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सभी धर्मो का सन्देश लोक कल्याण है! – डा. जगदीश गांधी

सभी धर्मो का सन्देश लोक कल्याण है!

(1) संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा विश्व सर्व-धर्म समन्वयसप्ताह मनाने की घोषणा :-

संयुक्त राष्ट्र महासभा की 23 सितम्बर 2010 को आयोजित 65वीं बैठक में विश्व सर्व-धर्म समन्वयसप्ताह मनाने का प्रस्ताव रखा गया। इस अवसर पर सदस्य देशों के प्रतिनिधियों ने अपने भाषण में सभी धर्मों की एकता पर प्रकाश डाला तथा आज के वैश्विक युग में इसके महत्व को स्वीकारा। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 10 अक्टूबर 2010 को इस प्रस्ताव को सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया तथा प्रतिवर्ष फरवरी के प्रथम सप्ताह को विश्व सर्व-धर्म समन्वयसप्ताह के रूप में मनाने की घोषणा की। इस सप्ताह का मुख्य उद्देश्य सभी महान धर्मों के बीच प्रेमपूर्ण संवाद स्थापित करने के साथ ही मानव मात्र की एकता को बढ़ावा देना है। इस अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में सभी धर्मावलम्बी आपस में मिलजुल कर यह विचार-विमर्श करते हैं कि हम विश्व स्तर पर विभिन्न धार्मिक समुदायों के मध्य परस्पर विश्वास एवं एकता के विचारों को सफलतापूर्वक किस प्रकार से स्थापित कर सकते हैं।

 

(2) सभी धर्मों का सन्देश लोक कल्याण है :-

इस सप्ताह के उपरोक्त लक्ष्यों को प्रिन्ट, इलेक्ट्रिनिक्स तथा सोशल मीडिया, शिक्षण संस्थानों, भाषणों, वाद-विवाद प्रतियोगिताओं, सरकारी तथा गैर-सरकारी संगठनों आदि के माध्यम से अधिक से अधिक प्रचारित तथा प्रसारित किया जाता है। विश्व भर में स्थित पूजा स्थलों मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरूद्वारे आदि में परमात्मा से प्रेम करने तथा अपने पड़ोसी से प्रेम करने की प्रार्थनायें आयोजित होती हैं। सिटी मोन्टेसरी स्कूल द्वारा विभिन्न धार्मिक समुदायों के मध्य ज्ञान-विज्ञान, परस्पर विश्वास एवं एकता को बढ़ावा देने के लिए प्रतिवर्ष 30 अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन के आयोजन करता है। इस अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन में विश्व के विभिन्न देशों के विभिन्न धर्मों के अनुयाई, शिक्षाविद्, न्यायविद् व कानूनविद्, इतिहासविद् एवं उच्च पदों पर आसीन विद्वजन प्रतिभाग करके एक स्वर से सहमति व्यक्त करते हैं कि सभी धर्मों का मूल सन्देश लोक कल्याण है।

 

(3) हम प्रभु की इच्छा तथा आज्ञा को पहचाने कैसे?

प्रभु तो सर्वत्र व्याप्त है पर हम उसको देख नहीं सकते। हम उसको सुन नहीं सकते। हम उसको छू नहीं सकते तो फिर हम प्रभु को जाने कैसे? प्रभु की इच्छा तथा आज्ञा को हम पहचाने कैसे? बच्चों द्वारा प्रतिदिन की जाने वाली हमारे स्कूल की प्रार्थना है कि हे मेरे परमात्मा मैं साक्षी देता हूँ कि तूने मुझे इसलिए उत्पन्न किया है कि मैं तूझे जाँनू और तेरी पूजा करूँ। इस प्रकार प्रभु ने हमें केवल दो कार्यों (पहला) परमात्मा को जानने और (दूसरा) उसकी पूजा करने के लिए ही इस पृथ्वी पर मनुष्य रूप में उत्पन्न किया है। प्रभु को जानने का मतलब है परमात्मा द्वारा युग-युग में पवित्र धर्म ग्रंथों गीता की न्याय, त्रिपटक की समता, बाईबिल की करुणा, कुरान की भाईचारा, गुरू ग्रन्थ साहेब की त्याग व किताबे अकदस की हृदय की एकता आदि की ईश्वरीय शिक्षाओं को जानना और परमात्मा की पूजा करने का मतलब है कि परमात्मा द्वारा विभिन्न धर्म ग्रन्थों में दी गई शिक्षाओं पर जीवन-पर्यन्त दृढ़तापूर्वक चलते हुए लोक कल्याण की भावना से अपनी नौकरी या व्यवसाय करके अपनी आत्मा का विकास करना। हमें प्रभु की इच्छा को अपनी इच्छा बनाकर जीवन जीना चाहिए। हमें अपनी इच्छा को प्रभु की इच्छा बनाने की अज्ञानता कभी नहीं करनी चाहिए।

 

(4) पवित्र पुस्तकों का एक-एक शब्द त्रुटिरहित है :-

मानव सभ्यता के पास लगभग 7500 वर्षों का लम्बा इतिहास उपलब्ध है। इस इतिहास के अनुसार परमात्मा की प्रगतिशील दैवीय प्रेरणा के मायने है कि परमात्मा द्वारा सिलसिलेवार श्रृंखला में युग-युग में अवतरित दैवीय शिक्षक राम (7500 वर्ष पूर्व), कृष्ण (5000 वर्ष पूर्व), बुद्ध (2500 वर्ष पूर्व), ईशु (2000 वर्ष पूर्व), मोहम्मद (1400 वर्ष पूर्व), नानक (400 वर्ष पूर्व), बहाउल्लाह (200 वर्ष पूर्व) आदि धरती पर मानव जाति के कल्याण के लिये आये हैं। परमात्मा की इच्छा तथा आज्ञा को पहचानने का एकमात्र स्त्रोत अवतारों के माध्यम से इस संसार में अवतरित पवित्र ग्रन्थों में परमात्मा की ओर से आयी शिक्षायें हैं। परमात्मा की ओर से अवतरित इन पवित्र पुस्तकों का एक-एक शब्द त्रुटिरहित है। संसार के सारे विद्वान मिलकर भी इस ईश्वरीय ज्ञान में कोई भी त्रुटि नहीं निकाल सकते हैं।

 

(5) पवित्र भावना से अपनी नौकरी या व्यवसाय करना, यही परमात्मा की पूजा है :-   

हमारे जीवन का उद्देश्य भी अपने आत्मा के पिता परमपिता परमात्मा की तरह ही सारी मानव जाति की सेवा अर्थात लोक कल्याण करने का होना चाहिए। इसके लिए हमें परमपिता परमात्मा की शिक्षाओं को अपने जीवन में अपनाना होगा। परमात्मा से जुड़ने पर हम महसूस करेंगे कि परमात्मा हमारी रक्षा तथा मदद के लिए अपने अदृश्य दिव्य सैनिकों की टुकड़ियाँ एक के बाद दूसरी और दूसरी के बाद तीसरी और इसी प्रकार अनेक टुकड़ियाँ भेजता रहता है। इसके लिए पहले हम प्रभु की शिक्षाओं को स्वयं पूरी एकाग्रता से जानें, उनको समझें, उनका मनन करें, उनकी गहराईयों में जाये व ईश्वर के मंतव्य को समझे और फिर उन शिक्षाओं पर चलते हुए प्रभु का कार्य मानकर पवित्र भावना से अपनी नौकरी या व्यवसाय करें। यही प्रभु की सच्ची पूजा, इबादत, प्रेयर व प्रार्थना है। इसके अतिरिक्त परमात्मा की पूजा का और कोई भी तरीका नहीं है। इसलिए हमें अपनी इच्छा नहीं वरन् प्रभु की इच्छा और प्रभु की आज्ञा का पालन करना चाहिए क्योंकि जो कोई प्रभु की इच्छा तथा आज्ञा को पहचान लेते हैं उन्हें धरती तथा आकाश की कोई भी शक्ति प्रभु का कार्य करने से रोक नहीं सकती।

 

(6) ईश्वर की इच्छा और आज्ञा को पहचानने की अहैतुकी कृपा बड़े सौभाग्य से मिलती है :-

ईश्वरीय अवतारों राम, कृष्ण, बुद्ध, ईशु, मोहम्मद, नानक, महावीर, बहाउल्लाह आदि के द्वारा प्रभु की राह में उठाये गये अपार कष्टों एवं जीवन में आये महान संकटों को हंसते-हंसते सहन करने की शक्ति उन्हें ईश्वर की इच्छा और आज्ञा को पहचान लेने के कारण ही मिली। हमें भी अपने महान अवतारों तथा महापुरूषों के जीवन का अनुसरण करते हुए पवित्र भावना से प्रभु के कार्य की तरह ही अपनी नौकरी या व्यवसाय करना चाहिए। नौकरी या व्यवसाय अपनी मानव आत्मा के विकास का सबसे सरल उपाय है। इस सम्पूर्ण विश्व समाज को परमात्मा ने स्वयं निर्मित किया है। परमात्मा अपनी प्रत्येक रचना से एक समान प्रेम करता है। इसलिए हमें भी अपने आत्मा के पिता परमात्मा के आज्ञाकारी पुत्र/पुत्री की तरह सारी मानव जाति से एक समान प्रेम तथा उसकी सेवा करनी चाहिए। मनुष्य जिस मात्रा में प्रभु की राह में स्वेच्छापूर्वक दुःख झेलता है उसी मात्रा में उसे प्रभु का प्रेम व आशीर्वाद प्राप्त होता है। किसी ने सही ही कहा है कि मंगलमय वह जगह जहाँ प्रभु महिमा गायी जाती। मंदिर, मस्जिद, गिरजा, गुरूद्वारे कहीं से प्रभु की पूजा, इबादत, प्रेयर तथा पाठ करो उसे सुनने वाला परमात्मा एक है। वो ‘‘अनाम’’ जिसे हम रब, खुदा, जीसस, ईश्वर व अन्य बहुत से नामों से जानते हैं।

 

(7) युगावतार अपने-अपने युग की समस्याओं का समाधान मानव जाति को देते हैं :-

रामायण में कहा गया है कि जब जब होहिं धरम की हानी। बाढ़हि असुर, अधर्म, अभिमानी।। तब-तब धरि प्रभु बिबिध सरीरा। हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा।।अर्थात जब-जब इस धरती पर अधर्म बढ़ता है तथा असुर, अधर्मी एवं अहंकारियों के अत्याचार अत्यधिक बढ़ जाते हैं, तब-तब ईश्वर नये-नये रूप धारण कर मानवता का उद्धार करने व उन्हें सच्चा मार्ग दिखाने आते हैं। इसी प्रकार महाभारत में परमात्मा की ओर से वचन दिया गया है कि यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत, अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्। परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्, धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे-युगे।।अर्थात धर्म की रक्षा के लिए मैं युग-युग में अपने को सृजित करता हूँ। सज्जनों का कल्याण करता हूँ तथा दुष्टों का विनाश करता हूँं। धर्म की संस्थापना करता हूँ। अर्थात एक बार स्थापित धर्म की शिक्षाओं को पुनः तरोताजा करता हूँ। प्रत्येक युग में परमात्मा मानव शरीर धारी संसार की किसी सबसे पवित्र आत्मा को अपनी शिक्षायें मानव जाति को देने के लिए चुनता है। उसे ही हम उस युग का युगावतार कहते हैं। जिन लोगों ने परमात्मा की दिव्य योजना के अनुसार अपने-अपने युग के युगावतार को पहचानकर उसकी इच्छा और आज्ञा का पालन किया उनको प्रभु का आशीर्वाद तथा सारी मानव जाति का सम्मान मिला है। युगावतार भारी कष्ट उठाकर अपने युग की समस्याओं का समाधान किसी नैतिक मूल्य को सामाजिक मूल्य बनाकर सारी मानव जाति के कल्याण के लिए  प्रचारित करते हैं। युगावतार की पहचान उसके शरीर, जाति, स्थान, नाम, वेशभूषा आदि से नहीं वरन् उसके युगानुकूल एवं समाजोपयोगी विचारों से होती है।

 

(8) जब सभी अवतारों का परमात्मा एक है तो हमारे अनेक कैसे हो सकते हैं?

न्याय, समता, करूणा, भाईचारा, त्याग, हृदय की एकता वैसे तो नैतिक मूल्य हैं लेकिन युग-युग में अवतरित अवतारों ने इन्हें सामाजिक मूल्य बनाकर सारी मानव जाति के कल्याण के लिए प्रचारित किया। युग अवतार की पहचान किसी के बताने से नहीं होती। युगावतार को स्वयं अपने विवेक तथा उसकी युगानुकूल शिक्षाओं से पहचानना पड़ता है। जिन्होंने युग-युग में युगावतार द्वारा बतायी गयी प्रभु की इच्छा तथा आज्ञा को पहचाना तथा उसके अनुसार प्रभु का कार्य किया उन सभी का कल्याण हुआ। इसके विपरीत जो लोग अपनी इच्छा पर चले उनका विनाश हुआ। वे परमात्मा के विरोधी कहलाये। जब सभी अवतारों का परमात्मा एक है तो हमारा धर्म (अर्थात कर्तव्य) तथा परमात्मा अलग-अलग कैसे हो सकता है? परमात्मा की दिव्य योजना के अन्तर्गत अवतरित किसी भी अवतार को तथा उनकी शिक्षाओं को कम करके नहीं आंकना चाहिए। परमात्मा की दृष्टि में यह संशयवृत्ति ‘‘संशयात्मा विनश्यति’’ जैसा अवगुण है। जिन अज्ञानियों ने हर युग में परमात्मा द्वारा अवतरित अपने युग के युगावतार का अपने अहंकार तथा संशयवृत्ति के कारण विरोध किया उन्होंने अपने शरीर के साथ ही साथ अपनी आत्मा का भी विनाश कर लिया। युगावतार की इच्छा और आज्ञा को पहचानने के मायने है परमात्मा की इच्छा और आज्ञा को पहचान लेना।

 

(9) गुरू गोविन्द दोऊ खड़े काके लाँगू पांव, बलिहारी गुरू आपकी गोविन्द दियो बताय :-

इसका मतलब यह है कि गुरु और परमात्मा दोनों साथ ही खड़े हैं इसलिए पहले किस के पैर छूने हैं ऐसी दुविधा आये तब पहले गुरु को वंदन करें क्योंकि गुरु की वजह से ही परमात्मा के दर्शन हुए हैं। गुरू मायने अवतार तथा गोविन्द मायने परमात्मा। अवतारों को ही परमात्मा का सही पता मालूम होता है। सभी अवतारों ने यह बताया है कि परमात्मा का सही पता है प्रभु की इच्छा तथा आज्ञा को पवित्र ग्रन्थों की गहराई में जाकर उसके छिपे हुए अर्थ को जानना तथा उसके अनुसार प्रभु की इच्छा तथा आज्ञा के अनुकूल लोक कल्याण के कार्य करना। ये सभी अवतार राम, कृष्ण, बुद्ध, ईशु, मोहम्मद, नानक, महावीर, मोजज, जोरास्टर, बहाउल्लाह आदि हमारे सच्चे गुरू हैं। जो हमें परमात्मा की इच्छा तथा आज्ञा को पहचानने हेतु अपने त्यागपूर्ण एवं पवित्र जीवन को सारी मानव जाति के लिए समर्पित करते हैं। साथ ही परमात्मा की ओर से युग-युग में अवतरित पवित्र ग्रन्थों गीता, त्रिपटक, बाईबिल, कुरान, गुरू ग्रन्थ साहिब, किताबे अकदस, किताबे अजावेस्ता द्वारा मार्गदर्शन देते हैं। 21वीं सदी में भौतिक, सामाजिक तथा आध्यात्मिक दृष्टि से सफल होने के लिए हमें इस युग का ज्ञान तथा इस युग की बुद्धिमत्ता चाहिए। हमारे प्रत्येक कार्य-व्यवसाय रोजाना परमात्मा की सुन्दर प्रार्थना बने।

 

(10) विद्यालय है सब धर्मों का एक ही तीरथ-धाम :-   

नोबेल शान्ति पुरस्कार प्राप्त श्री नेल्सन मण्डेला के अनुसार विश्व में शिक्षा सबसे शक्तिशाली हथियार है जिससे सामाजिक बदलाव लाया जा सकता है। विद्यालय एक ऐसा स्थान है जहाँ सभी धर्मों के बच्चे तथा सभी धर्मों के टीचर्स एक स्थान पर एक साथ मिलकर एक प्रभु की प्रार्थना करते हैं। प्रार्थना का यह ही सही तरीका है। सारी सृष्टि को बनाने वाला और संसार के सभी प्राणियों को जन्म देने वाला परमात्मा एक ही है। सभी अवतारों एवं पवित्र ग्रंथों का स्रोत एक ही परमात्मा है। हम प्रार्थना कहीं भी करें, किसी भी भाषा में करें, उनको सुनने वाला परमात्मा एक ही है। अतः परिवार तथा समाज में भी स्कूल की तरह ही सभी लोग बिना किसी भेदभाव के एक साथ मिलकर एक प्रभु की प्रार्थना करें तो सबमें आपसी प्रेम भाव भी बढ़ जायेगा और संसार में सुख, एकता, शान्ति, करूणा, त्याग, न्याय एवं अभूतपूर्व समृद्धि आ जायेगी। विद्यालय है सब

धर्मों का एक ही तीरथ धाम – क्लास रूम शिक्षा का मंदिर, बच्चे देव समान।  

डा. जगदीश गांधी

डा. जगदीश गांधी

– डा. जगदीश गांधी, शिक्षाविद् एवं
संस्थापक-प्रबन्धक, सिटी मोन्टेसरी स्कूल, लखनऊ

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