बसंत पंचमी: सरस्वती साधना पर्व

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अंगारों की तरह दिखते पलाश के फूल, आम के पेड़ों पर आये बौर, हरियाली से ढकी धरती और चारो और पीली सरसों बसंत ऋतु के शुभ आगमन की बधाई देते हैं वास्तव में बसंत पंचमी ऋतु परिवर्तन का ऐसा त्यौहार है, जो अपने साथ मद-मस्त परिवर्तन लेकर आती है|

ऐसा लगता है मानो शरद ऋतु की विदाई के साथ पेड़ पौधों और प्राणियों में नवजीवन का संचार होने लगता है| सभी प्रेम और यौवन के मद-मस्त गीतों में झूमकर गाने लगते हैं| इस मौसम में कोयले कूक-कूक कर बावरी होने लगती हैं; भौरे इठला-इठला कर मधुपान करते हैं| बसंत ऋतु चूँकि एक परम्परागत त्यौहार है, इसके साथ कई प्राचीन मान्यताएं भी समाज में जुड़ी हुई हैं| इस दिन बच्चों को पहला अक्षर लिखना सिखाया जाता है तथा कामदेव की पूजा की जाती है| सबसे महत्वपूर्ण विद्या की देवी सरस्वती पूजा की जाती है तथा परंपरागत पहनावे जैसे पुरुष कुर्ते पजामे में तथा स्त्रियां पीले या बसंती रंग की साड़ी में देखी जाती हैं| देवी सरस्वती को अनेकों सांस्कृतिक कार्यक्रम अर्पित किये जाते हैं| गायन और वादन सहित अनेकों नाच भी किये जाते हैं|

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माँ शारदा की पूजा के बाद विद्या आरम्भ करना शुभ माना जाता है| ऐसे करने से माँ प्रसन्न होती है और विवेकशील बनने का आशीर्वाद देती है| इस दिन देवी सरस्वती की पूजा करने के पीछे भी एक पौराणिक कथा है| इनकी सबसे पहले पूजा श्रीकृष्ण और ब्रह्मा जी ने की थी| देवी सरस्वती ने जब श्रीकृष्ण को देखा तो उनके रूप पर मौहित हो गई और पति के रूप में पाने की इच्छा करने लगी| जैसे ही भगवान श्रीकृष्ण को इस बात का पता चला तो उन्होंने स्वत: ही कहा की वो तो राधा के प्रति समर्पित हैं| और देवी सरस्वती के प्यार को देखकर और उन्हें प्रसन्न करने के लिए यह वरदान दिया कि प्रत्येक विद्या की इच्छा रखने वाला माघ मॉस की शुकल पंचमी को तुम्हारा पूजन करेगा| 

सबसे खूबसूरत बात की इतना बड़ा वरदान देने के बाद स्वयं श्रीकृष्ण जी ने देवी सरस्वती की पूजा की| वास्तव में माँ शारदा वाणी, बुद्धि विद्या और ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी है| बसंत पंचमी पर धरती जो रूपधारण करती है वह सुन्दरतम होता है| इसी अवसर पर देवी की पूजा एवंम शुभ आराधना भी की जाती है|

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