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सन्त की सुगन्धि

सन्त की सुगन्धि

जब बड़े महाराज जी एस. डी. ओ. थे, तो एक बार आप पहाड़ी इलाके में जा रहे थे कि एकाएक आपके दिल में ख़ुशी छा गयी| आप समझ न सके कि वह ख़ुशी किस बात की थी| कभी-कभी आदमी अपनी औलाद को याद करके खुश होता है, कभी अपने पद को याद करके ख़ुश होता है| आपके दिल में ख़याल आया कि अप्रैल का महीना शुरू है, शायद पेड़ों की ख़ुशबू के कारण ख़ुशी का वातावरण है| फिर ख़याल आया कि आपको पहाड़ों में रहते अठारह साल हो गये हैं, आज ही ऐसी खुशी क्यों है?

ज्यों-ज्यों आप आगे गये, ख़ुशी बढ़ती गयी| और आगे गये तो देखा कि सड़क के किनारे एक मस्त फ़क़ीर मालिक की याद में बैठा था, यह ख़ुशी उसी के कारण थी| बड़े महाराज जी उसको देखकर उसकी इज्ज़त के लिए घोड़े से उतरकर उसके पास बैठ गये| वह बोला, “ख़ुशबू लेनेवाली नाक भी कोई-कोई होती है|”

हे प्रभु! मुझे वह आँख दो जो तुम्हें देख सके और मेरे हृदय
में प्रेम की दीवानगी भर दे|
(बू अली शाह कलंदर)

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