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विश्वामित्र के माया जाल से बेखबर

विश्वामित्र के माया जाल से बेखबर

विश्वामित्र से अनुमति लेकर राजा हरिश्चंद्र सैनिको के साथ अपनी राजधानी की ओर चल पड़े|

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राजा हरिश्चंद्र के चले जाने के बाद ब्राह्मण बने विश्वामित्र अपने असली रूप में आ  गए|उनके होठों पर व्यंभरी मुस्कान फैल गई|वह मन ही मन सोचने लगे, ‘अब देखता हूं हरिश्चंद्र, तू कितना बड़ा दानी और सत्यवादी है| कोई बात कह देना जितना सहज है, उस पर अमल करना उतना ही कठिन होता है| साधरण महापुरुषो में यही तो अंतर होता है| साधारण लोग जहां कठिनाईयों के सामने आने पर विचलित हो जाते है, वहीँ  महापुरुष यदि स्वप्न में कोई बात धर्मानुकूल कह बैठते हैं, तो उससे तनिक भी विचलित  नही होते| ऐसे लोग धर्म को ही सत्य मानते हैं और सत्याचरण को ही धर्म कहकर पुकारते हैं|अब देखूंगा की तेरा सत्य-धर्म क्या कहता है?’

राजा हरिश्चंद्र के दुखों और महर्षि वशिष्ठ की पराजय की कल्पना कर विश्वामित्र जोर-जोर से हंसने लगे| उनके इस व्यवहार से उनके शिष्य आश्चर्यचकित हो गए|

उधर हरिश्चंद्र को स्वप्न में भी यह ध्यान नहीं आया कि विश्वामित्र ने उनके साथ छल किया है|

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