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युद्ध की तैयारी

युद्ध की तैयारी

हस्तिनापुर से लौटते समय कृष्ण की भेंट कर्ण से हुई| उन्होंने कर्ण से कहा, “कर्ण, तुम्हे संभवतः यह विदित नहीं है कि तुम कुंती के पुत्र और पांडवों के भाई हो| अतः तुम्हें यह भी सोचना होगा कि अपने भाइयों से युद्ध करना कहां उचित है| कहो कर्ण! यह जानने के बाद क्या युद्ध अनावश्यक नहीं हो जाता?”

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कृष्ण के शब्द सुनकर कर्ण आश्चर्यचकित रह गया| फिर कुछ सोचकर बोले, “अब यह सब बताने का क्या प्रयोजन? हर बार, जब भी मैं पांडवों से मिला, मुझे अपमानित होना पड़ा| इस संसार में केवल दुर्योधन ही मेरा मित्र है और उसकी सहायता करने की शपथ ली है|”

कृष्ण की भेंट कुंती से भी हुई| उन्होंने कहा, “कृपया मेरे पुत्रों के लिए यह संदेश लेते जाएँ कि युद्ध के विचार से ही मै दुखी और भयभीत हो जाती हूँ| कृपया उनसे कहें कि वे सदा क्षत्रियों की भांति आचरण करें-साहसी, कुलीन, क्षत्रिय राजकुमारों की भांति|”

कुंती हर क्षण अपने पुत्रों और आनेवाले महायुद्ध के विषय में चिंतित रहतीं| अंततः उन्होंने कर्ण से मिलने का निश्चय किया| एक दिन भोर वेला में वे नदी के तट पर गई, जहां कर्ण सदैव प्रार्थना के लिए आते थे|

उन्होंने कहा, “कर्ण! तुम सारथी अधिरथ के नहीं, मेरे पुत्र हो| तुम युधिष्ठिर और पांडवों के ज्येष्ठ भ्राता हो| अब, तुम सब भाई क्या परस्पर युद्ध करोगे? मैं तुमसे विनती करती हूँ, कृपया युद्ध न होने दो|” फिर कुंती ने कर्ण को उसके जन्म की कथा सुनाई कि तुम तरह कुँवारी होने के नाते उन्होंने उसे टोकरी में रखकर नदी में प्रवाहित कर दिया था|

कर्ण दुखी स्वर में बोले, “माताश्री, यह सब बताने से क्या लाभ होगा? अब बहुत देर हो चुकी है| आप माँ हैं पर आपने मेरा पालन-पोषण नहीं किया, न ही कभी मातृत्व का स्नेह दिया| इस घड़ी में आप क्यों मुझसे पुत्र के कर्तव्य की कामना करती हैं? अर्जुन ने सदैव मुझे अपमानित किया| दुर्योधन ही एक ऐसा व्यक्ति  है जिसने मुझे सम्मान और मित्रता का स्नेह दिया| मै उसके साथ कभी विश्वासघात नहीं कर सकता|” परन्तु कुंती के आँसू थम ही नहीं रहे थे| उन्हें दुखी देखकर कर्ण बोले, “माँ, मै आपको वचन देता हूँ कि आपके पुत्रों में से युधिष्ठिर, भीम, नकुल और सहदेव का कभी वध नहीं करूंगा, पर अर्जुन के साथ युद्ध अवश्य करूँगा| हम दोनों में से किसी एक को वीरगति प्राप्त होगी| हममें से जिस किसी की भी मृत्यु हो, तुम्हारे तब भी पांच पुत्र ही रहेंगे| हे वीर-जननी, तुम फिर भी पांच पुत्रों की माँ रहोगी|”

कर्ण के शब्द सुनकर कुंती बहुत दुखी हुईं कि वे युद्ध को न टाल पाई| परन्तु उनके पास कोई उपाय भी तो नहीं था! कर्ण को अटल देख, अपने आंसू पोंछते हए, भारी कदमों से लौट गईं|

अपने-अपने शिविरों में कौरव और पांडव युद्ध की पूर्व योजनाएँ तथा तैयारियाँ करने में व्यस्त थे| पांडवों की ओर से सात सेनापति नियुक्त किए गए-द्रुपद, धृष्टद्युम्न, विराट, भीम, शिखंडी, सात्यकि और चेकितान|

राजा द्रुपद के पुत्र और द्रौपदी के भाई, राजकुमार धृष्टद्युम्न को वरिष्ठ सेनानायक चुना गया| अपनी बहिन के दुर्योधन द्वारा अपमानित होने बाद से ही वह दुर्योधन से युद्ध करने के लिए अत्यंत उत्सुक था| भीम और हिडिंबी के पुत्र घटोत्कच तथा अर्जुन और सुभद्रा के पुत्र अभिमन्यु भी युद्ध शिविर में उपस्थित थे|

कौरवों की ओर से भीष्म, द्रोण, कर्ण, राजा जयद्रथ, त्रिगर्तों के राजा सुसरमा, और श्ल्यराज, जो कि रानी माद्री के भाई और नुकुल और सहदेव के मामा थे, युद्ध में भाग लेने की तैयारियों कर रहे थे| राजा शल्य को दुर्योधन ने छल से अपनी ओर कर लिया था|

शल्य ने कृष्ण से कहा, “मुझे खेद है कि मै अनजाने में दुर्योधन को सहायता देने का वचन दे चूका हूँ| अब मै वचनबद्ध हूँ परन्तु फिर भी पांडवों की सहायता करना चाहता हूँ| वे मेरे भानजे हैं| कृपया बतलाइए, मैं क्या करूँ?”

कृष्ण ने उत्तर दिया, “कर्ण आपसे अपना सारथी बनने के लिए पूछेंगे| स्मरण रहे, यदि कभी भी आप अर्जुन की सहायता कर सकें तो अवश्य करें|” शल्य ने मन ही मन निश्चय किया कि वे ऐसा ही करेंगे|

कौरवों के शिविर में युद्ध से पूर्व-रात्रि को वरिष्ठ सेनानायक की नियुक्ति के संबंध में तर्क होने लगा| कर्ण, भीष्म की आलोचना करने लगे, “भीष्म कौरवों से नहीं पांडवों से स्नेह करते है| यदि भीष्म सर्वोच्च सेनानायक बने तो मै युद्ध नहीं करूँगा|”

भीष्म ने उत्तर दिया, “निस्संदेह मैं पांडवों से प्रेम करता हूँ| वे मेरे भतीजे पांडु के पुत्र हैं| परन्तु मैंने राज्य की रक्षा का प्रण लिया है अतः कौरवों की ओर से ही युद्ध करूँगा| पर स्मरण रहे विजय सदा सत्य की ही होती है|”

दुर्योधन ने कर्ण को समझाने का बहुत प्रयास किया| परन्तु कर्ण ने उसकी एक न सुनी और कहा, “मै युद्ध में शस्त्र तब तक नहीं उठाऊंगा जब तक भीष्म लड़ते रहेंगे|” अंत में भीष्म पितामह को सेनाध्यक्ष बनाया गया| भीष्म ने सेनापतित्व स्वीकार किया| परंतु उन्होंने दुर्योधन को स्पष्ट रूप से कह दिया कि मैं पांडवों का वध नहीं करूंगा| हां यथाशक्ति पांडव सेना का संहार करता रहूँगा|

उधर व्यास धृतराष्ट्र से मिलने गये| वे युद्ध की तैयारियाँ देख अत्यंत दुखी हुए| धृतराष्ट्र ने अपने अंधे होने की विवशता बताते हुए कहा, “मै देख तो नहीं सकता, फिर भी इतने महान वीरों की वीरता को जानने की बहुत इच्छा है| आप मुझे ऐसा वरदान दे कि मैं युद्ध का वर्णन यहीं बैठे-बैठे जान लूँ|”

व्यास ने कहा, “वत्स, मैं अपने योगबल से संजय को ऐसी दिव्यदृष्टि प्रदान करता हूँ कि यहाँ बैठे-बैठे युद्ध देखेगा और आपको उसका वर्णन सुनाएगा|”

कुरुक्षेत्र का विस्तृत मैदान युद्ध के लिए चुना गया| उन दिनों युद्ध निमानुसार ही हुआ करते थे| युद्ध बराबरी वालों में ही-अर्थात घुड़सवार का सिर्फ घुड़सवार से, पदसैनिक का पदसैनिक से युद्ध हो सकता था| बिना शस्त्र के सैनिकों या जिसने आत्मसमर्पण कर दिया हो, उन पर वार नहीं किया जाता था| युद्ध सूर्योदय के पश्चात दोनों ओर शंख ध्वनि से आरंभ होता और सूर्यास्त होने पर शंख ध्वनि से ही समाप्त हो जाता था| कुरुक्षेत्र के मैदान में हर साँझ, भीष्म के साथ ध्वनि के साथ ही दोनों सेनाएँ विश्राम के लिए चली जातीं|

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