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मुलतान में जाकर पीर से मिलना – साखी श्री गुरु नानक देव जी

मुलतान में जाकर पीर से मिलना

श्री गुरु नानक देव जी शिवरात्रि के मेले से उठकर मुलतान की यात्रा पर निकल पड़े| जब गुरु जी मुलतान पहुंचे तो वहां के पीरों ने बाबा जी को दूध का कटोरा भर कर यह बताने के लिए भेजा कि मुलतान में बहुत से पीर है|

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आपकी यहां समाई नही है| पर बाबा जी ने उस लबालब दूध से भरे कटोरे पर बगली का फूल रख दिया और यहां सिद्ध किया कि हम पीरों में इसी तरह समा जाएंगे जिस प्रकार गंगा सागर में समा जाती है| हम इस फूल की तरह अडोल रहेंगे व किसी को दुःख नहीं देंगे और न ही देने आए है|

पीर गुरु जी का यह स्वभाव देखकर अत्यन्त प्रसन्न हुए व पूछने लगे कि मन को मारने के मैंने अनेक जतन किए| शरीर भी सूख कर तिनका हो गया है| परन्तु मन फिर भी स्थिर नहीं रहता|

गुरु जी कहने लगे कि वर्मी को मारने से सांप नहीं मरता, साँप तो मन्त्र से ही वश में किया जा सकता है| जगत के पदार्थों को झूठा जानकर उनकी कोई इच्छा नहीं करनी चाहिए| मन संकल्प विकल्पों को रोकने से ही वश में होता है, और कोई जप-तप व साधन इसको वश में नहीं करते| पीर ने दुबारा पूछा, गुरुजी! आप माया को झूठ बताते हो मगर इस माया के बगैर तो संसार का कोई काम नहीं होता| गुरु जी ने बताया कि माया व इसके व्यवहार भी झूठे है| परमेश्वर का नाम ही केवल सत्य है, इसको हृदय में बसाओ, आप के सारे कारज रास होंगे|

फिर पीर ने पूछा कि सन्तों के लक्षण क्या होते हैं?

गुरु जी ने उत्तर दिया कि

सन्त दूसरों के गुण देखकर खुश होते है| पराई स्त्री को बुरी नजर से नहीं देखते, बुरे पुरुषों का संग नहीं करते, वैरी-मित्र को एक जैसा समझते है| आदर-अनादर, शौक-हर्ष को एक समान समझते है| वे परमेश्वर की याद में लीन रहते है| इसके भय में रहकर संतों की संगत करनी, मन के विकारों को मारना ही उद्धार का साधन है|

आप जी के ऐसे वचन सुनकर पीरों ने आप जी को नमस्कार की और कहा कि आप धन्य है, जिन्होंने सच्चा उपदेश देकर कलयुग के करोड़ों जीवों का उद्धार किया है|

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