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सोच कर उपकार करो

जंगल में शिकारी के बड़े पिंजड़े में संयोग से एक शेर फँस गया| शेर ने वहाँ से गुजरने वाले कई जानवरों से विनती की लेकिन किसी ने भी उस पिंजरे को नही खोला|

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तभी वहाँ से एक व्यक्ति गुज़रा| शेर ने उसे पुकारा और कहा, ‘हे मानव! कृपया मुझे इस पिंजरे से निकालो वरना मैं भूख से तड़प-तड़प कर मर जाऊँगा|’

शेर की बात सुनकर वह आदमी बोला, ‘शेर भाई…ऐसी मूर्खता मैं नही कर सकता| मैंने तुम्हें आज़ाद किया तो सबसे पहले तुम मुझे ही मार डालोगे|’

‘यह कैसी बात करते हो! तुम मुझे आज़ाद करके मुझ पर उपकार करोगे… और मैं अपने ऊपर उपकार करने वाले को कैसे मार सकता हूँ|’

उस व्यक्ति ने शेर की बातों में आकर पिंज़रा खोल दिया| शेर आज़ाद हो गया| बाहर आकर वह अपना वादा भूल गया और उस व्यक्ति से बोला, ‘तुमने भले ही मुझे आज़ाद किया है लेकिन मैं भूखा भी हूँ, इसलिए अब मैं तुम्हें खाऊंगा|’ यह सुनकर वह आदमी भयग्रस्त होते हुए बोला, ‘शेर जी! यह बात गलत है…मैंने आपको बचाया है…आप मुझे नही मार सकते|’

शेर ने उसकी एक नही सुनी तब आदमी ने एक सुझाव दिया, ‘मैं चाहता हूँ कि आप इस बात का फैसला किसी तीसरे से करा ले कि आपका मुझे खाना ठीक है या गलत और अगर वह इसे उचित बताए तो आप मुझे अवश्य खा ले|’

शेर जानता था कि इस जंगल में उसे गलत कौन सिद्ध कर सकता है इसलिए वह मान गया| तभी वहाँ से एक गीदड़ गुज़रा| दोनों ने उसे बुलाया| शेर को सामने देख गीदड़ दुबक गया| उस आदमी ने सारी बात गीदड़ को बताई और न्याय करने को कहा|

गीदड़ बोला, ‘एक आदमी?…और शेर की जान बचाएगा असंभव|’

आदमी बोला, ‘मैं सच कह रहा हूँ…यह शेर पिंजरे में बंद था और मैंने ही इसके कहने पर इसे बाहर निकाला है|’

‘पर वनराज इस पिंजरे में कैसे घुस गए|’ गीदड़ ने कहा|

‘मुर्ख गीदड़ मैं इस पिंजरे में इस प्रकार फँसा|’ कहते हुए शेर जैसे ही पिंजरे के अंदर घुसा गीदड़ ने एक झटके से पिंजरे का दरवाजा बंद कर दिया और आदमी से बोला, ‘मानव होकर कैसी मूर्खता कर दी आपने?’ उपकार भी सोच-समझकर करना चाहिए|’ इसके बाद दोनों अपनी-अपनी राह चल दिए|


कथा-सार

परोपकार करना अच्छी बात है, लेकिन इससे पहले अपना भला-बुरा भी सोच लेना चाहिए| कहीं ऐसा न हो कि होम करते हाथ जलने की नौबत आ जाए|

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