वीर बालक

वीर बालक

दिल्ली में उन दिनों मुगलों का शासन था| एक दिन एक शिकारी बादशाह औरंगजेब के दरबार में एक शेर को जिंदा पकड़कर लाया| बादशाह बहुत प्रसन्न हुआ|

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उसने उस शेर की वीरता का वर्णन किया| जंगल के राजा शेर की प्रशंसा राजदरबार में बैठे जोधपुर के नरेश जसवंत सिंह को अच्छी नहीं लगी| उन्होंने कहा- “आलमपनाह, मेरा शेर जंगल के इस शेर से भी बहादुर है|” बादशाह ने कहा- “तुम्हारा शेर कहाँ है?” उन्होंने अपने पास बैठे अपने दस-वर्षीय बालक की ओर इशारा किया| बादशाह ने एक बहुत बड़ा लोहे का पिंजरा बनाने का हुकुम दिया|  नियत किए हुए दिन लोहे का एक बड़ा पिंजरा बनाकर एक बड़े मैदान में ले आया गया| बादशाह ने पिंजरे में शेर और बालक को छोड़ने का आदेश दिया| पिंजरे के बाहर बादशाह, दरबारी और बड़ी गिनती में जनता एकत्र हो गयी|

कई दिन का भूखा शेर पिंजरे में छोड़ दिया गया| राजा ने भी अपने बालक की पीठ को थपथपाकर उसे पिंजरे में जाने का इशारा किया| राजकुमार पृथ्वी शेर को ललकारते हुए शेर के सामने जा खड़ा हुआ और कटार से उस पर हमला करने वाला था कि उसके पिता ने कहा- “बेटे, शेर बिना हथियार के है, तुम भी कटार फेंककर अपने हाथों से लड़ो|” बालक पृथ्वी ने कटार बाहर फेंक दी और शेर की ओर बढ़ा| शेर भी लड़के की ओर झपटा| पृथ्वी ने शेर के पंजे पकड़कर उन्हें झटके दिया| शेर दर्द से कराह उठा| बालक ने तेजी से बढ़कर शेर के जबड़े जकड़ लिये| बिल्ली की तरह शेर पीछे दुबकने लगा| पृथ्वी ने पूरी ताकत लगाकर शेर के जबड़े चीर डाले| शेर जमीन पर गिर गया| थोड़ी देर में शेर मर गया| सभी ने वीर बालक की वीरता की सराहना की और दूसरे सभी बच्चों को प्रेरणा दी कि वे भी वीर बालक पृथ्वी सिंह की तरह बहादुर बने| इस कहानी से हमें शिक्षा मिलती है कि प्रत्येक बालक को इतना वीर और साहसी बनना चाहिए|

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