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इसकी प्रकृति गर्म है, संभवतया इसी कारण यह शरीर में पित्त को बढ़ाता है| यह रक्त के बहाव में भी तेजी लाता है| यह पेट के कीड़े नष्ट करने में समक्ष है| इसके साथ ही यह निम्न रोगों में भी अत्यन्त लाभकारी है|

आक को मदार और अकौआ भी कहते हैं| इसका पेड़ छोटा और छ्त्तेदार होता है| इसके पत्ते बरगद के पत्तों की तरह होते हैं| इसका फूल सफेद, छोटा और छ्त्तेदार होता है| इसके फलों में कपास होती है|

जायफल को औषधियों की पिटारी कहा जाता है| इसमें अफीम की तरह तत्त्व होता है| इसका स्वाद कसैला होता है| इसको गुड़ के साथ खाने पर ऐंठन, मरोड़, पेट दर्द आदि से छुटकारा मिलता है|

मुलहठी के पत्ते गोल और छोटे होते हैं| इसकी लकड़ी तथा जड़ काम में लाई जाती है| यह मीठी, कुछ कड़वी, शीतल, भारी एवं चिकनी होती है| इसमें इतने गुण हैं जिनका वर्णन करना सरल नहीं है|

हींग का प्रयोग दाल, साग-सब्जी में डालने तथा उदर रोग नाशक चूर्ण बनाने में किया जाता है| हींग-जीरा से सब्जी छौंकने तथा दाल बघारने की क्रिया बहुत ही लाभदायक है| छौंक से निकलने वाली वायु जितनी दूर तक जाती है, उतनी दूर का वातावरण सुगंधित हो जाता है| इससे सूक्ष्म जीवाणु, जो स्वास्थ्य को हानि पहुंचाते हैं, नष्ट हो जाते हैं| असल में हींग एक पेड़ की गोंद है जो पर्वतों पर होता है| गोंद को पकाकर हींग बनाई जाती है|

कालीमिर्च चरपरी, तीक्ष्ण, रूखी, कुछ गरम, पाक में मधुर, हल्की, शोषक और अग्निवर्द्धक होती है| यह कफ-वात नाशक लेकिन पित्तजनक है| इसके सेवन से श्वास, पेट दर्द, कृमि, हृदय रोग, प्रमेह, बवासीर तथा सिर के रोग नष्ट होते हैं|

राई दो रंगों में मिलती है – लाल और सफेद| दोनों बहुत गुणकारी एवं अग्नि प्रदीप्तकारी हैं| राई के सेवन से पेट की अग्नि तीव्र होती है जो भोजन पचाने में सहायता करती है| यह पेट के कीड़े मारती है और खाज-खुजली को नष्ट करती है| यह खाने में कुछ तेज तथा चरपरी-सी होती है|

हमारे देश में लौंग को मसालों का राजा माना जाता है| मसाले को स्थायी तथा खुशबूदार बनाने के लिए लौंग का प्रयोग किया जाता है| पान में भी लौंग डालकर खाया जाता है| इसके सेवन से गला खुल जाता है और छाती में जमा कफ बाहर निकल जाता है|

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