स्वाभिमान

यह घटना आजादी के पूर्व की है| मुंशी प्रेमचन्द हिंदी के सर्वश्रेष्ठ कथाकार एवं उपन्यास-लेखक ने जीवन की शुरुआत अध्यापन कार्य से की थी, बाद में वे स्कूलों के इंस्पेक्टर बन गए थे| यह घटना उस समय की है, जब वह एक सामान्य स्कूल में एक सामान्य शिक्षक थे| एक बार इंस्पेक्टर विधालय के निरक्षण के लिए पधारे| प्रेमचन्द जी ने पूरी विनम्रता और कायदे से उन्हें स्कूल दिखलाया|

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सायंकाल के समय प्रेमचंद जी अपने घर के बाहर बैठे कुछ लिख रहे थे| अचानक इंस्पेक्टर महोदय उसी मोहल्ले से निकले| दोनों की दृष्टियाँ मिली| प्रेमचन्द अपने लेखन-कार्य में व्यस्त रहे| इंस्पेक्टर उनकी बेरुखी से नाराज हो उठे| उनका ख्याल था कि मुंशी जी उनके स्वागत के लिए उठेंगे और आवभगत करेंगे, परंतु ऐसा नहीं हुआ|

उन्होंने अपनी इंस्पेक्टरी के रौब में दूसरे दिन स्कूल के दफ्तर में मुंशी प्रेमचन्द जी को बुला भेजा और अपना रौब डालना चाहा|

प्रेमचन्द जी ने जवाब में कहा- “महोदय, मैं विधालय के समय में स्कूल और आपका नौकर हूँ, उसके बाद घर में मैं आपका बादशाह हूँ| आप घर आते तो मैं आपकी आवभगत करता, पर मैं अपने लेखन कार्य में व्यस्त था, देवी सरस्वती की आराधना कर रहा था, उस समय जरुरी नहीं कि मैं लोगों का अभिवादन करता फिरूँ|”

सच्चे स्वाभिमान का ऐसा उधारण देखने में कम ही मिलता है| इस कहानी से ज्ञात होता है कि हर इंसान को स्वाभिमान के साथ ही जीना चाहिए|