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हज़ारों बिजलियाँ टूट पड़ीं

हज़ारों बिजलियाँ टूट पड़ीं

एक बार बाबा जैमल सिंह जी के पास कुछ पण्डित आये| शास्त्रों के कुछ अर्थ को लेकर उनकर आपस में विवाद था| कुछ पण्डित कहते थे कि अर्थ ऐसे नहीं, ऐसे हैं, तो कुछ कहते थे कि ऐसे नहीं, ऐसे हैं| उन्होंने कहा, “क्योंकि बाबा जी की रूहानी मण्डलों में रसोई है, इसलिए स्पष्टीकरण के लिए उनके पास चलें|” आपने उनके सामने जाकर अपना संशय प्रकट किया तो महाराज जी ने कहा कि मैं संस्कृत नहीं जानता| आख़िर उन्हें तरीक़े के साथ समझा दिया| महाराज जी ने कहा कि विद्वानों के लिए नाम की कमाई करना मश्किल है| एक को छोड़ बाक़ी सारे पण्डित चले गये| वह कहने लगा, मुझे नाम दे दो| महाराज जी ने उसे नाम दे दिया|

छः महीने के बाद वह आया और कहने लगा कि सुरत-शब्द-योग का तरीक़ा अच्छा नहीं, प्राणायाम अच्छा है| क़रीब नौ महीने बाद फिर आया और बोला कि प्राणायाम भी अच्छा नहीं, आप मुझे दिखाओ कि अन्दर क्या है? तब महाराज जी ने कहा नाम की कमाई करो| फिर वह वापस चला गया|

एक बार बाबा जी महाराज सठियाले पेंशन लेने जा रहे थे, रास्ते में वही पण्डित मिला और कहने लगा कि यहाँ कोई नहीं है, मुझे ज़रा-सा दिखा दो| महाराज जी ने कहा, “तेरा नुक़सान हो जायेगा|” वह बोला कि ज़रा-सी तवज्जुह दे दो| जब महाराज जी ने ज़रा-सी तवज्जुह दी तो वह गिर पड़ा और चिल्लाया कि सँभाल लो| महाराज जी ने कहा कि अन्दर से ख़याल हटा दो| जब हटाया और ख़याल बाहर आ गया तो उसने बताया कि अन्दर हज़ारों बिजलियाँ टूट पड़ी थीं| तब महाराज जी ने कहा कि तेरी उम्र तीन साल बाक़ी है, चाहे तू भजन कर ले, चाहे दुनिया का काम कर ले| फिर वह चला गया|

सन्तों के साथ ज़िद्द नहीं करनी चाहिए, बल्कि उनकी रज़ा या मौज में रहना चाहिए|

गुरु के लिए आत्मा को ऊपर ले जाना मुश्किल नहीं, लेकिन
उचित अभ्यास के बिना ऊपर ले जाने से उस आत्मा का नुक़सान
होता है| एक रेशमी कपड़े को, जो काँटेदार पौधों पर फैला हुआ
है, अगर एकाएक खींचा जाये तो वह फटकर टुकड़े-टुकड़े हो
जायेगा| उसी तरह आत्मा को, जो कर्म के काँटों में फँसी हुई है
और शरीर से रोम-रोम में फैली हुई है, गुरु के प्रेम द्वारा धीरे-
धीरे निर्मल करना चाहिए|”
(महाराज सावन सिंह)

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