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पक्का इरादा

पक्का इरादा

बिल्मा गोल्डी रूडाल्फ के बचपन की घटना है जब वह अपंग थी| एक दिन उसने कक्षा में खेल-खिलाड़ियों के विषय में प्रश्न किया तो कक्षा के बच्चे खिल-खिलाकर हँस पड़े|

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कक्षा के शिक्षक भी लड़की पर व्यंग करते हुए बोले- “क्यों खेल-खिलाड़ियों के बारे में जानना चाहती हो? पहले अपने पैरों की ओर तो देखो| तुम ठीक तरह से चल भी नहीं सकती हो और खेल-खिलाड़ियों के बारे में जानना चाहती हो?” वह बच्ची कुछ नहीं बोल सकी और सारी कक्षा हँसी से गूँजती रही|

अगले दिन कक्षा में मास्टर जी ने फिर उस लड़की पर व्यंग किया| तब वह तिलमिला उठी| उसने बगल में पड़ी बैसाखी लगाई और उठते हुए दृढ़ संयमित स्वर में कहा- “ठीक है, आज मैं अपाहिज हूँ, चल फिर नहीं सकती, लेकिन मास्टर जी, यह याद रखिए कि मन में पक्का इरादा हो तो क्या नहीं हो सकता| आप आज मुझ पर हँस रहे हैं, मेरे अपाहिज जा अपंग होने पर हँस रहे हैं, लेकिन याद रखिए, यही अपंग लड़की एक दिन हवा में उड़कर दिखाएगी|” उसकी बात सुनकर उसके साथियों ने उसकी फिर से खिल्ली उड़ाई|

वह दिन था- फिर उस अपाहिज लड़की ने पीछे मुड़कर नहीं देखा| वह प्रतिदिन चलने का अभ्यास करने लगी| कुछ ही दिनों में वह अच्छी तरह चलने लगी और धीरे-धीरे दौड़ने भी लगी| उसकी इस कामयाबी ने उसके हौंसले बुलंद कर दिए| कुछ ही दिनों में वह अच्छी धाविका बन गई| 1960 के ओलम्पिक में उसने पूरे उत्साह के साथ भाग लिया और एक-साथ तीन स्वर्ण पदक जीतकर सबको चकित कर दिया|

हवा से बातें करने की महत्वकांक्षा रखने वाली वह अपंग लड़की थी टेनेसी राज्य की नगरिक थी| इस कहानी से हमें पता चलता है कि मनुष्य पक्का इरादा रखे तो असंभव को भी संभव कर दिखा सकता है|

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