🙏 सतनाम वाहे गुरु, गुरु पर्व की असीमित शुभकामनाएं... आप सभी पर वाहे गुरु की मेहर हो! 23 Nov 2018 🙏
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भारतीय संविधान दुनिया का सबसे बड़ा संविधान है और पूरा हस्तलिखित है। इसमें 48 आर्टिकल, 12 अनुसूची और 94 संशोधन हैं। संविधान सभा के सभी 283 सदस्यों के संविधान पर हस्ताक्षर हैं जो 26 जनवरी 1950 से लागू किया गया था। संविधान को तैयार करने में 2 साल 11 महीने और 17 दिन का समय लगा था। संविधान सभा के अध्यक्ष डा. राजेन्द्र प्रसाद और ड्राफ्ंिटग कमेटी के चेयरमैन डा. बी.आर. अम्बेडकर थे उन्हें संविधान का पितामह तथा जनक भी कहा जाता है। भारत में प्रत्येक वर्ष 26 नवंबर के दिन राष्ट्रीय संविधान दिवस के रूप में मनाया जाता है वर्ष 1949 में 26 नवम्बर को संविधान सभा द्वारा भारत के संविधान को स्वीकृत किया गया था, जो 26 जनवरी, 1950 को प्रभाव में आया। हमारा संविधान हमारी संस्कृति तथा सभ्यता के अनुरूप है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51 में विश्व एकता, विश्व शान्ति तथा अन्तर्राष्ट्रीय कानून का सम्मान करने के लिए प्रत्येक नागरिक तथा देश को कार्य करने के लिए बाध्य करता है।

राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी ने आधारभूत नवाचार और उत्कृष्ट पारम्परिक ज्ञान के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वाले 55 लोगों को सम्मानित किया। श्री मुखर्जी ने राष्ट्रपति भवन में आयोजित नवप्रवर्तन उत्सव के दौरान इन सभी लोगों को सम्मानित किया। इनमें से सबसे प्रमुख गुजरात के 82 वर्षीय भंजीभाई मथुकिया को कृषि से संबंधित कई नए तरीके विकसित करने के लिए लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड प्रदान किया गया। इस मेले में हिस्सा लेने वाले वैज्ञानिक नहीं हैं लेकिन वे ऐसे खोजकर्ता हैं जिन्होंने अपनी खुद की जरूरत या अपने आसपास की समस्या के निदान के लिए अनोखी खोजें कर डाली। जैसे बिना बिजली से चलने वाली फ्रिज, क्ले वाटर फिल्टर, गर्मी में उगने वाले सेब की किस्म, मरीजों के नहाने के लिए कुर्सी, कूड़ा उठाने वाली मशीन आदि। नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन की तरफ से आयोजित नवप्रवर्तन उत्सव में 55 से भी ज्यादा जमीनी इनोवेटरों ने हिस्सा लिया और अपने उत्पादों को उन्होंने यहां प्रदर्शित भी किया। 

केवल सीमा शुल्क और अनुष्ठानों से स्पष्ट प्रस्थान को चिह्नित करते हुए, स्वयं परिवर्तन के लिए उनकी वैज्ञानिक पद्धतियां दोनों प्रत्यक्ष और शक्तिशाली हैं कोई विशेष परंपरा से संबंधित नहीं, वह योग विज्ञान से समकालीन जीवन के लिए सबसे मान्य है और प्रस्तुत करते हैं।

किसी भी बालक के व्यक्तित्व निर्माण में ‘माँ’ की ही मुख्य भूमिका:

कोई भी बच्चा सबसे ज्यादा समय अपनी माँ के सम्पर्क में रहता है और माँ उसे जैसा चाहे बना देती है। इस सम्बन्ध में एक कहानी मुझे याद आ रही है जिसमें एक माता मदालसा थी वो बहुत सुन्दर थी। वे ऋषि कन्या थी। एक बार जंगल से गुजरते समय एक राजा ने ऋषि कन्या की सुन्दरता पर मोहित होकर उनसे विवाह का प्रस्ताव किया। इस पर उन ऋषि कन्या ने उस राजा से कहा कि ‘‘मैं आपसे शादी तो कर लूगी पर मेरी शर्त यह है कि जो बच्चे होगे उनको शिक्षा मैं अपने तरीके से दूगी।’’ राजा उसकी सुन्दरता से इतनी ज्यादा प्रभावित थे कि उन्होंने ऋषि कन्या की बात मान ली। शादी के बाद जब बच्चा पैदा हुआ तो उस महिला ने अपने बच्चे को सिखाया कि बुद्धोजी, शुद्धोजी और निरंकारी जी। मायने तुम बुद्ध हो। तुम शुद्ध हो और तुम निरंकारी हो। आगे चलकर यह बच्चा महान संत बन गया। उस जमाने में जो बच्चा संत बन जाते थे उन्हें हिमालय पर्वत पर भेज दिया जाता था। इसी प्रकार दूसरे बच्चे को भी हिमालय भेज दिया गया। राजा ने जब देखा कि उसके बच्चे संत बनते जा रहंे हैं तो उन्होंने रानी से प्रार्थना की कि ‘महारानी कृपा करके एक बच्चे को तो ऐसी शिक्षा दो जो कि आगे चलकर इस राज्य को संभालें।’ इसके बाद जब बच्चा हुआ तो महारानी ने उसे ऐसी शिक्षा दी कि वो राज्य को चलाने वाला बन गया। बाद में हिमालय पर्वत से आकर उसके दोनों भाईयों ने अच्छे सिद्धांतों पर राज्य को चलाने में अपने भाई का साथ दिया|

यह उनके जन्म के समय में उल्लेख किया गया था कि उनके पास एक बेदाग सुनहरा चमकदार शरीर था और उनके माथे पर एक ‘यू’ आकार का लाल रेखा तिलक स्पष्ट रूप से देखा गया था।

विश्व की साहसी महिलायें हर क्षेत्र में मिसाल कायम कर रही हैं। कुछ ऐसी बहादुर तथा विश्वास से भरी बेटियों से रूबरू होते हैं, जिन्होंने समाज में बदलाव और महिला सम्मान के लिए सराहनीय तथा अनुकरणीय मिसाल पेश की है। देश में डीजल इंजन ट्रेन चलाने वाली पहली महिला मुमताज काजी हो या पश्चिम बंगाल में बाल और महिला तस्करी के खिलाफ आवाज उठाने वाली अनोयारा खातून। ऐसी कई आम महिलाएं हैं जो भले ही बहुत लोकप्रिय न हो लेकिन उन्हें इस साल नारी शक्ति पुरस्कार के लिए चुना गया। राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी ने अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 8 मार्च को 30 महिलाओं को पुरस्कृत किया। पुरस्कार पाने वालों में नागालैण्ड की महिला पत्रकार बानो हारालू भी शामिल है जो नागालैण्ड में पर्यावरण संरक्षण के लिए काम कर रही है। उत्तराखण्ड की दिव्या रावत ग्रामीणों के साथ मशरूम की खेती को विकसित करने की भूमिका निभा रही है। छत्तीसगढ़ पुलिस में कांस्टेबल स्मिता तांडी ने 2015 में जीवनदीप समूह बनाया जो गरीबों को स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए आर्थिक मदद करता है।

(1) क्या ‘असाधारण’ व्यक्तियों तथा ‘साधारण व्यक्तियों’ के द्वारा आत्मा के विकास में कोई फर्क है? हाँ!

(अ) समाज में कुछ ‘असाधारण’ तथा बिरले लोग ही’ ऋषि-मुनियों तथा महापुरूषों के रूप में विकसित हुए हैं जिन्होंने अपनी आत्मा के विकास के लिए कोई ‘नौकरी या व्यवसाय’ नहीं किया। इन महापुरूषों ने पर्वतों, कन्धराओं, गुफाओं तथा घास-फूस की झोपड़ियों या साधारण परिस्थितियांे में रहकर तथा समाज में अत्यन्त सादा एवं सरल जीवन जीकर और व्यापक ‘समाज के लिए उपयोगी बनकर’ समाज की महत्ती सेवा की और इस प्रकार अपनी आत्मा का विकास किया।

थामस एल्वा एडिसन प्राइमरी स्कूल मे पढ़ते थे। एक दिन घर आए और मां को एक कागज देकर कहा, टीचर ने दिया है। उस कागज को पढ़कर माँ की आँखों में आंसू आ गए। एडिसन ने पूछा क्या लिखा है? आँसू पोंछकर माँ ने कहा- इसमें लिखा है- ‘‘आपका बच्चा जीनियस है। हमारा स्कूल छोटे स्तर का है और शिक्षक बहुत प्रशिक्षित नहीं हैं, इसे आप स्वयं शिक्षा दें। कई वर्षों बाद माँ गुजर गई। तब तक एडिसन प्रसिद्ध वैज्ञानिक बन चुके थे। एक दिन एडिसन को अलमारी के कोने में एक कागज का टुकड़ा मिला। उन्होंने उत्सुकतावश उसे खोलकर पढ़ा। ये वही कागज था, जिसमें लिखा था- आपका बच्चा बौद्धिक तौर पर कमजोर है, उसे अब स्कूल न भेजें। एडिसन घंटों रोते रहे, फिर अपनी डायरी में लिखा- एक महान माँ ने बौद्धिक तौर पर कमजोर बच्चे को सदी का महान वैज्ञानिक बना दिया। 

निविदा उम्र में कठिन जीवन ने उसके मन, शरीर और आत्मा के भीतर आध्यात्मिकता के विचारों को एन्क्रिप्ट किया। कठिन तपस्या, आध्यात्मिक प्रथाओं और सर्वशक्तिमान ईश्वर के प्रति समर्पण के बाद, उसे “ओम” की शक्ति प्राप्त हुई।

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