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पूरा शरीर आदी है – शिक्षाप्रद कथा

पूरा शरीर आदी है - शिक्षाप्रद कथा

एक बार कड़ाके की ठंड से एक निर्धन व्यक्ति नंगे पैर शरीर पर कपड़े लगभग न के बराबर पहने हुए, किसी राजमार्ग पर खुशी से गाता हुआ चला जा रहा था| रास्ते में उसकी भेंट एक अन्य धनी व्यक्ति से हुई| वह घोड़े पर बैठा हुआ था| उसके शरीर पर कोट, लबादा और टोपी थी| पैरों में उसने मजबूत चमड़े के जूते पहन रखे थे|

निर्धन इस कड़कती सर्दी में भी काफी प्रसन्न और सामान्य था, जबकि धनी व्यक्ति उतना सब होने के बाद भी ठंड से बेहाल था| उसने निर्धन को इस स्थिति में भी इतना खुश देखा तो आश्चर्य में डूबकर बोला – “क्या बात है भाई? तुम इस कड़कड़ाती ठंड में बिना गरम कपड़ों के इधर-उधर घूम रहे हो| तुम्हें ठंड नहीं लगती क्या? और आखिर कैसे सह लेते हो इतनी सर्दी?”

“क्यों श्रीमान!” दूसरा हंसा – “भला आप खुले चेहरे पर ठंड कैसे सहते हैं?”

“मेरे चेहरे को इसकी आदत पड़ गई है|” धनी व्यक्ति ने उत्तर दिया|

“बस तो फिर, मेरा शरीर भी ऐसा ही है| तुम्हारे चेहरे के समान मेरा पूरा शरीर इसका आदी हो चुका है|”

शिक्षा: जब हम कठिनाइयों के आदी हो जाते हैं, तो उन्हें आसानी से सहन कर लेते हैं|

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