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गंगा का अभिमान चूर (भगवान शिव जी की कथाएँ) – शिक्षाप्रद कथा

गंगा का अभिमान चूर (भगवान शिव जी की कथाएँ) - शिक्षाप्रद कथा

महाराज सगर के साठ हजार पुत्र कपिल मुनि की क्रोधाग्नि से भस्म हो गए थे| बहुत दिनों बाद सगर के वंश में समुत्पन्न राजर्षि दिलीप के पुत्र महाभाग भगीरथ ने ‘गोकर्ण’ तीर्थ में एक हजार वर्ष तक कठिन तपस्या कर ब्रह्मा जी को प्रसन्न किया| वे प्रसन्न होकर वर देने के लिए देवताओं को साथ लेकर महात्मा भगीरथ के पास आए और वर मांगने के लिए कहने लगे|

भगीरथ ने हाथ जोड़कर कहा – “भगवन! मेरे पूर्वज इस समय न जाने किस दशा में पड़े हैं, उनका उद्धार करना मेरा परम कर्तव्य है| हे देव! आप ऐसा प्रयत्न कीजिए कि गंगा जी इस भूलोक में आकर अपने पावन जल से मेरे पूर्वजों का उद्धार करें|”

ब्रह्मा जी ने कहा – “मैं गंगा जी को तो भूलोक में भेज दूंगा, पर उनके प्रवाह को रोकने की शक्ति पृथ्वी में नहीं है| इसके लिए दयासिंधु भगवान शिव जब तक कृपा नहीं करेंगे, तब तक कार्य सिद्ध नहीं होगा| वे ही गंगा के प्रवाह के वेग को रोक सकते हैं| इसलिए हे भगीरथ! तुम उनकी आराधना करो|”

ब्रह्मा जी के उपदेश के अनुसार भगीरथ ने शिवजी की आराधना प्रारभ कर दी| वे अन्न-जल का परित्याग कर पैर के एक अंगूठे पर खड़े होकर एक वर्ष तक भगवान शिव का ध्यान करते रहे| उनकी अनन्य शरणागति से प्रसन्न होकर भगवान उमापति प्रकट होकर बोले – “नरश्रेष्ठ! मैं तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हूं| मैं गिरिराजकुमारी गंगा देवी को अपने मस्तक पर धारण कर तुम्हारा प्रिय कार्य करूंगा|”

भगवती गंगा को अपने वेग का बड़ा गर्व था| इससे उन्होंने शिव जी को बहाते हुए पाताल में प्रवेश कर जाने का निश्चय किया और विशाल रूप धारण कर बड़े दु:सह वेग से भगवान शिव के मस्तक पर गिरीं|

भगवान शिव को उनके अभिमान का पता लग गया| इसलिए उन्होंने गंगा जी को अपनी जटा में ही बांधे रखने का निश्चय कर लिया| गंगा जी पूरे वेग से शिव की जटा पर गिरीं और उसी में समा गईं| उन्होंने बड़ा प्रयत्न किया कि किसी प्रकार पृथ्वी पर उतर जाएं, पर किसी तरह भी जटा-मंडल से नहीं निकल सकीं| वहीं पर वे कई वर्षों तक चक्कर लगाती रहीं|

भगीरथ को इस बात से बड़ा दुख हुआ और वे पुन: शिव जी की आराधना करने लगे| शिव जी ने भगीरथ की प्रार्थना पर गंगा जी को अपनी जटा से मुक्त कर दिया| उस समय गंगा की सात धाराए हो गईं| ह्लादिनी, पावनी और नलिनी नाम की गंगा की मंगलमयी तीन धाराएं पूर्व दिशा की ओर वह पड़ीं| सुचक्षु, सीता और सिंधु नाम की तीन धाराएं पश्चिम दिशा को प्रवाहित हुईं और सातवीं धारा के रूप में पतित भगवती गंगा महाराज भगीरथ के रथ के पीछे चलीं|

अनेक देवर्षि, गंधर्व, यक्ष, सिद्ध आदि इस अद्भुत दृश्य को देखकर मुग्ध हो गए| देवता लोग भी आकर इस गंगावतरण के दृश्य को देखने लगे| भूतलवासी ऋषिगण उस जल को शिव जी के अंग से निकलते देखकर बड़ी श्रद्धा और भक्ति के साथ उनका स्पर्श कर परम आनंद को प्राप्त हुए| गंगा की वह धारा भूलोक के प्राणियों का उद्धार करती हुई रसातल तक चली गई और वहां पहुचंकर उसने भगीरथ के भस्मीभूत पितामहों का उद्धार किया| यह सब विलक्षण कार्य महाराज भगीरथ की शिव-भक्ति का ही परिणाम था|

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