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दगाबाज दोस्त

दगाबाज दोस्त

किसी जंगल में हिरन और कौआ दो बहुत गहरे मित्र रहते थे| एक दिन जब हिरन जंगल से लौटा तो उसके साथ एक गीदड़ भी था| कौआ सोचने लगा कि यह मक्कार इसके साथ कैसे? यही प्रश्न उसने हीरन से पूछा|

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हिरन ने बताया कि यह गीदड़ इस दुनिया में अकेला है और दोस्ती करने का इच्छुक है| कौए ने उसे समझाते हुए कहा कि गीदड़ से कभी भी मित्रता नही करनी चाहिए| लेकिन हिरन ने उसकी बात पर कान नही दिया क्योंकि गीदड़ तो पहले ही उसे अपनी चिकनी-चुपड़ी बातों से प्रभावित कर चुका था|

कौआ चुप तो हो गया लेकिन गीदड़ पर नज़र भी रखने लगा|

गीदड़ बड़ा ही धूर्त था, वह हिरन का शिकार करना चाहता था|

एक दिन हिरन को मक्का खिलाने के बहाने गीदड़ एक खेत में ले गया| खेत में पहले ही से जाल लगा था| हिरन उसमें फँस गया| वह मदद के लिए गीदड़ को पुकारने लगा तो गीदड़ बोला, ‘कैसी मदद करूँ भैया? अब तो तुम मृत्यु की प्रतीक्षा करो| अभी मैं चिल्लाने वाला हूँ| मेरी आवाज़ सुनकर खेत का मालिक आ जाएगा और तुम्हें मार डालेगा| तुम्हारे मरने के बाद मैं बड़े आराम से तुम्हें खा जाऊँगा|’

इतना कहकर वह खेत से बाहर निकलकर ‘हुआ-हुआ’ करने लगा|

हिरन को बड़ा पछतावा हुआ| वह सोचने लगा इ कौआ ठीक ही कहता था, लेकिन मैंने ही उसकी बात नही मानी| वह ज़ोर-ज़ोर से रोने लगा| उसका रुदन सुनकर कौआ उसके पास आया और बोला, ‘देखा तुमने, मेरी बात न मानने का नतीजा| आज तुम मौत के मुहँ में पड़े हो| अब जैसा में कहता हूँ, वैसा ही करो|’

कौआ उसे अपनी योजना समझकर वृक्ष पर जा बैठा|

गीदड़ की आवाज़ सुनकर कूछ ही देर बाद खेत का मालिक वहाँ आ धमका| उसने पास जाकर देखा तो लगा कि हिरन मरा पड़ा है| उसने उसे जाल से निकाल दिया| गिदड़ झाड़ियों में छिपकर सब तमाशा देख रहा था|

जैसे ही किसान ने हिरन को जाल से निकाला, वह उठकर भाग खड़ा हुआ| किसान ने उसे भागते देखा तो सोचा कि हिरन ने मरने का नाटक करके उसे उल्लू बनाया है| उसने हाथ में थमा मोटा डंडा उस पर खींच मारा| मगर तब तक हिरन दूर निकल चुका था| वह डंडा सीधा गीदड़ की खोपड़ी में जा लगा और उसकी जीवन लीला समाप्त हो गई|


कथा-सार

‘कर भला हो भला- कर बुरा हो बुरा|’ यह कहावत गीदड़ पर चरितार्थ हुई| दोस्ती की आड़ लेकर वह हिरन का शिकार करना चाहता था| बुद्धिहीन हिरन ने अपने मित्र कौए की बात भी अनसुनी कर दी| वह तो उसका भाग्य अच्छा था कि प्राण बच गए और दुष्ट गीदड़ को अपनी करनी का फल भोगना पड़ा|’

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