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सोने का अंडा

एक निर्धन किसान को कहीं से एक मुर्गी मिल गई| वह उस मुर्गी को घर ले आया| उसने यह सोचकर कि आज काफ़ी दिन बाद बढ़िया खाने को मिलेगा, उसे काटने के लिए बड़ा-सा चाकू उठा लिया| जैसे ही वह उस मुर्गी को काटने ले लिए बढ़ा कि मुर्गी बोली, ‘मुझ पर दया करो, मुझे मत मारो|’

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किसान बोला, ‘क्यों न मारूँ, काफ़ी दिन हो गए मुर्गी खाए, मैं तो तुम्हें ज़रूर काटूँगा|’

मुर्गी बोली, ‘मुझे काट कर तुम्हें नुकसान ही होगा क्योंकि मैं सोने का एक अंडा रोज़ देती हूँ| मुझे जीवित रखो और रोज़ सोने के एक अंडे के मालिक बन जाओ| इससे तुम्हारी निर्धनता भी दूर हो जाएगी|’

‘हो सकता है तुम झूठ बोल रही हो|’ किसान ने कहा|

‘सुबह तक आजमा लो| अगर बात झूठ निकली तो मुझे मार डालना|’ मुर्गी ने कहा|

किसान राजी हो गया|

सुबह हुई| सचमुच उस मुर्गी ने सोने का अंडा दिया था| किसान खुश हो गया| अब तो यह रोज़ का सिलसिला बन गया| कुछ ही दिनों में वह किसान मालामाल हो गया|

एक दिन किसान के मन में लालच ने सिर उठाया| उसने सोचा कि ‘कौन रोज़-रोज़ एक-एक अंडा इकट्ठा करता फिरे, मुर्गी को मार कर एक ही बार में सारे अंडे निकाल लेता हूँ|’

लालच में फँसे इंसान की बुद्धि भी काम करना बंद कर देती है| किसान के साथ भी यही हुआ| ढेर सारे सोने के अंडे एक ही बार में प्राप्त करने के लालच में उसने मुर्गी का पेट चीर डाला और वह मर गई|

लालच में पड़कर किसान रोज़ मिलने वाले सोने के एक अंडे से भी हाथ धो बैठा|


कथा-सार

धैर्य का फल सदैव अच्छा ही होता है और अधीरता बने-बनाए काम को भी बिगाड़ देती है| यदि किसान धैर्य रखता तो रोज़ सोने का एक अंडा पाता परंतु एक साथ ढेर सारे सोने के अंडों के उसके लोभ व अधीरता ने उस मुर्गी को ही मार डाला, जो रोज़ सोने का एक अंडा देती थी|

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