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बकरा और बन्दर

बकरा और बन्दर

एक बार सत्संग के दौरान एक आदमी ने खड़े होकर बड़े महाराज जी से विनती करते हुए अपनी किसी भूल की क्षमा माँगी| अपनी दीनता को दर्शाते हुए उसने अपने गले में जूतों की माला डाल रखी थी| बड़े महाराज जी ने उससे पूछा कि शरीर को सज़ा देने का क्या फ़ायदा अगर असली मुजरिम मन, आज़ाद घूमता फिरे? अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए आपने यह कहानी सुनायी:

एक स्त्री ने एक बकरा और एक बन्दर पाल रखा था और उन दोनों को उसने घर के पास बाँधा हुआ था| एक दिन उसने बड़े प्रेम के साथ खाना बनाया और दही लेने के लिए बाज़ार चली गयी| बन्दर ने अपने हाथों से अपनी रस्सी खोलकर, रोटियाँ खाकर बकरे की रस्सी खोल दी और अपने गले में उसी तरह अपनी रस्सी डाल ली| जब वह स्त्री वापस आयी तो देखा कि खाना नहीं है और बकरा खुला फिर रहा है| लगी बकरे को मारने| कोई सज्जन यह सब देख रहा था| उसने कहा कि यह बकरा बे-क़सूर है, सारा क़सूर उस बन्दर का है|

सो अपनी कामना पूरी करने के लिए यह मन-रूपी बन्दर सबकुछ कर लेता है| असली क़सूर तो मन का होता है लेकिन सज़ा बेचारे शरीर को भुगतनी पड़ती है|

मन लज़्ज़त का आशिक़ है, जब इसे पहले से कोई अच्छी चीज़
मिल जाये तो यह पहली को छोड़ देगा, दूसरी के पीछे दौड़ेगा|
इसे दुनिया की करोड़ों लज्ज़ते दें, मन वश में नहीं आता|
(महाराज सावन सिंह)

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