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भद्रपुरुष और तोते की कथा (अलिफ लैला) – शिक्षाप्रद कथा

भद्रपुरुष और तोते की कथा (अलिफ लैला) - शिक्षाप्रद कथा

किसी गांव में एक बड़ा ही शरीफ आदमी रहता था| उसकी पत्नी बेहद सुंदर थी और वह आदमी उससे बहुत प्रेम करता था| कभी एक पल के लिए भी यदि वह उसकी आंखों से ओझल हो जाती थी तो वह बेचैन हो उठता था| एक बार वह आदमी किसी आवश्यक कार्य से परदेश चल गया| वहां के एक बाजार में तरह-तरह के अनोखे पक्षी बिक रहे थे| उसी बाजार में बोलने वाला एक तोता भी बिकाऊ था| जो बात भी उससे पूछी जाती, उसका उत्तर वह बिलकुल मनुष्य की भांति देता था| इसके अलावा उसमें यह भी विशेषता थी कि किसी मनुष्य की अनुपस्थिति में उसके घर पर जो-जो घटनाएं होती थीं, उन्हें भी वह उस मनुष्य के पूछने पर बता देता था| वह भद्रपुरुष उस तोते को खरीद लाया| मगर उसने अपनी पत्नी को तोते की यह विशेषता नहीं बताई|

कुछ दिनों बाद उस आदमी को व्यापार के सिलसिले में फिर से विदेश जाना पड़ा| जाते समय उसने अपनी पत्नी से कहा कि वह तोते की अच्छी तरह देखभाल करे| इसी प्रकार की कुछ दूसरी और हिदायतें देकर वह परदेश रवाना हो गया और काफी समय बाद लौटा|

लौटने पर उसने अकेले में तोते से पूछा, “हे तोते! यहां मेरी गैरहाजिरी में क्या-क्या हुआ?”

उसकी अनुपस्थिती में उसकी पत्नी ने खूब मनमानी की थी और शर्मोहया के सारे बंधन तोड़ दिए थे| तोते ने अपने स्वामी से सारा हाल कह सुनाया|

उसके स्वामी ने अपनी पत्नी को खूब डांटा-फटकारा कि, तू मेरी पीठ पीछे क्या-क्या हरकतें करती है और कैसे-कैसे गुल खिलाती है, यह सब मुझे मालूम है|

पत्नी पति से तो कुछ नहीं बोली क्योंकि बातें सच्ची थीं, लेकिन वह सोचने लगी कि वे बातें उसके पति को किसने बताईं?

पहले उसने सोचा कि शायद किसी सेविका ने यह काम किया है| उसने एक-एक सेविका को बुलाया और डांट-फटकार कर पूछा, किंतु सभी ने कसमें खा-खाकर बताया कि, हमने तुम्हारे पति से कुछ नहीं कहा है|

स्त्री को उनकी बातों का विश्वास हो गया और उसने समझ लिया कि यह सारी करतूत तोते की ही है| उसने तोते से कुछ न कहा, क्योंकि तोता इस बात को भी अपने स्वामी को बता देता| किंतु वह इस फिक्र में रहने लगी कि किसी प्रकार तोते को अपने स्वामी के सम्मुख झूठा साबित करके अपने प्रति उसके अविश्वास और संदेह को दूर करे|

कुछ दिन बाद उसका पति एक दिन के लिए फिर नगर से बाहर गया| स्त्री ने अपनी सेविकाओं को आज्ञा दो कि रात में एक सेविका सारी रात तोते के पिंजरे के नीचे चक्की पीसे, दूसरी उस पर इस तरह पानी डालती रहे जैसे वर्षा हो रही हो और तीसरी सेविका पिंजरे के पीछे की ओर दीया जलाकर स्वयं दर्पण लेकर तोते के सामने खड़ी हो जाए और दर्पण पर पड़ने वाले प्रकाश को तोते की आंखों के सामने रह-रहकर डालती रहे| सेविकाएं रात भर ऐसा ही करती रहीं और भोर होने के पहले ही उन्होंने पिंजरा ढक दिया|

दूसरे दिन वह भद्रपुरुष लौटा तो उसने एकान्त में तोते से पूछा कि कल रात को क्या-क्या हुआ था| तोते ने कहा, “हे स्वामी, रात को मुझे बड़ा कष्ट रहा| रात भर बादल गरजते रहे, बिजली चमकती रही और वर्षा होती रही|”
चूंकि विगत रात को बादल और वर्षा का नाम भी नहीं था, इसलिए आदमी ने सोचा कि यह तोता बगैर सिर-पैर की बातें करता है और मेरी पत्नी के बारे में भी इसने जो कुछ कहा, वह भी बिलकुल बकवास था| यह सोचकर उसे तोते पर इतना क्रोध आया कि उसने तोते को पिंजरे से निकाला और धरती पर पटक-पटककर मार डाला|

वह अपनी पत्नी पर फिर विश्वास करने लगा, लेकिन यह विश्वास बहुत अधिक दिनों तक नहीं रहा| कुछ महीनों के अंदर ही उसके पड़ोसियों ने उससे उसकी पत्नी के दुष्कृत्यों के बारे में ऐसी-ऐसी बातें कहीं, जो उस तोते की बातों जैसी थीं|

यह जानकर उस शरीफ आदमी को गहरा सदमा पहुंचा और निर्दोष तोते को मारने के अपराध बोध के कारण वह फूट-फूटकर रोने लगा| मगर अब पछताने से क्या मिलना था|

बादशाह गरीक ने तोते की कथा कहने के बाद अपने मंत्री से कहा, “दूबां हकीम ने मेरे पर इतना उपकार किया है और तुम्हारे साथ भी तो उसने कोई बुराई नहीं की है| फिर भी मैं उस निरपराध को मरवा डालूं| मैं तोते के स्वामी जैसा मुर्ख नहीं हूं, जो बगैर सोचे-समझे ऐसी जल्दबाजी करूं|”

मंत्री ने निवेदन किया, “महाराज! तोता अगर निर्दोष मारा भी गया तो कौन-सी बड़ी बात हो गई| स्त्री का दुष्कृत्य कोई बड़ी बात नहीं है – किंतु जो बात मैं आपसे कह रहा हूं, वह बड़ी बात है और उस पर ध्यान देना जरूरी है| फिर आपके बहुमूल्य जीवन के लिए एक निरपराध व्यक्ति मारा भी जाए, तो इसमें खेद की क्या बात है| उसका इतना अपराध तो है ही कि सभी लोग उसे शत्रु का भेदिया कहते हैं| मुझे उससे न ईर्ष्या है, न शत्रुता| मैं जो कुछ कहता हूं, आप ही के भले के लिए कहता हूं| मुझे इससे कुछ लेना-देना नहीं कि वह अच्छा है या बुरा| मैं तो केवल आपकी दीर्घायु चाहता हूं| अगर मेरी बात असत्य निकले, तो आप मुझे वैसा ही प्राणदंड दें, जैसा राजा ने अपने आमात्य को दिया था|”

बादशाह ने पूछा, “किस राजा ने आमात्य को प्राणदंड दिया और किस बात पर दिया?”

मंत्री ने तब राजा को आमात्य की कहानी सुनाई|

 

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