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घमंडी मुर्गा – शिक्षाप्रद कथा

घमंडी मुर्गा - शिक्षाप्रद कथा

एक बार दो पालतू मुर्गे आपस में लड़ने लगे| दोनों ही अपने-अपने क्षेत्रों पर राजा के समान अपना अधिकार जमाना चाहते थे| झगड़ा इतना बढ़ा कि दोनों बहुत बुरी तरह आपस में गुंथ गए| दोनों ही अपने नुकीले पंजों से एक-दूसरे का पेट फाड़ देना चाहते थे| लड़ाई के दौरान दोनों मुर्गे ऊपर हवा में उठते, एक दूसरे के सामने आते और अपने पंजों से एक-दूसरे के पेट पर वार करते|

यह लड़ाई बहुत देर तक जारी रही| एक मुर्गा तो इतना अधिक घायल हो गया कि उसने मैदान छोड़ दिया| दूसरा मुर्गा इतना खुश हुआ कि वह एक इमारत की छत पर चढ़ गया और लगा चिल्लाने – “मैं जीत गया! वह देखो वह डरपोक भागा जा रहा है|”

उसी समय एक उकाब ऊंचे आकाश में अपने शिकार की खोज में उड़ रहा था| उसने नीचे मकान की छत पर मुर्गा खड़ा देखा| वह तेजी से मुर्गे पर झपटा और उसे अपने खूनी पंजों में दबाकर उड़ गया| घायल मुर्गे ने उकाब को दूसरे मुर्गे को अपने चंगुल में ले जाते हुए देखा तो मुस्करा कर कहा – ‘अहंकार सारी बुराइयों की जड़ है|’

शिक्षा: घमंडी का सिर नीचा|

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