्त्रियां मुझे स्नानागार में ले गई और तरह-तरह की मालिश करके मुझे स्नान कराया| मेरे नहा चुकने के बाद उन्होंने दूसरे वस्त्राभूषण, जो पहले से भी उत्तम थे, मुझे पहनाए| इसके बाद सारे दिन, बल्कि आधी रात तक पहले दिन की तरह हास-परिहास, किस्सा-कहानी, खाना-पीना और राग-रंग चलता रहा| आधी रात हुई तो उन्होंने कहा, “आप हममें से जिसे चाहें, चुन लें, ताकि वह आपके साथ जाकर सो जाए|”

मैंने एक सुंदरी का हाथ पकड़ा और उसे लेकर अपने शयनकक्ष में चला गया| सुबह उठकर फिर उन लोगों के साथ स्नानागार में चला गया|

मैं दिन भर नाना प्रकार की खाने-पीने और अन्य विलास सामग्री का उपभोग करता और रात को उन चालीस में किसी एक सुंदरी को अपने शयनकक्ष में ले जाता| इसी प्रकार लगभग एक वर्ष आनंदपूर्वक दस राजमहल में बीत गया|

जब वर्ष पूरा होने में एक दिन रह गया तो सुबह को वे सुंदरियां, जो हमेशा प्रसन्न बदन होकर मुझसे मेरा रात का हाल पूछने आया करती थीं, आंखों में आंसू भरे हुए आईं और कहने लगी, “ऐ शहजादे! हम सब आपसे विदा होने के लिए आई हैं| आपको हम भगवान को सौंपती हैं, वही आपकी रक्षा करेगा|”

मुझे उनकी इस बात से आश्चर्य भी हुआ और दुख भी| मैंने उनसे पूछा, “ऐसा क्या हो गया की तुम लोग इतनी दुखी हो और यहां से विदा होने की बात कह रही हो? तुम्हें कहां जाना है और क्यों जाना है? भगवान के लिए मुझसे सारी बातें कहो| अगर तुम किसी संकट में हो और तुम्हें मेरी सहायता की आवश्यता हो, तो मुझसे जो भी सहायता बन पड़ेगी, वह मैं अवश्य करूंगा|”

उन्होंने कहा, “कुछ नहीं हो सकता| भगवान की इच्छा है कि हम लोग हमेशा के लिए अलग हो जाएं और आज के बाद न आप कभी हमें देखें, न हम आपको देखें| आपकी तरह पहले भी यहां कई लोग आए और फिर ऐसे अलग हुए कि हमें आज तक उनका कोई हाल मालूम नहीं हुआ| वही बात आपके साथ होने वाली है|”

यह कहने के बाद उन सभी ने विलाप करना आरंभ कर दिया| मैं घबरा उठा और मैंने उनसे कहा, “तुम लोग साफ-साफ बताती क्यों नहीं कि तुम्हारे दुख का कारण क्या है?”

उन्होंने कहा, “हम आपको क्या बताएं कि हम क्यों दुखी हैं? यह समय हमारा आपसे सदा के लिए बिछुड़ने का है| हां, एक बात है कि अगर आपको हमसे मिलने की उत्कट इच्छा हो और उसके लिए आप जो प्रतिज्ञा करें, उस पर दृढ़ रहें तो हम लोगों का आपसे फिर मिलन हो भी सकता है|”

मैंने कहा, “मेरी समझ में कुछ भी नहीं आया कि तुम्हारी बातों का क्या अर्थ है? मैं तुम्हें ईश्वर की सौगंध दिलाता हूं कि सारी बात को साफ समझाकर कहो|”

तब उनमें से एक ने कहा, “सबसे पहले तो आप यह समझ लीजिए कि हम चालीसों शहजादियां हैं| हम लोग इस स्थान पर एक वर्ष तक आमोद-प्रमोद के लिए आया करती हैं| और फिर चालीस दिन के लिए अपने आवश्यक कार्यों के लिए अपने-अपने देश चली जाती हैं| चालीस दिन के बाद फिर एक वर्ष के लिस इस महल में आ जाती हैं| कल हमारा वर्ष पूरा हो गया, इसलिए आज हम आपसे विदा ले रही हैं| यही कारण है हमारे शोक और विलाप का| हम यहां से जाने से पहले आपको यहां के सौ कक्षों की कुंजियां सौंप जाएंगी| हमारे पीछे आप सभी में घूम-घूमकर अपना जी बहलाएं| लेकिन हम आपको अपनी सौगंध देते हैं कि इस स्वर्ण द्वार को न खोलना| अगर आपने इसे खोला तो हमारा आपका मिलना फिर कभी न हो सकेगा| लेकिन हमें मालूम है कि आपमें इतना आत्मसंयम नहीं है कि उस द्वार को न खोलें| आप उसे जरूर खोलेंगे और हमेशा के लिए हमसे बिछुड़ जाएंगे| यही कारण है कि हम सारी शहजादियां दुखी हैं| अगर भगवान ने आपको सद्बुद्धि दी और आपने उस स्वर्ण द्वार को न खोला तो आपको कभी दुख न होगा| आप संपूर्ण आयु चैन से बिताएंगे और हमारे साथ हमेशा आनंद करेंगे| लेकिन अगर आपने हमारे कहने के विपरीत कार्य किया तो आपको बहुत अधिक शारीरिक कष्ट होगा| हम फिर आपसे सौगंध देकर कहती हैं कि इस स्वर्ण द्वार को कभी न खोलना| इसलिए वादा कीजिए कि आप ऐसा नहीं करेंगे कि आप हमसे हमेशा के लिए बिछुड़ जाएं| हम वैसे इस स्वर्ण द्वार की चाभी अपने साथ भी ले जा सकती हैं| किंतु यह अच्छा नहीं मालूम होता कि आप जैसे जिम्मेदार और बड़े आदमी पर अविश्वास करें और चाभी आपके हाथ में न दें| हम एक बार फिर यह कहती हैं कि अगर आपने यह स्वर्ण द्वार खोला तो हमें और आपको बहुत कष्ट होगा|”

उनकी बातें सुनकर मैं बहुत दुखी हुआ| मैंने कहा, “मुझे तुम लोगों से अलग होने का अत्यंत दुख है| खैर, किसी प्रकार मैं यह चालीस दिन काटूंगा और तुम्हारी इस नसीहत को हमेशा याद रखूंगा कि यह स्वर्ण द्वार न खोलूं| अगर तुम लोग कठिन काम करने को कहती तो उसे भी मैं स्वीकार कर लेता| तुम्हारी बात मानने में मेरा ही लाभ है| मैं भला ऐसी बात क्यों करूंगा, जिससे मेरी गहरी हानि हो और तुम लोगों से भी हमेशा के लिए अलग होना पड़ जाए| मैं ऐसा कार्य कभी नहीं करूंगा|” यह कहकर मैंने उन सभी को एक-एक करके गले लगाया| इसके बाद वे सब चली गईं और मैं उस लंबे-चौड़े राजमहल में अकेला ही रह गया|

उनके जाने से मुझे अत्यंत शोक हो रहा था| यद्यपि उनके वियोग में मुझे एक-एक घड़ी भारी पड़ रही थी, फिर भी मैंने अपना जी बहलाने को सोचा कि जिन दरवाजों की चाभियां मेरे पास हैं, उन्हें मैं खोलकर देखूं| मैंने सोचा कि निषेध तो केवल एक द्वार को खोलने में ही है, सो उसे नहीं खोलूंगा| इसलिए मैंने पहला दरवाजा खोला| अंदर गया तो देखा कि वह एक बड़ा भारी फलों का बाग है| ऐसा शानदार फलों का बाग संसार में शायद ही कोई और हो| उसमें सहस्त्रों सघन और सुंदर वृक्ष उचित दूरियों पर लगे थे| उनमें नाना प्रकार के सुस्वाद और आकर्षक रंगों के फल लगे हुए थे| उनमें से बहुत से फल ऐसे थे, जिनका मैं नाम तक नहीं जानता था| उन वृक्षों में सिंचाई का प्रबंध इस प्रकार किया गया था कि एक बड़ी और पक्की नहर से काट-काटकर छोटी-छोटी नहरें इस कारीगरी से निकाली गईं थीं कि प्रत्येक वृक्ष की जड़ में पानी पहुंचता था| इसके लिए किसी आदमी की जरूरत न थी जो पेड़ों में पानी पहुंचाए| बाग को ऐसे बुद्धिमानों ने लगाया था कि प्रत्येक वृक्ष को केवल उतना ही पानी पहुंचने का प्रबंध था, जिसमें वे सदैव हरे-भरे रहें और ऐसा न हो कि उनकी जड़े सड़-गल जाएं|

मैं बहुत देर तक उस बाग में घूमता-फिरता रहा| वहां बहुत-सी वस्तुएं थीं| जिन्हें देखकर मुझे आश्चर्य होता था और मैं प्रत्येक वस्तु को ध्यानपूर्वक देखता था| मैं उस बाग से वापस आया और उसके दरवाजे पर ताला लगा दिया|

फिर मैंने दूसरा दरवाजा खोला| इसके अंदर एक फूलों का बाग था| पहले बाग जैसी कारीगरी से ही इस बाग के हर पौधे के लिए भी उचित मात्रा में पानी प्रबंध किया गया था| संसार में कोई ऐसा फूल नहीं होगा, जो उस वाटिका में न हों| गुलाब, चमेटी, नरगिस, बनफशां, सौसन, चम्बा, बेला, मोतिया आदि नाना प्रकार के फूल वहां पर खिले हुए थे| उनकी सुगंध हवा में भरी हुई थी और उसके कारण मस्तिष्क को बड़ा सुख मिल रहा था| मैं सुध-बुध खोकर घंटों वहां घूमता रहा| फिर मैंने उस बाग का दरवाजा भी बंद किया और तीसरा दरवाजा खोला|

उसके अंदर एक पक्षी गृह था| उसका सारा फर्श संगमरमर का था और ऊंचाई से चंदन, आबनूस की लकड़ियों से बने पिंजरे लटक रहे थे, जिनमें तोता, मैना, बुलबुल इत्यादि भांति-भांति के पक्षी थे| उन पिंजरों में दाने और पानी की कुल्हियां बहुमूल्य पत्थरों से बनी थीं| इतना बड़ा पक्षीगृह था कि कम-से-कम सौ आदमी संभालने के लिए जरूरी थे, लेकिन वहां भी एक भी आदमी दिखाई नहीं देता था| साथ ही इतनी सफाई भी थी कि एक तिनका इधर-उधर पड़ा दिखाई नहीं देता था| रात हुई तो सारे पक्षी सो गए और मैं भी पक्षीगृह का ताला लगाकर अपने शयनकक्ष में आ गया और सो गया| दूसरे दिन सुबह एक और द्वार खोला तो उसमें एक बड़ा महल देखा| उसमें चालीस प्रकोष्ठ बने थे, किंतु सभी के दरवाजे खुले थे| एक कोठे में सिर्फ मोती भरे थे| मोतियों के विभिन्न आकारों के हिसाब से ढेर लगे थे| एक ढेर में कबूतर के अंडे जितने बड़े मोती थे| फिर उनसे छोटे मोतियों में कई ढेर थे| दूसरे कोठे में लाल भरे थे और उनमें कई लाल ऐसे थे, जो रात को दीये की तरह चमकते थे| तीसरे कोठे में नीलम भरे थे, चौथे में सोने की ईंटें, पांचवें में अशर्फियां, छठे में चांदी की ईंटें, सातवें में रुपयों की ढेरियां थीं| इसी प्रकार अन्य कोठों में, किसी में पुखराज, किसी में पन्ना, किसी में मूंगा आदि रत्न भरे हुए थे| मैं इस असीम रत्नागार को देखकर आश्चर्यचकित हुआ और सोचने लगा कि मैं कितना भाग्यशाली हूं जो इतने खजाने और चालीस सुंदर शहजादियों का स्वामी हूं|

उनतालीस दिनों तक मैं विभिन्न द्वारों में जाकर वहां की आश्चर्यप्रद वस्तुएं देखता रहा| चालीसवें दिन मेरे देखने के लिए सिर्फ एक दरवाजा रह गया| यह वही दरवाजा था, जिसे खोलने को मुझे मना किया गया था| मुझे शैतान ने बहका दिया और मैंने कसमें वादे-तोड़कर उस दरवाजे को भी खोल डाला| दरवाजा खोलते ही उससे बड़ी तेज सुगंध आई, जिससे मैं सुध-बुध खो बैठा| होश में आया तो अंदर गया और ठहरकर उस गंध के कम होने की प्रतीक्षा करने लगा| फिर अंदर जाकर देखा कि बहुत बड़ा महल है, जिसके फर्श पर केसरी बिछी है और सोने की तिपाइयों पर चांदी के दीपक जल रहे हैं, जिनमें इत्र के जैसे सुगंधित तेल भरे थे| इसी से वहां तेज सुगंध हो रही थी| और भी कई आश्चर्य की चीजें मैंने वहां पर देखी|

मैंने देखा कि एक बहुत उम्दा मुश्की घोड़ा वहां बंधा है| उसके सामने जो जलपात्र था, उसमें गुलाब जल भरा हुआ और खाने की नांद में तिल और जौ भरे थे| उस घोड़े की लगाम में सोने के पत्तर लगे थे| मैंने उस घोड़े की लगाम पकड़कर उसे बाहर निकाला ताकि बाहर के प्रकाश में उसे भली प्रकार देख लूं| बाहर लाकर मैं उस पर सवार हो गया और उसे चलने का इशारा किया, लेकिन वह न चला| फिर मैंने उसको एक चाबुक मारा| चाबुक लगते ही घोड़ा भयानक रूप से हिनहिनाया और अपने पंखों से, जिन्हें मैंने पहले नहीं देखा था, उड़ चला| मैं घबराकर उसके अयाल पकड़कर लटक गया|

घोड़ा मुझे लेकर इतना ऊंचा उड़ा कि वहां से पृथ्वी बहुत छोटी दिखाई देती थी| फिर वह उतरकर उसी तांबे के मकान की छत पर पहुंच गया, जहां पर मैं पहले पहुंचा था| वहां उसने अपने शरीर को इतने जोर का झटका दिया कि मैं पीठ के बल जमीन पर जा गिरा| घोड़े ने अपनी पूंछ मेरी दाहिनी आंख में मारी, जिससे वह फूट गई| फिर घोड़ा उड़ गया| मैं किसी तरह गिरता-पड़ता नीचे आया| नीचे बारादरी और उसके इर्द-गिर्द बने हुए दस कमरों को देखकर मुझे विश्वास हो गया कि यह वही महल है, जहां मैं पहले आया था| उस समय वे दस जवान वहां नहीं थे| मैं उनकी प्रतीक्षा करने लगा| कुछ देर में वे लोग बूढ़े आदमी के साथ वहां आए| उन्होंने न मेरी ओर कुछ ध्यान दिया, न मेरी आंख फूटने पर सहानुभूति प्रकट की|

उन्होंने कहा, “देखो भाई! हम लोग तो तुम्हारे दुर्भाग्य का कारण नहीं सिद्ध हुए|”

मैंने कहा, “आप लोग ठीक कहते हैं| मुझ पर जो मुसीबत पड़ी, वह अपनी मूर्खता के कारण पड़ी| किंतु मैं जानना चाहता हूं कि इस मुसीबत को दूर करने का कोई उपाय है या नहीं?”
उन्होंने कहा, “अगर हम ऐसा उपाय जानते तो अपनी मुसीबत को दूर न कर लेते? तुम्हारी तरह हम लोग भी एक-एक वर्ष तक उन शहजादियों के साथ आनंदपूर्वक रहे| अगर हम वह स्वर्णद्वार न खोलते तो हम उनके साथ सदा आनंदपूर्वक रहते| तुम हम लोगों से अधिक बुद्धिमान दिखाई देते थे| फिर भी तुम वह सोने का दरवाजा खोलने से बाज न रह सके और अपने को ऐसी मुसीबत में डाल बैठे| हम तुम्हें पहले बता चुके हैं कि अब यहां ग्यारहवें आदमी के रहने के लिए स्थान नहीं है| तुम्हारे लिए यही उचित होगा कि तुम यहां से बगदाद चले जाओ| वहां का रास्ता हम बता देंगे| वहां तुम्हें ऐसा व्यक्ति मिलेगा, जो तुम्हारे दुख दूर करेगा|”

उनकी सलाह मानकर मैं बगदाद पहुंचा| रास्ते में दाढ़ी-मूंछें और भवें मुंडवा दीं और फकीरों के वस्त्र पहन लिए| चलते-चलते बहुत दिन बाद आज शाम को बगदाद पहुंचा| परकोटे पर इन दोनों साथियों से भेंट हुई| फिर तुम्हारे घर, जहां तुमने हमारा सत्कार किया|

जब तीसरा फकीर अपना हाल कह चुका तो जुबैदा ने उससे और उसके दोनों साथियों से कहा, “मैंने तुम तीनों का अपराध क्षमा किया| अब तुम लोग यहां से चले जाओ|”

एक फकीर ने कहा, “आप कृपा करके हमें इतनी अनुमति दें कि हम यहां रुककर इन बाकी तीन आदमियों की कहानी भी सुन लें|”

जुबैदा ने खलीफा, जाफर और मसरूर की ओर देखकर अपना हाल कहने का इशारा किया| वह यह तो जानती न थी कि ये लोग कितने उच्च पद के स्वामी हैं, इसलिए उसने उन्हें अपना-अपना हाल सुनाने की आज्ञा दी|

खलीफा के मंत्री जाफर ने निवेदन किया, “हे सुंदरी! हम लोग इस महल में प्रवेश करने के समय ही अपना हाल कह चुके हैं| अब तुमने फिर पूछा है तो कहते हैं कि हम लोग मोसिल से आए हुए व्यापारी हैं| हम अपनी व्यापार की वस्तुएं बेचने यहां आए थे और एक सराय में ठहरे थे| आज रात के लिए एक व्यापारी ने हमें खाने का निमत्रंण दिया था| जब हम उसके घर पहुंचे तो उसने हम लोगों को अत्यंत स्वादिष्ट भोजन कराया और बढ़िया शराब पिलाई| फिर देर तक उसके यहां संगीत और नृत्य का कार्यक्रम चला| वहां का शोर इतना बढ़ा कि गश्त पर निकले सिपाही आ गए| उन्होंने कई लोगों को गिरफ्तार कर लिया| हम लोग भाग्यशाली थे कि किसी प्रकार बचकर निकल आए| लेकिन रात अधिक बीत जाने के कारण हमारी सराय का द्वार बंद हो गया था| हम लोग परेशान थे कि रात कहां बिताएं| इधर-उधर भटकते हुए तुम्हारी गली में आ गए| तुम्हारे घर से हंसने-बोलने और गाने-बजाने की आवाजें आ रही थीं, इसलिए हमने दरवाजा खुलवाया| तुमने कृपा करके हम लोगों का आदर-सत्कार किया| यही हमारी कहानी है|”

मंत्री ने यह बात इतने आत्मविश्वास और इतनी कुशलता से कही कि जुबैदा को उसकी सत्यता पर विश्वास हो गया| उसने कहा, “अच्छा, हमने तुम्हारा भी अपराध क्षमा किया और अब तुम सब यहां से चले जाओ|”

वे लोग उठने से झिझके तो जुबैदा ने क्रोध में भरकर कहा, “जाते हो या जान देना चाहते हो?”

उसकी डांट सुनकर वे सातों व्यक्ति – मजदूर, तीनों फकीर, खलीफा और उसके दोनों साथी चुपचाप उठकर बाहर आ गए, क्योंकि सात हब्शी नंगी तलवारें लिए उनके सिर पर खड़े थे| सातों व्यक्तियों के घर से निकलते ही स्त्रियों ने घर का दरवाजा बंद कर लिया|

बाहर आकर खलीफा ने उन फकीरों से कहा, “इतनी रात बीत गई है, अब तुम लोग कहां जाओगे? क्योंकि तुम तो इस नगर में किसी से परिचित भी नहीं हो|”

उन तीनों ने कहा, “हम लोग भी इसी चिंता में हैं|”

खलीफा ने कहा, “तुम लोग हमारे साथ चलो| हम तुम्हारी सहायता करेंगे|”

यह कहकर खलीफा ने मंत्री के कान में कहा कि इन तीनों को अपने घर ले जाकर ठहराओ और कल मेरे दरबार में हाजिर करो|

खलीफा के आदेशानुसार मंत्री जाफर उन तीनों को अपने घर ले गया और इधर मसरूर सहित खलीफा भी अपने महल में आ गया|

खलीफा शयनकक्ष में जाकर अपनी शय्या पर लेट गया, किंतु उसे सारी रात नींद नहीं आई| उसने जो कुछ देखा-सुना था, वह उसके चित्त से उतरता ही नहीं था| वह इसी चिंता में था कि वह यह बात जान ले कि ‘जुबैदा कौन है और उसने दोनों कुतियों को क्यों मारा और फिर क्यों प्यार किया?’ साथ ही उसे यह जानने की भी बड़ी इच्छा थी कि अमीना के शरीर पर जो काले निशान पड़े थे, उनका क्या भेद है?

सुबह वह नित्यकर्म नाश्ता आदि से निवृत्त होकर दरबार में गया और सिंहासन पर बैठ गया| कुछ देर में मंत्री ने आकर उसे सलाम किया| खलीफा ने मंत्री से कहा, “जब तक मैं उन तीनों स्त्रियों और दोनों काली कुतियों का पूरा हाल न जान लूंगा, मुझे चैन न मिलेगा| इसी कारण मुझे रात भर नींद न आई है| तुम तुरंत जाओ और उन तीनों स्त्रियों को मेरे सम्मुख उपस्थित करो|”

मंत्री ने उस मकान में जाकर पिछली रात की बातों का उल्लेख किए बगैर उन तीनों स्त्रियों से कहा, “खलीफा तुम लोगों से कुछ बात करना चाहते हैं| तुम दरबार में चलो|”

वे तीनों अपने शरीर पर बुरका डालकर मंत्री के साथ चल दीं| रास्ते में मंत्री ने अपने घर होते हुए तीनों फकीरों को भी बगैर उन्हें कुछ बताए अपने साथ ले लिया|

खलीफा उन स्त्रियों और फकीरों को देखकर बड़ा प्रसन्न हुआ| उसने तीनों स्त्रियों को अपने पीछे की ओर परदे के पीछे बिठाया ताकि दरबारियों और सेवकों पर प्रकट हो जाए कि ये सम्मानीय महिलाएं हैं| फिर उसने उन तीनों फकीरों को, जो दरअसल राजा और राजकुमार थे, उनकी प्रतिष्ठा के अनुसार अपने समीप आसन दिए| स्त्रियों के आस्म ग्रहण करने के बाद खलीफा ने उनकी ओर मुंह करके कहा, “कल रात मैंने मोसिल के व्यापारी के रूप में तुमसे भेंट की थी| हमारी बातों से तुम लोगों को कुछ दुख हुआ था और इसीलिए तुम हम लोगों से नाराज हुई थीं| मैंने आज जो तुम्हें बुलाया है, वह इसलिए नहीं कि मैं तुम लोगों को कोई दंड देना चाहता हूं, बल्कि मैं तुम्हारे आने से बड़ा प्रसन्न हूं| तुममें जो सद्बुद्धि है, वह यदि बगदाद की सारी स्त्रियों में आ जाए तो कितना अच्छा हो| यद्यपि हमने वादा तोड़कर तुम्हें दुख पहुंचाया, किंतु फिर भी तुमने हम लोगों पर कृपा करके हमें छोड़ दिया|”

खलीफा ने आगे कहा, “कल रात मैं मोसिल का व्यापारी था और तुम्हारे अधीन था| इस समय मैं हारूं रशीद, अब्बास वंश का सातवां खलीफा और हजरत मुहम्मद का वंशज हूं| मैंने तुम्हें इसलिए बुलाया है कि मैं जानूं कि तुम कौन हो और तुम तीनों में से एक स्त्री के कंधे पर काले निशान किसलिए हैं?”

यद्यपि खलीफा ने यह सब स्पष्ट शब्दों में उनसे कहा था, तथापि मंत्री ने एक बार फिर इन बातों को दुहरा दिया| यह सुनकर जुबैदा ने आपबीती सुनानी आरंभ की|

 

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