रसना सांपिनी बदन बिल जे न जपहिं हरिनाम|
तुलसी प्रेम न राम सों ताहि बिधाता बाम|
तुलसी देखत अनुभवत सुनत न समुझत नीच|
चपरि चपेटे देत नित केस गहें कर मीच||
हम हमार आचार बड़ भूरि भार धरि सीस|
हठि सठ परबस परत जिमि कीर कोस कृमि कीस||
बारक सुमिरत तोहि होहि तिन्हहि सम्मुख सुखद|
क्यों न संभारहि मोहि दया सिंधु दसरत्थ के||
राम बाम दिसि जानकी लखन दाहिनी ओर|
ध्यान सकल कल्यानमय सुरतरु तुलसी तोर||
प्रेम सरीर प्रपंच रुज उपजी अधिक उपाधि|
तुलसी भली सुबैदई बेगि बांधिऐ ब्याधि||