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शाप से मुख्ति (भगवान शिव जी की कथाएँ) – शिक्षाप्रद कथा

शाप से मुख्ति (भगवान शिव जी की कथाएँ) - शिक्षाप्रद कथा

इक्ष्वाकु कुल में बहुत पहले एक पुण्यात्मा राजा राज्य करता था| उसका नाम मित्रसह था| वह बहुत धीर-वीर और श्रेष्ठ धनुर्धारी था| उसकी पत्नी का नाम था दमयंती| एक बार जब राजा अपनी सेना के साथ एक जगह से गुजर रहा था, तो उसने एक दुखद दृश्य देखा| उसने सारथि से कहा – “देखो वह कमठ नाम का दानव महात्मा मंडप को कैसा आतंकित कर रहा है| मेरा रथ उसी ओर ले चलो| आज मैं इस दुष्ट को दंड दिए बिना नहीं छोडूंगा| ताकि भविष्य में यह किसी महात्मा को दुख न पहुंचा सके|”

आदेशानुसार सारथि रथ को आगे बढ़ा ले गया| राजा ने धनुष पर तीर चढ़ाया और कमठ दानव को निशाना बनाकर तीर छोड़ दिया| तीर लगते ही दानव ने वहीं दम तोड़ दिया| महात्मा मंडप ने राजा को ढेरों आशीर्वाद दिए| फिर राजा वापस अपनी राजधानी लौट आया और कुछ दिन बाद इस घटना को लगभग भूल ही गया| वह नियमानुसार राजकाज चलाने लगा|

इधर कमठ दानव के छोटे भाई ने राजा मित्रसह द्वारा अपने बड़े भाई के वध की बात सुनी तो वह बहुत क्रोधित हुआ और फिर योजना बनाकर एक दिन वह रसोइए का वेष बनाकर राजा के दरबार में उपस्थित हुआ और बोला – “महाराज! मैं एक कुशल रसोइए हूं| एक बार आपने मुझे मौका दिया तो ऐसे स्वादिष्ट भोजन बनाकर खिलाऊंगा कि आप वर्षों तक याद रखेंगे|”

फिर परिक्षण के तौर पर राजा ने उसे अपना रसोइया बना लिया| कुछ ही दिनों में कपटी दानव ने राजा का विश्वास जीत लिया| कुछ दिनों बाद गुरु जयंती के दिन राजा ने बड़े आदर पूर्वक महर्षि वशिष्ठ को आमंत्रण भेजा| निश्चित समय पर गुरु वशिष्ठ भोजन के लिए पधारे| कपटी दानव ने बड़ी चतुराई से उनके भोजन में नरमांस परोसकर रख दिया| वे क्रोधित स्वर में राजा से बोले – “पापी राजा…. क्या यही तेरा सत्कार है| भोजन में नरमांस खिलाकर मुझे भी अधर्मी बनाना चाहता है|”

महर्षि की बात सुनकर राजा को जैसे सांप सूंघ गया| उससे बोलते न बना| फिर बड़ी हिम्मत जुटाते हुए वह बोला – “क्षमा गुरुदेव! इसमें मेरा कोई दोष नहीं है| यह सब इस रसोइए की करतूत है|”

महर्षि वशिष्ठ क्रोधित होकर बोले – “पापी! एक तो अपराध करता है, दूसरे किसी अन्य पर उसका दोष मढ़ता है| क्या यह रसोइया तेरा नहीं है| जा इस पाप की सजा भोग| मैं तुझे शाप देता हूं कि इसी क्षण से तू राक्षस बन जाएगा और अनंतकाल तक राक्षस योनि में भटकेगा|”

राजा ने गिड़गिड़ाते हुए कहा – “क्षमा गुरुदेव! दास को इतनी कड़ी सजा न दें| अनजाने में हुए इस अपराध की मैं आपसे क्षमा चाहता हूं|”

राजा के बहुत गिड़गिड़ाने पर आखिर ऋषि नम्र होकर बोले – “अनजाने में ही सही अपराध तो तुमसे ही हो गया है| क्या तुम्हें पता नहीं था कि तुम्हारा रसोइया वस्तुत: एक दानव है|”

राजा बोला – “नहीं महाराज! बिलकुल नहीं| यदि ऐसा होता तो मैं उसे एक पल भी यहां नहीं ठहरने देता|”

महर्षि बोले – “राजन! तुम्हारे साथ-साथ मुझे भी धोखा हुआ है| खैर… अब शाप तो वापस नहीं लिया जा सकता| लेकिन अब तुम्हारे शाप का काल सिर्फ बारह वर्ष तक रहेगा| मैं तुम्हें इतनी ही छूट दे सकता हूं|”

उचित अवसर जान कपटी दानव वहां से चलता बना| शाप के कारण राजा उसी क्षण से राक्षस हो गया| राक्षस बन जाने से राजा की बुद्धि भ्रष्ट हो गई| वह वन में पहुंचा और जीवों को मार-मारकर खाने लगा| एक दिन वन में उसने तरुण ऋषि की पत्नी भयभीत होकर चीखी – “नहीं, ऐसा मत करो राक्षसराज! मेरे पति को छोड़ दो|”

मुनि पत्नी रोई-गिड़गिड़ाई किंतु राक्षस पर कोई असर न हुआ| कुछ ही देर में राक्षस ने ऋषि का सारा मांस नोच-नोचकर खा डाला और हड्डियां वहीं फेंक दीं| मुनि पत्नी ने रोते-रोते अपने पति की हड्डियां चुनीं| फिर एकाएक उसकी आंखें बदले की आग में जलने लगीं| उसने राक्षस को शाप दिया – “नीच राक्षस! मेरे पति को मार कर तूने अच्छा नहीं किया| मैं तुझे शाप देती हूं कि जब भी तू किसी स्त्री के साथ विहार करेगा, उसी क्षण तेरी मृत्यु हो जाएगी|”

शाप देकर मुनि पत्नी ने अपने पति की हड्डियों के लिए चिता बनाई और वह उसी में सती हो गई| उधर बारह वर्ष बीते| शाप का समय समाप्त हुआ तो राजा पुन: अपने पुराने रूप में आ गया| जब वह राजमहल में पहुंचा तो रानियों सहित मंत्री आदि ने उसका भरपूर स्वागत किया| राजा राजकार्य चलाने लगा| लेकिन मुनि पत्नी के शाप का उसे स्मरण था| अत: वह बहुत उदास रहने लगा| रानी ने कारण पूछा तो उसने बताया – “राक्षस योनि में रहते मुझसे बहुत से ऐसे अपराध हो गए हैं महारानी कि उनका प्रायश्चित करना भी मेरे लिए मुश्किल हो गया है| समझ में नहीं आता क्या करूं|”

रानी बोली – “मुझे बताइए स्वामी! शायद मैं उसका कुछ हल निकाल सकूं|”

तब राजा ने मुनि पत्नी के शाप की बात उसे बता दी| सुनकर रानी गंभीर सोच में पड़ गई| धीरे-धीरे सभी रानियों को शाप की बात मालूम हो गई| वे सब राजा के पास आने से कतराने लगीं| इससे राजा उद्विग्न रहने लगा और एक दिन उसकी बेचैनी इतनी बढ़ी कि वह अपना सभी कुछ त्यागकर तपस्या करने वन में निकल गया| लेकिन ब्रह्म हत्या एक विशाल पिशाचिनी बनकर उसका पीछा करती रही| तप के समय तो वह दूर रहती, अन्यथा वह हर समय दूर से अपने विशाल जबड़े खोले उसे निगलने को तत्पर रहती|

और फिर एक दिन जैसे डूबते को तिनके का सहारा मिला| दैव योग से उसकी तपस्थली में मुनि ने उसकी उदासी का कारण पूछा – “राजन! राज-पाट और सांसारिक भोग विलास त्याग देने के पश्चात भी तुम अशांत मन दिखाई दे रहे हो| इसका कारण क्या है?”

राजा बोला – “महर्षि! एक ब्रह्म हत्या मेरे सिर पर तलवार बनकर हर समय लटकी रहती है| पता नहीं कब वह अपना वार कर जाए, इसी कारण मन बहुत उद्विग्न रहता है|”

“मुझे बताओ, मैं तुम्हारी सहायता करूंगा|” महर्षि बोले| तब राजा ने महर्षि को सारी घटनाएं कह सुनाईं, सुनकर मुनि गंभीर स्वर में बोले – “अपराध तो तुमसे वास्तव में गंभीर हुआ है राजन! लेकिन यह सब तुम्हारी शाप की अवधि में हुआ है| राक्षस विवेकहीन होते हैं, इसीलिए तुम ऐसा जघन्य कृत्य कर बैठे|”

राजा बोला – ‘ऋषिवर! कोई उपाय बताइए ताकि मैं इस ब्रह्म हत्या के शाप से मुक्त हो सकूं|”

महर्षि बोले – “राजन! यहां से पश्चिमी समुद्र के मध्य गोकर्ण नामक एक उत्तम तीर्थ है| वहां सब प्रकार के पापों के नाशक महाबल नामक सदाशिव का ज्योतिलिंग विद्यमान है| वहां पहुंचकर तीर्थ स्नान कर भगवान शंकर की पूजा-अर्चना करोगे तो इस ब्रह्म हत्या के शाप से मुक्त हो जाओगे|”

राजा ने मुनि को शीश नवाकर कहा – “मैं ऐसा ही करूंगा मुनिराज! कल प्रात: ही मैं उस पावन तीर्थ के लिए रवाना हो जाऊंगा|”

आशीर्वाद देकर मुनि तो चले गए| दूसरे दिन प्रात: ही राजा मुदित मन से गोकर्ण के लिए पैदल चल दिया| गोकर्ण पहुंचकर उसने तीर्थ स्नान किया और कई दिनों तक नियम से भगवान शंकर की पूजा-आराधना करता रहा| उसकी पूजा-आराधना से भगवान शंकर प्रसन्न हुए और एक दिन राजा को आशीर्वाद देकर उसे शाप मुक्त कर दिया|

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Munish Ahuja Founder SpiritualWorld.co.in

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