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कौए की समझदारी

एक पेड़ की शाख पर कौवों का एक जोड़ा रहता था| उसी पेड़ के नीचे एक साँप ने भी बिल बना रखा था| मादा कौआ जब अंडे देती तो वह साँप उस अण्डों को खा जाता| ऐसा कई बार हो चुका था लेकिन वे सिवाय अफ़सोस करने के कुछ नही कर पाते|

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एक दिन कौए ने तय कर लिया कि वह साँप को अवश्य ही मज़ा चखाएगा| वह मौके की तलाश में रहने लगा|

एक दिन कौआ राजमहल के ऊपर से उड़ रहा था| वहाँ उसने राजकुमारी को अपनी सखियों के साथ देखा| राजकुमारी के गले में एक बेहद कीमती हार देखकर कौए को एक तरकीब सूझी| वह एक-दो दिन तक महल के आसपास ही मंडराता रहा|

कुछ दिन बाद कौए को मौका मिला| उसने उस राजकुमारी का कीमती हार अपनी चोंच में दबा लिया और उड़ चला| राजकुमारी ने शोर मचा दिया| पहरेदार तुरंत हरकत में आ गए| वे उस कौए के पीछे-पीछे दौड़े| कौआ उड़ते-उड़ते अपने घोंसले के पास पहुँचा और उसने वह हार उस साँप के बिल में डाल दिया| पहरेदारों ने भी यह सब देखा|

पहरेदार तुरंत साँप के बिल के पास पहुँचे तो उनकी नज़र साँप पर पड़ी, जो फन फैलाए बिल से बाहर निकल आया था| पहरेदारों को तो वह हार हर हाल में चाहिए था, अतः उन्होंने साँप को भाले से मार डाला और हार लेकर चले गए|

इस प्रकार कौए को अपने दुश्मन से छुटकारा मिल गया|


कथा-सार

शत्रु को परास्त करने के लिए छल-बल से काम लेना चाहिए| लेकिन जब शत्रु शक्तिशाली हो तो इनसे काम नही चलता| तब जिसके पास बुद्धिबल अधिक होता है, वही विजयी होता है| कौए ने भी ऐसा ही किया| अतः विपति पड़ने पर भी होश नही गँवाने चाहिए|

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