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द्वादशाक्षर-मंत्र की महिमा

द्वादशाक्षर-मंत्र की महिमा

एक बार ऋषियों ने सूत जी से पूछा- ‘भगवान्! आप ऐसा उपाय बताएँ, जिससे सभी पापों से छुटकारा मिल जाए, अलक्ष्मी (दरिद्रा) छोड़ कर चली जाए और निरंतर लक्ष्मी का निवास हो|’ सूत जी ने कहा- ‘ऋषियों! इसके लिए मनुष्य को निरंतर विहित कर्म करते हुए भगवान् के नाम का जप करना चाहिए|

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जो चलते, खाते, सोते, जागते, आँख मींचते और खोलते हुए भगवान् का जप करता है, वह सभी पापों से छूट जाता है और उत्तम गति प्राप्त करता है| दुःसह की पत्नी दरिद्रा भगवान् का नाम सुनकर तुरंत भाग खड़ी होती है|’

सूत जी ने आगे कहा- ‘ऋषियों! सब शास्त्रों का मंथन कर और बारंबार विचार कर मैं इस निश्चय पर पहुँचा हूँ कि भगवान् का निरंतर ध्यान करना चाहिए और निरंतर भगवान् के नाम का उच्चारण करना चाहिए| द्वादशाक्षर मंत्र का जप बहुत प्रभावशाली है| उसका स्वरूप यह है- ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय|’ यज्ञोपवित धारण करने वाले इस मंत्र के पहले ‘ॐ’ लगावें और अन्य लोग ‘श्री’ लगावें| इस तरह यह मंत्र बारह अक्षर वाला हो जाता है| इस संबंध में एक कथा है|

एक ब्राहमण को कठिन तपस्या के बाद एक पुत्र पैदा हुआ, जिसका नाम ऐतरेय था| उसका उपनयन किया गया| इसके बाद पिता उसे पढ़ाने बैठे, किन्तु बच्चे की जीभ ही भी नही हिलती, वह कुछ बोल नही पाता| उसकी जीभ केवल ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’- इस मंत्र को ही बोल पाती थी| इसके अतिरिकत उसकी जीभ से और किसी शब्द का उच्चारण नही होता| पिता पढ़ा कर थक गए| अंत में निराश होकर उसके पिता ने दूसरा विवाह किया| नई पत्नी से जो पुत्र हुए, वे चारों वेदों के विद्वान हुए और उन्होंने कमाकर धन-धान्य से घर को भर दिया| उनकी माता बहुत प्रसन्न रहती थी, किंतु ऐतरेय की माता शोक से सदा ग्रस्त रहती थी| एक दिन उसने ऐतरेय से कहा- ‘बेटा! तुम्हारे और भाई वेद-वेदांग उदभट विद्वान हो गए है| वे कमाकर अपनी माता को आनंदित करते रहते है| मैं अभागिन हूँ, इसलिए तुम मेरे पुत्र हुए| तुमसे मुझे कोई सुख न मिला| मेरा तो मर जाना ही अच्छा है|’

माता को व्यथित जानकार ढाँढ़स बँधाते हुए ऐतरेय ने कहा- ‘आज मैं तुम्हारे लिए बहुत-सा धन-धान्य ले आऊँगा| इतना कहकर वह एक यज्ञ-मंडल में चला गया| इसके पहुँचते ही वे वैदिकों के मंत्र भूल गए| उन्हें एक मन्त्र भी स्मरण नही हो रहा था| वे बहुत असमंजस में पड़ गए थे| ऐतरेय ने ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का स्पष्ट उच्चारण किया| सुनते ही वैदिकों के मुख से ठीक-ठीक उच्चारण होने लगा| वैदिकों के मन में ऐतरेय के प्रति श्रद्धा हो गई| उन लोगों ने ऐतरेय को प्रणाम किया और विधान के साथ उनकी पूजा की| उसके बाद होता, उद्गाता आदि सभी ऋत्विज् उनकी स्तुति करने लगे| यज्ञ की पूर्णाहुति के बाद स्वर्ण-रत्न आदि से ऐतरेय का स्वागत किया गया| ऐतरेय ने सब धन माता को समर्पित कर दिया| उस समय पुष्प वृष्टि से सारा वातावरण सुगंधित हो उठा, द्वादशाक्षर मंत्र का जप असाध्य को भी साध्य बना देता है|

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