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एकाग्रता

एकाग्रता

महाराज एकनाथ महाराष्ट्र के एक महान् संत थे| वे गोस्वामी तुलसीदास के समकालीन एक ग्रहस्थ संत थे; मराठी साहित्य का उन्हें प्राण कहा जाता था| उन्होंने ‘भागवत् एकादश स्कंध,- ‘भावार्थ रामायण,- ‘आनन्द लहरी- आदि अनेक ग्रंथ लिखे थे| एक बार रातभर जागते रहे| रात्रि का तीसरा पहर हो गया, तब भी एकनाथ अपने हिसाब में एक पाई की भूल खोज रहे थे| अंत में वह परेशान हो उठे|

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अचानक खोजते-खोजते वह चिल्ला उठे- “मिल गया| मिल गया|”

जोर से चिल्लाने से उनके गुरु जनार्दन स्वामी की नींद खुल गई| उन्होंने पूछा- “एकनाथ, अरे तुम्हें क्या मिल गया?”

एकनाथ ने जवाब दिया- “आख़िर मेरा हिसाब मिल गया|”

“तो हिसाब मिलने पर तुम सारी रात जागते रहे हो?” जनार्दन ने पूछा|

“हाँ, गुरुदेव!” एकनाथ ने उत्तर दिया|

“एकनाथ, तुम एक पाई की भूल मिल जाने से इतना प्रसन्न हो, यदि तुम संसार की भूल समझ पाते तो कितने खुश होते| इतनी एकाग्रता और लगन से तो तुम भगवान् का भी ध्यान करते तो तुम सम्पूर्ण आनन्द के भंडार भगवान् को पा जाते|”

एकनाथ गुरु की दीक्षा लेकर सच्चे भगवान् की खोज के लिए घर छोड़कर निकल गए और कालांतर में महाराष्ट्र के प्रमुख संत बने| इस कहानी से हमें शिक्षा मिलती है कि प्रत्येक मनुष्य में एकाग्रता अवश्य होनी चाहिए|

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