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प्रेम में प्रपंच बाधक है – भक्त तुलसीदास जी दोहावली

प्रेम सरीर प्रपंच रुज उपजी अधिक उपाधि|
तुलसी भली सुबैदई बेगि बांधिऐ ब्याधि||

प्रस्तुत दोहे में तुलसीदासजी कहते हैं कि प्रेमरूपी शरीर में यदि विषयासक्ति का रोग लग जाता है तो बड़ी भारी पीड़ा उत्पन्न हो जाती है| अच्छी वैघता इसी में है कि व्याधि को तुरंत रोक दिया जाए|

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